पद्मावती विवाद: घातक प्रवृत्तियों के अशुभ संकेत

पड़ताल , , मंगलवार , 21-11-2017


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डॉ. राजू पांडेय

पद्मावती फ़िल्म पर विवाद जारी है। मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा 1540 ईस्वी में रचे गए महाकाव्य पद्मावत ने पद्मावती को वह छवि प्रदान की जो आज हमारे मानस पटल पर अंकित है। पद्मावत में कल्पना और अतिश्योक्ति का -जैसा कि महाकाव्य में होना भी चाहिए- भरपूर प्रयोग किया गया है। पद्मावत पूरे विश्व में रची गई ऐसी अनेक साहित्यिक कृतियों में एक है जिनकी प्रेरणा किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व या घटना से प्राप्त हुई। आज की परिस्थितियों में सृजन के लिए वास्तविक या मिथकीय इतिहास से प्रेरणा प्राप्त करना स्वयं को जोखिम में डालना है। पद्मावती की ऐतिहासिकता यद्यपि अब स्वीकार कर ली गई है लेकिन अब भी न सुलझने वाले अनेक प्रश्न हैं जिनका प्रारम्भ इस चरित्र के नाम से होता है – क्या पद्मावती नाम काल्पनिक है और पद्मिनी नाम वास्तविक? कर्नल टॉड ने मेवाड़ के भाटों के विवरण को आधार बनाकर जो इतिहास रचा है वह भी किसी भी रूप में प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता। फिर भी कहा जा सकता है कि पद्मावती एक मिथक के रूप में ही सही आज भी जीवित है और एक समुदाय विशेष के लिए न केवल प्रेरणा का स्रोत है बल्कि पूजनीय भी है। आज महत्व पद्मावती की ऐतिहासिकता से अधिक उसकी स्वीकृत काल्पनिक आदर्श छवि का है जिससे जन भावनाएं जुड़ी हुई हैं। 

पद्मावती की आदर्श छवि की विशेषताएं क्या हैं- यदि इसका विश्लेषण करें तो पितृसत्तात्मक समाज द्वारा नारी के लिए रचे गए मूल्यों पर खरी उतरती नारी के दर्शन होते हैं। तत्कालीन समाज में बहुपत्नीप्रथा प्रचलित थी और राजाओं द्वारा एकाधिक रानियों को अपने रनिवास में स्थान देना कोई असाधारण घटना नहीं थी और यह विलास की श्रेणी में भी नहीं आता था। विलासिता तो इसके अतिरिक्त होती थी। जाति, धर्म और भूगोल की सीमाओं को तोड़ते हुए राजाओं द्वारा नारी को भोग्या और दासी के रूप में इस्तेमाल किया गया है। संभवतः यह पद्मावती के व्यक्तित्व की विलक्षण विशेषताएं ही थीं कि वह रानियों की भीड़ में एक अलग स्थान बना सकी और शायद अपने राजा पति की मैत्री अर्जित कर सकी। जिन पारंपरिक मूल्यों पर उसे खरा उतरना था उनमें वर्जना का तत्व प्रधान था। उसे लंबा घूंघट काढ़ना था और अपनी साथी रानियों की भांति रनिवास में परपुरुषों की छाया से दूर रहते हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी थी कि राजा पति कब अपना समय बिताने के लिए उसका चयन करें। अपने उल्लास को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की उसे मनाही रही होगी और उसके उल्लास की आभा रनिवास और राजमहल की चारदीवारी से टकराकर रह गई होगी। पद्मावती को लेकर हुए युद्ध को एक नारी पर आधिपत्य जमाने के लिए दो पुरुषों के संघर्ष के रूप में भी देखा जा सकता है जिसका आधार पुरुषवादी अहंकार अधिक था और नारी की गरिमा कम। कौमार्य, सतीत्व और पवित्रता नारी के लिए गढ़े गए ऐसे मूल्य थे जिनका पालन पुरुष प्रधान समाज तब सुनिश्चित करता था। परपुरुष का दासत्व स्वीकार करने से अच्छा स्वयं की अग्नि में आहुति दे देना माना जाता था, यही पद्मावती और अन्य स्त्रियों ने भी चुना। पुरुषों को पुरुषप्रधान समाज ने सती प्रथा और जौहर जैसी पवित्रता अक्षुण्ण रखने की प्राणघातक प्रथाओं से दूर ही रखा है। 

