अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजी किसानों की आवाज, नेपाल में शुरू हुआ संकट पर विमर्श

किसान आंदोलन , , मंगलवार , 12-03-2019


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पुरुषोत्तम शर्मा

1947 में जब भारत आजाद हुआ तो उस वक्त हमारी जीडीपी में कृषि का हिस्सा 52 प्रतिशत था। हमारी आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा तब सीधे कृषि से जुड़ा था। जबकि आज भी हमारी आबादी का 55 प्रतिशत हिस्सा सीधे कृषि से सीधे जुड़ा है और जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत बचा है। 1960-65 में भारत की कुल योजना मद का 12.16 प्रतिशत कृषि पर खर्च हुआ। जबकि 2007 की ग्यारहवीं योजना में कृषि के लिए सार्वजनिक निवेश की यह राशि घटकर 3.7 प्रतिशत रह गई। खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार अभी भारत की कृषि में बोया गया कुल क्षेत्र 140.8 मिलियन हैक्टेयर है। आजादी के 72 साल बाद भी इसमें से 78 मिलियन हैक्टेयर यानी 64 प्रतिशत क्षेत्रफल अभी भी वर्षा आधारित है। पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिति और भी बुरी है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में 10 प्रतिशत के करीब ही सिंचित क्षेत्र है। 1990 के बाद सिंचाई बजट में कमी की जाने लगी। मोदी सरकार के हाल में पेश अंतिम बजट में तो सिंचाई बजट में लगभग 65 प्रतिशत की कटौती की गई है।

काठमांडू में किसान सम्मेलन का एक दृश्य

भारत में 67 प्रतिशत किसानों की जोत का आकार 1 हैक्टेयर से कम है। जबकि 18 प्रतिशत के पास 1 से 2 हैक्टेयर जमीन है। मात्र 2 प्रतिशत किसानों के पास ही 10 हैक्टेयर से ज्यादा भूमि है। 0.7 प्रतिशत किसानों के पास कुल खेती की जमीन का 10.5 प्रतिशत हिस्सा है। बटवारे के बाद सीमांत व छोटी जोतों की संख्या बढ़ रही है। जबकि भूमि के कुछ हाथों में केंद्रीकरण की नीति के कारण बड़ी जोतों के आकार में बढ़ोतरी हो रही है। भारत की 45 प्रतिशत ग्रामीण आबादी भूमिहीन है जिसमें से कुछ के पास नाम मात्र की जमीन है। भूमिहीनों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। 2001 से 2011 के बीच 90 लाख किसान खेती से बाहर हुए और खेत मजदूरों की संख्या में 35 प्रतिशत की बृद्धि दर्ज की गई। यूपीए-एक के शासन में भारत की कृषि विकास दर 3.1 प्रतिशत और यूपीए-दो के शासन में 4.3 प्रतिशत थी। भारत के किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का दम्भ भरने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के अंतिम वर्ष भारत की कृषि विकास दर 2.7 प्रतिशत पर आ गई है। प्रधानमंत्री मोदी के वायदे को देखें तो अगले तीन वर्षों में भारत की कृषि विकार दर को 15 प्रतिशत रहना होगा जो मोदी सरकार के रिकार्ड से संभव ही नहीं है।

भारत का वर्तमान कृषि संकट- बढ़ती किसान आत्महत्याएं  

भारतीय कृषि अपने अब तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। इस कृषि संकट ने हमारे पूरे ग्रामीण समाज को अपनी आगोश में ले लिया है। जिसके कारण भारत की ग्रामीण संरचना में भारी बदलाव आ गया है। पिछले 13 वर्षों में कर्ज में डूबे साढ़े तीन लाख से ज्यादा भारतीय किसानों ने आत्महत्या कर ली है। जबकि पिछले 2 वर्षों से भारत सरकार ने किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को जारी करने से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो को रोक दिया है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 1997 से 2012 के बीच भारत में 2,50,000 किसानों ने आत्महत्या की। मोदी राज में इन आंकड़ों को जारी करने पर रोक से पूर्व ही 48,000 किसान आत्महत्याएं कर चुके थे। भारत का पंजाब प्रान्त जो हरित क्रांति के बाद पूंजीवादी कृषि के विकास का माडल बना, वहां भी लगभग 16,000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इस दौर में किसान आत्महत्याओं की घटनाएं और बढ़ी हैं तथा इस संकट ने अब तक अछूते राज्यों व क्षेत्रों में भी दस्तक दे दी है।

