नेहरू के बगैर असंभव था आधुनिक एवं तर्कशील भारत

जन्मदिन पर विशेष , , मंगलवार , 14-11-2017


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दिनेश श्रीनेत

जब मैं आठ साल का था तो मेरे पिता ने मुझे एक किताब दी थी। प्रकाशन विभाग ने वह सुंदर सी किताब छापी थी - 'चाचा नेहरू की कहानी'। यह उनके पूरे जीवन पर बनी एक कॉमिक्स थी। इसे नेहरू के जीवन के तमाम फोटोग्राफ्स के आधार पर आयल कलर पर बनी पेटिंग की तरह बनी तस्वीरों की तरह प्रस्तुत किया गया था। बचपन में मैंने इसे कई बार पढ़ा था। इस किताब ने मेरे मन पर गहरा असर डाला।

इसके बाद करीब 12 साल की उम्र में 'गांधी' फिल्म में नेहरू बने रोशन सेठ को देखा, जो हू-ब-हू नेहरू से दिखते थे। उनकी ऊर्जा उनके गुस्से से प्रभावित हुआ। कुछ समय और बीता तो किसी पत्रिका में प्रकाशित उनका एक खत पढ़ा जो उन्होंने इंदिरा गांधी के नाम लिखा था। उसमें विश्व की विभिन्न सभ्यताओं के बारे में चर्चा थी। वह खत मुझे इतना पसंद आया कि मैंने खोजकर 'लेटर्स फ्रॉम अ फादर टु हिज डाटर' पढ़ा और कॉलेज तक पहुंचते-पहुंचते 'विश्व इतिहास की झलक' व 'भारत एक खोज' के बहुत से अंश पढ़े। किशोर उम्र में श्याम बेनेगल के निर्देशन में बना टीवी सीरियल 'भारत एक खोज' देखा। पौराणिक ग्रंथों, मिथकों, ऐतिहासिक घटनाओं के जरिए एक देश को समझने की प्रक्रिया से गुजरा और यह करने में मुझे कोई संकोच नहीं कि भारत को समझने का उससे बेहतर तरीका मुझे अब तक नहीं दिखा।

इन सबने मिलकर मेरे मन में नेहरू की एक छवि गढ़ी। यह एक स्वतंत्रता सेनानी की छवि नहीं थी। वह शिद्दत तो मुझे गांधी और क्रांतिकारी दल के नेताओं में नजर आती थी। मुझे नेहरू में जो पसंद आया वह उनका ठेठ पश्चिमी मिजाज का होना था। वे आजादी से पहले की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे जो अपनी शिक्षा और व्यवहार अंग्रेजों के समकक्ष खड़ा था। उनसे उनकी जमीन पर ठहरकर तर्क कर सकता था।

वे जेल गए, जनता के बीच गए मगर उन्होंने अपनी अंगरेजियत छोड़ी नहीं। उसे लगातार धार देते गए। मुझे उनकी वैज्ञानिकता, उनकी नास्तिकता, उनका तर्कवाद पसंद आया। यहां पर उनके समकक्ष कोई नेता नहीं दिखता। यहां तक कि गांधी व्यवहारिक रूप से तमाम मुद्दों बहुत ढुलमुल थे। वे छुआछूत का विरोध तो करते थे मगर हिन्दू समाज की तमाम दूसरी कमजोरियों पर एक निष्क्रीय नजरिया बनाए हुए थे। गांधी की वृहत्तर सामाजिक दृष्टि बहुत हद तक यथास्थितिवादी थी।

जबकि नेहरू ने एक तर्कशील भारत का निर्माण किया था। उनका इतिहास को देखने का वैज्ञानिक नजरिया, उनकी नास्तिकता, मानवता पर विश्वास, बहुलतावादी संस्कृति पर यकीन, कलाओं के प्रति प्रेम और उनका समाजवादी स्वप्न- इन सबने मिलकर एक सपने का निर्माण किया था। इससे हजारों कूपमंडूक लोग विचलित हुए। जो इस समाज की अज्ञानता का लाभ उठाकर निश्चिंत बैठे थे, वे भी विचलित हुए। बहुतों के लिए यह सपना टूटा भी था। बहुतों की नजर में नेहरू एक कमजोर प्रशासक रहे होंगे।

करीब 10-12 साल पहले एक इंटरनेशनल कान्फ्रेंस में लिंग्विस्टिक के प्रोफेसर फरजान सोज़ुदी से एशिया पर पड़ने वाले पश्चिमी समाज के असर पर मेरी बातचीत हुई थी तो उन्होंने कहा था कि अगर हम अपने दरवाजे बंद करते हैं तो नासमझी होगी और अगर बदलाव की बयार में बह जाते हैं तो भी। उन्होंने कहा- बेहतर होता है कि आप संवाद करें और उस प्रक्रिया में जो बेहतर है उसे स्वीकारें और जो निरर्थक है उसे छोड़ते चलें। समाज ऐसे ही बदलता है। शायद नेहरू इस देश की एक ऐसी ही ऐतिहासिक जरूरत थे।

यदि देश कोई नौजवान होता तो उसे नेहरू की तरह होना था। शंकालु, जिद्दी, तर्क-वितर्क करने वाला, गलतियां करने वाला, गाहे-बगाहे लापरवाह हो जाने वाला मगर जो बात एक नौजवान को सबसे अलग बनाती है- सतत अन्वेषण करने वाला। नयेपन को शंका से नहीं कौतूहल से देखने वाला। एक उत्तर औपनिवेशिक समाज और उसकी राजनीति को संचालित करने वाला व्यक्ति वही हो सकता था जो पश्चिम को समझता हो। जो दरवाजों को बंद न करे, बल्कि वहां पर अपनी पहचान के साथ खड़ा रहे और दुनिया को देखे।

(लेखक इकोनामिक टाइम्स डॉट कॉम में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 






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