आज जब राजपूत महिलाओं को हम हाथों में तलवारें उठाए और इनका इस्तेमाल करने की धमकी देते देखते हैं तो दुःखमिश्रित आश्चर्य होता है कि नारी अब भी पुरुषवादी मूल्यमीमांसा के आधार पर अपना आकलन करती है। हालाँकि यह बात संतोष देती है कि राजपूत स्त्रियाँ न अब सती होती हैं, न हमेशा पुरुषों की छाया से दूर घूंघट में रहने के लिए बाध्य की जाती हैं, जौहर का तो खैर अब प्रश्न ही नहीं उठता। फिर इनका विरोध किस कारण है? क्या यह छद्म अस्मिता की प्रचलित राजनीति का एक हिस्सा है? पद्मावती का महिलाओं के द्वारा विरोध - चाहे पुरुषवादी मूल्य मीमांसा के प्रति उनकी आस्था के कारण हो या फिर छद्म अस्मिता की राजनीति के प्रति उनके स्वीकार के कारण- पश्चगामी प्रवृत्ति का द्योतक है। 

पद्मावती के विरोध में हुए प्रदर्शनों में जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ है वह आश्चर्य चकित करने वाली है। नाक काटने और सिर काटने की धमकियां दी जा रही हैं और इनके लिए बाकायदा पुरस्कार भी घोषित किए जा रहे हैं। संभवतः सामंत युग में ऐसी ही भाषा को वीरोचित माना जाता था। सरकार इतनी सहिष्णुता से इस पूरे घटनाक्रम को देख रही है कि इसका निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि वह इन्हें प्रोत्साहित कर रही है। यद्यपि ऐसा होना तो नहीं चाहिए। यह भी हो सकता है कि सरकार इस तरह की बयानबाजी को भाषा के अलंकार के रूप में देख रही हो जिसके यथार्थ में बदलने की संभावना कम ही होती है। हमें डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह की गिरफ्तारी के बाद हुई हिंसा को भूलना नहीं चाहिए हालाँकि सरकार का मानना है कि उसने सम्यक कार्रवाई की और यदि वह प्रो एक्टिव होती या ओवर रियेक्ट करती तो शायद और ज्यादा हिंसा होती। अनेक राज्य सरकारें कानून व्यवस्था का हवाला देकर एक ऐसी फिल्म को प्रतिबंधित कर रही हैं जिसे अभी तक सेंसर बोर्ड तक ने नहीं देखा है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल फ़िल्म का विरोध कर रहे हैं। किसी को इतिहास से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं है किन्तु कोई भी यह तय होने तक इंतज़ार करना नहीं चाहता कि फ़िल्म इतिहास को विकृत रूप से प्रस्तुत करती है या नहीं। संभवतः वोटों की राजनीति के तकाजे इन राजनीतिक दलों को आंदोलनरत समुदाय का साथ देने के लिए बाध्य कर रहे हैं। सेंसर बोर्ड भी कोई अतिरिक्त जल्दीबाजी दिखाने के विरुद्ध है और प्रक्रिया से चलना चाहता है। 

कुल मिलाकर ऐसी परिस्थितियाँ बन रही हैं या बनाई जा रही हैं कि यह विवाद लंबा खिंच रहा है। चुनावी राजनीति की समझ रखने वाले अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद गुजरात चुनावों तक परवान चढ़ेगा और इसके बाद चर्चा से बाहर कर दिया जाएगा और फ़िल्म की रिलीज का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। चुनावों में जातिवाद के इस्तेमाल का चलन भारतीय लोकतंत्र के लिए नया नहीं है किंतु यह विवाद राष्ट्रवाद की परिभाषा से भी जुड़ा हुआ है। भारत जैसे बहु धार्मिक और बहु जातीय देश में क्या धार्मिक-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एकता के सूत्र में बांधने वाला हो सकता है? यदि हम अपनी धार्मिक और जातीय पहचान के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता दर्शाने लगेंगे तो इस बात की आशंका भी बढ़ती चली जाएगी कि अन्य जातीय और धार्मिक समुदायों के साथ विवाद के अवसर बढ़ेंगे क्योंकि अपनी सर्वश्रेष्ठता का अहंकार उनमें भी उत्पन्न होते देर नहीं लगेगी। इस विचार पर गंभीरतापूर्वक चर्चा होनी चाहिए कि भारत के संदर्भ में राष्ट्रवाद, जातीय और धार्मिक अस्मिता को उग्रतापूर्वक रेखांकित कर विमर्श के केंद्र में ले आने के स्थान पर उनकी सीमाएं तय करने से प्रगाढ़ होगा। राष्ट्रवाद का राजनीतिक उपयोग राजनीति में सफलता पाने का माध्यम जरूर बन सकता है लेकिन राष्ट्र के अस्तित्व के लिए यह अत्यंत घातक है। सत्ता पक्ष और विपक्ष का राष्ट्रवाद यदि अलग अलग है तो अवश्य इसमें राजनीतिक हितों की मिलावट है। वामपंथ के अन्तरराष्ट्रीयतावाद और दक्षिण पंथ के संकीर्ण राष्ट्रवाद को भारतीय परिप्रेक्ष्य में ढलना होगा। राजनीतिक वर्चस्व के लिए मूलभूत अवधारणाओं से छेड़छाड़ आत्मघाती सिद्ध हो सकती है।

 

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है ये विवाद
  • भंसाली ने भी किया नियमों का उल्लंघन