कृषि क्षेत्र में नव उदारवादी सुधारों से भारत में खेती घाटे का सौदा हो गयी है और किसान कर्ज के जाल में फंसता गया। इसके कारण नई पीढ़ी खेती से पूरी तरह विमुख हो रही है और शहरों में पूंजीपतियों के लिए सस्ते श्रम के बाजार का निर्माण कर रही है। नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन (NSSO) की 70 वीं राउंड रिपोर्ट के अनुसार 1 एकड़ से कम भूमि वाले किसान की मासिक आय 1308 और खर्च 5401 रुपया है। इसी तरह 5 एकड़ तक भूमि वाले किसान को आय और खर्च में 28.5 प्रतिशत का नुकसान है। भारत में उगाई जाने वाली 23 फसलों पर अध्ययन कर NSSO ने माना कि कुल लागत मूल्य में भारी बृद्धि किसानों की आय में गिरावट की जिम्मेदार है। एक अनुमान के अनुसार भारत के किसानों पर इस वक्त लगभग 11,00,000 करोड़ रुपए कर्ज है। भारत में 52 प्रतिशत किसान कर्ज में डूबा है। जिसमें से प्रति किसान पर औसत 47,000 रुपया कर्ज है। पंजाब में लगभग 3,00,000 रुपया, आंध्र प्रदेश में 1,23,400 रुपया और तेलंगाना में 93,000 रुपया प्रति खेतिहर किसान औसत कर्ज है। घाटे के कारण छोटा व मझोला किसान अपनी जमीन को बटाई या ठेके पर दे रहा है और खुद के लिए कोई और रोजगार तलाश रहा है। गांव के भूमिहीन बटाई या ठेके पर खेती कर रहा है। आज भारत की 60 प्रतिशत खेती बटाई या ठेके पर हो रही है, पर इन बटाईदारों को किसान का दर्जा प्राप्त नहीं है। इसके कारण बैंक कर्ज, नुकसान का मुआवजा और एमएसपी पर फसल खरीद सहित किसानों को मिलने वाली सरकारी सुविधा से वास्तविक खेती करने वाला यह 60 प्रतिशत हिस्सा वंचित रह जाता है।

बीज, कीटनाशक के बाजार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा  

भारत में घाटे की खेती का मुख्य कारण खेती की लागत में लगातार हो रही बढोतरी है। भारत के बीज बाजार पर मोसांटो और करगिल जैसी दैत्याकार अमरीकी बीज कंपनियों का कब्जा होता जा रहा है। भारत दुनिया का 8वां बड़ा बीज बाजार है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां 1 अरब डॉलर से भी ज्यादा का कारोबार करती हैं। भारत के बीज उद्योग में कारपोरेट का दखल 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। भारत के बीज बाजार के 75 प्रतिशत से ज्यादा पर इनका कब्जा हो चुका है। सन् 1967 में भारत में गेहूं की कीमत 76 रूपए प्रति क्विंटल और खेती के यंत्र में इस्तेमाल होने वाले लोहे की कीमत 65 रूपए प्रति क्विंटल थी। आज 53 वर्ष बाद भारत में गेहूं की कीमत 1700 रुपए प्रति क्विंटल और लोहे की कीमत 5500 रुपए प्रति क्विंटल है। इन कंपनियों द्वारा उत्पादित टमाटर का बीज 40,000 रुपए किलो, गोभी का बीज 25 से 40 हजार रुपया किलो और शिमला मिर्च का बीज 1,00,000 रुपए किलो तक बेचा जा रहा है। भारत-अमेरिका कृषि ज्ञान संबंधी समझौते के बाद हमारे कृषि शोध संस्थान और कृषि विश्वविद्यालय अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अधीनता में जा रहे हैं।  

