चार सालों में मोदी सरकार ने समृद्ध ओएनजीसी को बना दिया कंगाल

मुद्दा , नई दिल्ली, बुधवार , 10-10-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। तेल एंव प्राकृतिक गैस आयोग (ओएनजीसी) के ट्रेड यूनियन कर्मचारी-मजदूर संघ (ईएमएस) ने मोदी सरकार पर सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न कंपनी को बर्बाद करने का आरोप लगाया है। मजदूर संगठन ने कहा है कि एक मुनाफे में चलने वाली कंपनी को मोदी ने घाटे के कगार पर पहुंचा दिया है। संगठन ने सरकार पर कंपनी के निर्णयों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया है। कंपनी का कहना है कि बीजेपी नेता संबित पात्रा के अयोग्य होने के बावजूद कंपनी में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर नियुक्त किया जाना इसका खुला संकेत था। गौरतलब है कि उनकी नियुक्ति का मामला अभी कोर्ट में है।

4 सितंबर 2018 को पीएम को संबोधित पत्र में संगठन ने बीजेपी पर क्रोनी पूंजीवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। जिसमें उसने बहुत सारे सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों के नियंत्रण में देने की बात कही है। यूनियन का कहना है कि इससे राष्ट्रीय हितों को बहुत चोट पहुंचेगी।

चार पेज के इस पत्र में ढेर सारे संदिग्ध फैसलों का जिक्र किया गया है: 

जीएसपीसी गैस ब्लॉकों का ओएनजीसी के हवाले किया जाना

इस पत्र में विस्तार से बताया गया है कि कैसे ओएनजीसी को गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कारपोरेशन (जीएसपीसी) के गैस ब्लाकों को 8000 करोड़ रुपये पर लेने के लिए मजबूर किया गया। जबकि सच्चाई ये है कि ये कंपनी पहले ही पिछले 10 सालों में तकरीबन 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान कर चुकी है।

पत्र में कहा गया है कि “2016 के दौरान भारत सरकार ने ओएनजीसी को कृष्णा-गोदावरी बेसिन में जीएसपीसी से जुड़े ब्लाकों को 8000 करोड़ रुपये पर अपने हाथ में लेने के लिए दबाव डाला.....यहां तक कि खुद जीएसपीसी बड़ी रकम खर्च करने, विदेशी विशेषज्ञों को बुलाने और अत्याधुनिक उपकरणों की मदद लेने के बावजूद कोई गैस नहीं खोज सकी। उसके बाद ओएनजीसी को क्यों ब्लाकों को लेने के लिए कहा गया? ” 

इसमें आगे कहा गया है कि ये बिल्कुल साफ तौर पर ओएजीसी द्वारा जीएसपीसी को बेलआउट करने का केस है। और इसके लिए पूरी तरह से सरकार और उसके अधिकारी जिम्मेदार हैं।

हिंदुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) का पूरा स्टेक 36915 करोड़ में खरीदना वो भी 14 फीसदी अधिक कीमत पर

पत्र में केंद्र सरकार पर ओएनजीसी की आगे की बढ़त को दबाने के मकसद से एचपीसीएल में सरकार के कुल 51 फीसदी शेयर को खरीदने का दबाव बनाने की बात कही गयी है। और ये सब कुछ बाजार के बाहर और उससे 14 फीसदी ज्यादा कीमतों पर किया गया। संगठन का कहना है कि सरकार ने ये सब कुछ अपने राजस्व घाटे को कम करने के मकसद से किया।

ओएनजीसी के ज्यादातर क्षेत्रों में निजी घरानों की घुसपैठ

पत्र में कहा गया है कि ओएनजीसी के 85 फीसदी कच्चे तेल के उत्पादन के फैसले लेने वाले निकायों को निजी खिलाड़ियों के हवाले कर दिया गया है। सरकार का ये फैसला अब लौटाया नहीं जा सकता है और इससे राष्ट्रीय हितों को गहरी चोट पहुंचने जा रही है।

ओएनजीसी और दूसरी पीएसयू को सरकारी प्रोजेक्टों के लिए सीएसआर फंडिंग को बढ़ाने के लिए दबाव बनाना

पत्र में ये भी कहा गया है कि सरकार ओएनजीसी समेत दूसरे पीएसयू पर सरकारी प्रोजेक्टों के लिए सीएसआर फंडिंग को बढ़ाने के लिए दबाव डाल रही है जबकि ये काम केंद्र सरकार का है।

पत्र के मुताबिक “सरकार द्वारा संचालित एलपीजी वितरण, शौचालयों का निर्माण, विकास के लिए गांवों को गोद लेना और सोलर लाइट मुहैया कराना, स्कूलों की लड़कियों में सैनिट्री नैपकिन वितरण आदि को ओएनजीसी या फिर दूसरे पीएसयू को फंडिंग के लिए कहा जा रहा है।”

भारत सरकार केंद्रीय योजनाओं की सीएसआऱ फंडिंग के जरिये गैरजरूरी लाभ हासिल करना चाह रही है। मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने लगातार हस्तक्षेप के जरिये ओएनजीसी जैसी एक समृद्ध कंपनी को सबसे ज्यादा कर्जों वाली कंपनी में तब्दील कर दिया है।

संगठन ने कहा है कि इस तरह से लगातार हस्तक्षेप से न केवल देश को नुकसान होगा बल्कि राष्ट्रीय खजाने को भी बहुत ज्यादा घाटा होगा। लिहाजा उसने ओएनजीसी को स्वतंत्र रुप से अपना फैसला लेने की छूट देने के लिए तीन महीने का समय दिया है। वरना संगठन ने सरकार के खिलाफ आंदोलन में उतरने धमकी दी है।








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