दिलीप मंडल का नेताओं को पत्र: “इंसानियत ही नहीं बची, तो आपकी सरकार बनने या न बनने की चिंता मैं क्यों करूं”

ज़रा सोचिए... , , शुक्रवार , 22-06-2018


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दिलीप मंडल

दिलीप मंडल का खुला पत्र

(देश के सभी तथाकथित सेकुलर और सामाजिक न्याय की बात करने वाले नेताओं के नाम)

महोदया/महोदय,

मुझे मालूम है कि आप सब आने वाले विधानसभा चुनावों और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त होंगे। आप राज्यस्तरीय, जिलास्तरीय और चुनाव क्षेत्र स्तरीय सभाएं कर रहे होंगे।

सदस्यता अभियान चला रहे होंगे, कैंडिडेट चुन रहे होंगे, गठबंधन बना रहे होंगे, चुनावी नारे और घोषणापत्र लिखने का काम चल रहा होगा। सबसे बड़ी बात कि आप लोगों के पास बीजेपी की तरह कॉरपोरेट समर्थन नहीं है, इसलिए पैसा जुटाना आप लोगों के लिए मुश्किल का काम बन गया है। आप में से कई लोग मेरे निजी मित्र भी हैं, इसलिए अंदाजा है कि आप कितने सारे कामों में लगे हैं।

ऐसे व्यस्त समय में आपको परेशान करने की कोशिश कर रहा हूं, तो यह मान लीजिए कि मामला कितना गंभीर है। बेहतर होता कि यह पत्र लिखने की नौबत न आती। लेकिन आप लोगों की स्थिति को देखते हुए यह पत्र लिखना पड़ रहा है।

महोदया/महोदय,

आपको मालूम है कि हाल के दिनों में खासकर मुसलमानों और दलितों पर गाय के नाम पर या किसी भी बहाने से हमले बढ़ गए हैं। आदिवासी तो हमेशा से हमलों का शिकार हो रहे हैं। ये तीन समुदाय मिलकर देश की लगभग 40% आबादी हैं। ओबीसी का हक मारा जा रहा है, लेकिन शारीरिक हमले उन पर कम होते हैं। इसलिए उनकी बात फिलहाल छोड़ देते हैं।

मैं आपका ध्यान हाल में खासकर मुसलमानों पर हो रहे हमलों की ओर दिलाना चाहूंगा। मुसलमानों की बात खास तौर पर इसलिए क्योंकि दलितों और आदिवासियों पर होने वाले हमलों पर आप लोग कुछ न कुछ प्रतिक्रिया जरूर देते हैं। जैसे हमने देखा कि ऊना कांड पर लगभग सारा विपक्ष एकजुट हुआ। एससी-एसटी एक्ट पर भी पूरा विपक्ष एकजुट हुआ।

लेकिन मुसलमानों पर हो रहे हमलों को लेकर आप लोगों में एक अजीब सी चुप्पी है। मैं समझ सकता हूं कि बीजेपी और आरएसएस मुसलमानों को जानबूझकर निशाना बना रहे हैं, ताकि उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया हो और वे हिंदू के नाम पर ध्रुवीकरण कर लें। आपको हिंदू ध्रुवीकरण का डर सता रहा है। आप लोगों के बीच रहता हूं। समझ सकता हूं आपका डर।

लेकिन मेरा एक सवाल है। आपको परेशान करेगा।

विपक्षी नेता क्या इसलिए खामोश रहेंगे कि मुसलमानों के लिए न्याय की बात करने से कोई काल्पनिक हिंदू ध्रुवीकरण हो जाएगा? अगर हिंदू ध्रुवीकरण इतना आसान है और अगर जनता पर विपक्षी दलों की कोई पकड़ नहीं है तो फिर हिंदू ध्रुवीकरण तो होकर रहेगा। आपके रोकने से वह रुकेगा नहीं।

मैं चाहता था कि पिलखुआ या अलवर या दादरी या झारखंड में मुसलमानों पर जुल्म होने पर विपक्षी दलों का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वहां जाता और समाज के तमाम तबकों को लेकर शांति कमेटी बनाता। मोहल्ला स्तर पर बैठकें करता।

मिसाल के तौर पर, पिलखुआ में अगर सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद के नेता यानी अखिलेश यादव, बहनजी, राहुल गांधी और अजित सिंह जाकर अमन चैन की अपील करते और अपने समर्थकों से कहते कि मुसलमानों के साथ मिलकर रहो तो क्या संघियों की हिम्मत होती कि कोई हिंसा कर दे। पिलखुआ के जाट, दलित, पिछड़े साथ खड़े हो जाएं, तो किसकी हिम्मत है कि हिंसा कर दे। इनको साथ देखने भर से संघियों की हाफपैंट गीली हो जाएगी।

लेकिन आप यह कर क्यों नहीं पा रहे हैं? किस बात का डर है? मत डरिए। न्याय का साथ देने से कोई हिंदू ध्रुवीकरण नहीं होगा। आपके पक्ष में इंसानियत का ध्रुवीकरण बेशक हो जाएगा।

झारखंड में अगर झारखंड मुक्ति मोर्चा, आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दलों के कार्यकर्ता एकजुट होकर कह दें कि हमें हिंसा नहीं चाहिए तो हिंसा करने की हिम्मत किसे होगी?

विपक्ष अगर एकजुट होकर हिंसा के खिलाफ खड़ा हो जाए, तो देश के किसी भी हिस्से में हिंसा नहीं हो पाएगी। संघी कुछ उत्पात करेंगे लेकिन उनका खास असर नहीं होगा।

मेरा मानना है कि ऐसे नाजुक मौके पर, विपक्ष को हिंदू ध्रुवीकरण के काल्पनिक डर को त्याग देना चाहिए। न्याय के पक्ष में खड़े होने से अगर आप एक चुनाव हार भी जाते हैं तो क्या बिगड़ जाएगा। और आप चुनाव हार क्यों जाएंगे। आपकी चट्टानी एकता किसी भी संघी साजिश का मुकाबला करने के लिए काफी है। 

कायदे से आपको पूरे देश में जिला, शहर और गांव के स्तर पर तमाम समुदायों को लेकर अमन कमेटियां बनानी चाहिए। सिर्फ नारेबाजी से, और गठबंधन के साथियों के साथ फोटो खिंचाने से सांप्रदायिकता का मुकाबला नहीं हो पाएगा।

देखिए, गांधी से मेरा लाख विरोध है। वह वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे। दलित विरोधी थे। पूंजीपतियों की दलाली करते थे। लेकिन उनमें इंसानियत थी। दंगा होने पर सीना खोलकर दंगाइयों के सामने खड़े होने का बंदे में दम था।

यह दम आज के विपक्षी नेताओं में क्यों नहीं है। वे यह क्यों सोच रहे हैं कि मुसलमान तो हमें वोट देगा ही। बेशक देगा। लेकिन आपका भी तो कोई दायित्व बनता है।

आप मुसलमानों के प्रति कोई दायित्व मत निभाइए। इंसानियत का फर्ज अदा कीजिए।

क्या आपसे इतनी सी उम्मीद की जा सकती है? और अगर आप इतना भी नहीं कर सकते, तो मुझे खाक फर्क नहीं पड़ता कि आप चुनाव हारते हैं कि जीतते हैं। इंसानियत ही नहीं बची, तो आपकी सरकार बनने या न बनने की चिंता मैं क्यों करूं।

सधन्यवाद,

इंसानियत की मुहिम में आपका दोस्त

दिलीप मंडल

नई दिल्ली, 21 जून, 2018








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