भारत में हरित क्रांति- खेती किसानी की तबाही व गुलामी की नीव

भारत में खेती किसानी की इस दुर्दशा की कहानी 1967 से ही लिखनी शुरू हो गयी थी जब अपनी बिना लागत की खेती को हरित क्रांति के नाम पर अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता की ओर ढाला गया। हरित क्रान्ति के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों, रासायनिक खादों और कीटनाशकों का जमकर हमारी खेती में प्रयोग कराया गया। धीरे–धीरे हमारे परम्परागत बीज विलुप्त हो गए।

भारत की खेती किसानी पर दूसरे बड़े हमले की नीव 1995 में रखी गई, जब भारत सरकार ने किसानों व देश के लोकतांत्रिक जनमत के व्यापक विरोध के बावजूद विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल होने का फैसला किया। बाद में भाजपा की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने 1999 की जीत के बाद WTO की शर्तों को जोर-शोर से लागू करना शुरू किया। WTO के दबाव में कृषि उत्पादों के लिए वायदा कारोबार के दरवाजे खोल दिए गए। जिसके कारण बाजार में भाव न मिलने के कारण 2004 के बाद ही किसानों को अपना आलू, टमाटर, प्याज सड़क पर फेंकने और गन्ना जलाने को मजबूर होना पड़ा। खेती की हमारी कुल आय में 27 प्रतिशत हिस्सा पशुपालन से आता है। भारत में उत्पादित कुल दूध का 70 प्रतिशत उत्पादन मध्यम किसान, गरीब किसान, भूमिहीन और खेत मजदूर करता है। गोरक्षा कानून के जरिए गायों की खरीद बिक्री पर लगी रोक से ग्रामीण ग़रीबों और छोटे मझोले किसानों के सहायक रोजगार दुग्ध उत्पादन पर भी हमला हुआ है।  

आजाद भारत में भूमि सुधारों की शुरुआत 

आजादी की लड़ाई के अंतिम दौर में तेलंगाना किसान विद्रोह के जारिये देश में भूमि सुधार की चुनौती कम्युनिस्टों ने पेश कर दी थी। आजादी के बाद भारत में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, मद्रास, असम एवं बाम्बे राज्य सबसे पहले अपने यहां 1949 में जमींदारी उन्मूलन बिल लाए। इन सब ने गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन समिति की रिपोर्ट को अपने बिल का आधार बनाया। 1950 में भारत सरकार भी जमींदारी उन्मूलन कानून ले आई। पर जमींदार इसके खिलाफ अदालत में चले गए। क्योंकि संविधान में उस वक्त संपत्ति के अधिकार का आर्टिकल 19, 31 संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देता था।

1951 में केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन कर संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने वाले प्रावधान बदले। इससे देश में जमींदारी उन्मूलन कानूनों को लागू करने का रास्ता साफ़ हुआ। इसके बाद राज्य सरकारों ने 17,00 लाख हैक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया। इसकी एवज में जमींदारों को 670 करोड़ रुपए मुआवजा बांटा गया। कई राज्य सरकारों ने जमींदारों से फंड लेकर उन्हें जमीन के 10 से 30 साल के बांड जारी कर दिए, ताकि जमीनों पर उनका नियंत्रण बना रहे।

नेशनल कांफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला ने सर्व प्रथम जम्मू कश्मीर में एक क्रांतिकारी भूमि सुधार कार्यक्रम लागू किया। 1950 में उनके द्वारा लाये गए “बिग लैंडेड एस्टेट्स अबोलिशन एक्ट” के तहत (भूमि की अधिकतम सीमा 182 कैनाल (22.75 हेक्टेयर) तय कर दी गई। इसमें बागानों, चारागाहों, जलाऊ और न जोतने योग्य बेकार भूमि को शामिल नहीं किया गया। जिन किसानों को ज़मीन उपलब्ध कराई गई उनके लिए 160 कैनाल की सीमा निर्धारित की गई जिसमें पहले से मालिकाने की ज़मीन भी शामिल थी।  