 

यह विवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन के आरोपों को भी स्पर्श करता है। किसी भी धर्म, देश या समाज में सेंस ऑफ ह्यूमर की मौजूदगी उसके स्वास्थ्य और दीर्घजीविता की निशानी होती है। जितना ही हम खुद पर व्यंग्य और आलोचना को प्रोत्साहन देंगे उतने ही अवसर हमें अपनी कमियों को जानने के मिलेंगे। सत्तापक्ष की आलोचना राष्ट्रद्रोह नहीं है। बल्कि सत्तापक्ष की आलोचना स्वाभाविक है क्योंकि उसके उत्तरदायित्वों और कार्य का क्षेत्र व्यापक होता है, इस कारण त्रुटियों की संभावना भी अधिक होती है। फिर लोगों की अपेक्षाएं भी सत्ता पक्ष के प्रति अधिक होती हैं जिनके पूर्ण न होने पर आलोचना होती है। हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हम अपने देवी देवताओं, महापुरुषों और राष्ट्रनेताओं को हास्य व्यंग्य का विषय बना सकते हैं। यह हमारी उनके प्रति अश्रद्धा नहीं है बल्कि समय के साथ स्वयं हमारे द्वारा उन पर आरोपित कर दिए गए अंधविश्वासों को दूर करने का एक प्रयास है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने अपना सेंस ऑफ ह्यूमर गंवा दिया, जिन्होंने आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया वे धार्मिक कट्टरता के शिकार हुए जिसकी परिणति राजनीतिक और सैनिक तानाशाही में हुई और वहाँ के लोगों को नारकीय जीवन जीने को बाध्य होना पड़ा। इसी प्रकार इतिहास के विभिन्न पाठों के प्रति लचीला रुख और उदारता किसी जीवित जाग्रत समाज की निशानी है।

संजय लीला भंसाली की पद्मावती से पहले देश और दुनिया में ऐसी सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं जो इतिहास पर आधारित होने का दावा करती रही हैं। भारत में ही मुगले आजम का उदाहरण लिया जा सकता है। इस बहुप्रसिद्ध फ़िल्म में के आसिफ की प्राथमिकता सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी को रेखांकित करना था इसलिए अकबर का जो चरित्र पेश किया गया था वह उसकी उदार और सहिष्णु छवि से मेल नहीं खाता था। फिल्मकारों की प्राथमिकता के अनुसार ऐतिहासिक विषयों को अलग अलग ट्रीटमेंट मिलता रहा है। विश्व के विभिन्न देशों में रामायण पर आधारित महाकाव्य, नाट्य प्रस्तुतियां,  सीरियल और फिल्में देश काल की परिस्थितियों और तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं तथा कवि, नाटककार या फ़िल्मकार की प्राथमिकता से प्रभावित रही हैं। यदि संजय लीला भंसाली ने क्रूर, बर्बर और नृशंस अलाउद्दीन खिलजी का महिमामंडन किया है तो इसके लिए उन्हें अवश्य दंडित किया जाना चाहिए किंतु यदि वे जनमानस में अंकित पद्मावती की आदर्श छवि को अक्षुण्ण रखने में सफल रहे हैं तो फिल्मकार के रूप में उनके ट्रीटमेंट को स्वीकार किया जाना चाहिए। संजय लीला भंसाली ने गलतियाँ की हैं। वे चाहते तो फ़िल्म का और फ़िल्म के पात्रों का नाम बदल सकते थे। इस प्रचार से बच सकते थे कि फ़िल्म बहुत रिसर्च के बाद बनी है और ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक है। वे प्रभावित समुदाय के लोगों को फ़िल्म निर्माण की प्रक्रिया में सम्मिलित कर सकते थे। सेंसर बोर्ड की मौजूदगी को दरकिनार कर कथित विशेषज्ञों के सम्मुख स्पेशल स्क्रीनिंग की जो गलत परंपरा अब उन्होंने डाली है इससे मिलता जुलता कोई प्रयास फ़िल्म की फाइनल एडिटिंग के समय उन्होंने किया होता तो यह विवाद ही न होता। किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। भंसाली कोई संत नहीं हैं। वे एक व्यावसायिक फ़िल्म निर्माता हैं जो धन कमाने के ध्येय से फिल्में बनाते हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि इस विवाद से वे फ़िल्म की पब्लिसिटी की आशा कर रहे हों। यदि उन्होंने फ़िल्म की पब्लिसिटी के लिए इस विवाद को बढ़ने दिया है तो यही कहा जा सकता है कि फ़िल्म प्रचार का यह तरीका घृणित और निंदनीय तो है ही खतरनाक भी है।

पद्मावती को लेकर चल रहे इस विवाद में अनेक घातक प्रवृत्तियों के अशुभ संकेत छिपे हुए हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

(डॉ. राजू पाण्डेय नियमित तौर पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)






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Rohit Sharma :: - 11-21-2017
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