1957 में केरल प्रदेश में चुनाओं के जरिये दुनिया की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में बनी। सत्ता में आते ही इस सरकार ने राज्य में भूमि सुधार और शिक्षा में सुधार की बड़ी मुहिम को चलाया। तेलंगाना आन्दोलन के बाद भी जमींदारी प्रथा के खात्मे और जमीनों के बटवारे के लिए देश भर में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में आन्दोलन चलते रहे।

किसान आन्दोलन की इस आग को कुछ ठंडा करने के लिए सर्वोदयी नेता विनोवा भावे ने 1951 में भूदान आन्दोलन की शुरुआत की। इसके तहत उन्होंने देश भर में जमींदारों, राजे-रजवाड़ों से 47,63,617 एकड़ जमीन दान में ली। इसमें सर्वाधिक 21 लाख एकड़ से ज्यादा जमीनें संयुक्त बिहार से मिली थी। बिहार के जमींदारों ने 6,48,593 एकड़ और झारखंड के जमींदारों ने 14,69,280 एकड़ जमीनें विनोबा जी को दी थी। इनमें से ज्यादातर जमीनें आज तक भूमिहीनों को नहीं दी गई है। बिहार में मात्र 2,78,320 एकड़ जमीनें ही आज तक बंट पायी हैं, जबकि झारखंड में मात्र 4,88,735 एकड़ जमीनें ही भूमिहीनों तक पहुंच पाई हैं।   

विकास के नाम पर खेती की जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण  

एक तरफ हमारी आबादी लगातार बढ़ रही है, दूसरी तरफ विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर खेती की जमीन का अधिग्रहण हो रहा है। एसीजेड के नाम पर लाखों एकड़ कृषि भूमि बड़े कारपोरेट के हवाले की गयी। देश के अन्दर 6 से 8 लेन के 1,455.4 किलोमीटर लम्बे 21 एक्सप्रेस वे बन चुके हैं और 7,491.1 किलोमीटर लम्बे 27 एक्सप्रेस वे निर्माणाधीन हैं। इसी तरह 6,672 किलोमीटर लम्बे चार क्षेत्रीय रेल कारीडोर और 3,360 किलोमीटर लम्बे दो रेल फ्रेट कॉरीडोर बन रहे हैं। इनके दोनों ओर लाखों एकड़ कृषि भूमि को औद्योगिक गलियारों और व्यवसायिक गतिविधियों के लिए अधिसूचित कर दिया गया है।आदिवासी-वनवासी क्षेत्रों में खनिज व वन संपदा से भरपूर आदिवासियों और वन विभाग की लाखों एकड़ जमीनें बड़े कारपोरेट को दी जा रही हैं। 

भारत के वर्तमान कृषि संकट के समाधान का रास्ता 

खेती के कारपोरेटीकरण की राह को बदल कर छोटी व मझोली खेती को लाभप्रद बनाना होगा। अब तक किसानों को कर्ज से मुक्ति और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप फसलों की सम्पूर्ण लागत में 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़कर समर्थन मूल्य देना होगा। बाजार में किसान के मोलभाव की ताकत को बढाने के लिए इस मूल्य पर हर कृषि उत्पाद की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने के लिए देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत तथा और भी विस्तारित करना होगा। खाद्य सुरक्षा की गारंटी के लिए कृषि भूमि के सरंक्षण का कानून बनाना होगा। बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा देने के लिए कानून, कृषि में लागत कम करने के लिए बीज, कीटनाशक, उर्बरक और कृषि यंत्रों की कीमतों के जरिये किसानों की भारी कारपोरेट लूट को नियंत्रित करना होगा।     

(पुरुषोत्तम शर्मा अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव हैं। 10,11,12 मार्च, 2019 को नेपाल की राजधानी काठमांडू में खाद्य संप्रभुता एवं किसान अधिकार संबंधी प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दिया गया वक्तव्य)  

 










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