पद्मावती का सच-भाग3: आरएसएस की गोद में बैठ गए हैं अंग्रेजों का साथ देने वाले राजस्थान के रजवाड़े

विशेष , , शनिवार , 18-11-2017


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अमरेश मिश्र

यूरोपीय सहित्य में सामंती-मध्ययुगीन दौर के उत्तरार्ध में वीरता की एक नई धारा उभरी। यूरोपीय कवियों और वीर रस के लोक-गीतों में भी अचानक प्रेम के पहलू उभरने लगे। वीरों की प्रेम कथायें सामने आयीं। सामन्ती-मध्ययुग का उतरार्ध प्रगतिशील-पूंजीवाद के नये बीजों के फूटने का समय था। उस समय के सहित्य में chivarlous love poetry  यानी वीरों की प्रेम कथायें समान्तवाद विरोधी मानी गयीं। क्योंकि इनमें नारी, 'हासिल करने वाली सामन्ती सम्पत्ति' नही रह गयी। बल्कि प्रेम का पात्र बनी। पहली बार, नारी की अपनी व्यक्त्तिगत पहचान, एक प्रेमिका के रूप में ही सही बनी। 

जायसी ने पद्मावती 16वीं शताब्दी में लिखी। जब भारत में भी प्रोटो-स्वस्थ पूंजीवादी पृवृत्तियां दाखिल हो कर सामन्ती ढांचे और संस्कृति से टकरा रही थीं। 

जायसी के समय शेरशाह सूरी दिल्ली का बादशाह था। एक दशक बाद अकबर का दिल्ली पर कब्ज़ा हुआ। शेरशाह सूरी और अकबर दोनों ने, अलग-अलग राजघराने के होते हुए भी, भारत को छोटे-छोटे राज्यों में बिखरे हुए सामन्ती समाज को बदल कर रख दिया।

राम चरित मानस की भूमिका

तुलसीदास भी 16वीं सदी के भक्ति-रस के कवि थे। उन्होंने भगवान राम की लीलायें संस्कृत के बजाय अवधी भाषा में लिख कर, भगवान को भक्ति, प्रेम और मानवीय आस्था का प्रतीक बनाया। सामन्ती प्रलापों में जकड़े काशी के पण्डित इसीलिए तुलसीदास से नफरत करते थे। बाद में 17वीं शताब्दी में, रीतिकाल के दौरान, कविता पूरी तरह सामंतवाद से परे, मानवीय, एन्द्रियवादी रंग में ढल गयी।

भरतीय इतिहास में 14वीं सदी

यूरोप की तरह, भारत में भी, 14वीं सदी से बदलाव आने शुरू हो गये थे। 1296-1316 का अलाउद्दीन खिलजी का काल अभूतपूर्व था। इलाहबाद के पास कड़ा-मानिकपुर से लेकर पंजाब में दीपलपुर तक, खिलजी ने सिंचाई और सड़क इत्यादि बनवायी। शेरशाह सूरी और अकबर से पहले, खिलजी ने बिखरे सामन्ती सैन्य बल के स्थान पर, एकीकृत सेना की नींव रखी। खिलजी ने ज़मीन का व्यापक सर्वेक्षण करवाया और राज्य का सीधे किसान से सम्बन्ध बनाने की कोशिश की। 

कैम्ब्रिज इकोनॉमिक हिस्ट्री आफ इण्डिया के अनुसार, "अलाउद्दीन खिलजी की कर प्रणाली सबसे लम्बे समय तक, एक संस्था के रूप में जीवित रही। बीसवीं सदी तक भी। खिलजी ने ही तय किया था ज़मीन का कर ही किसानों से लिया जाये। बाकी सारे कर, जिनकी उत्पादकता से कोई लेना-देना नहीं है, और जो सामंत जबरन वसूलते हैं, फिजूल हैं।

खिलजी के सुधार कार्य और उसकी 'हिन्दू-परस्ती'

खिलजी ने मंडियां बनवाईं, चीज़ों के दाम तय किए और गांव-शहर के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया को तेज किया। 

अकबर के दो सौ साल पहले, खिलजी ने हिन्दू रानियों से शादी करने की परम्परा की नींव डाली। इस क्रम में खिलजी ने गुजरात के वाघेलों की राजकुमारी कमलदेवी और देवगिरी के राजघराने की राजकुमारी झाट्यपाली से शादी रचाई। इन रानियों को इस्लाम नहीं क़ुबूल करवाया गया। उस समय के इतिहासकारों ने इन शादियों को 'राजनीतिक गठबंधनों' की संज्ञा दी। पहले-पहल, खिलजी ने विरोधियों के मन्दिर और मस्जिद तुड़वाए। फिर, हिन्दू राजाओं के साथ मेल हुआ और समझौते के बिंदु निकाले गये। खिलजी ने कई मन्दिर बनवाये।

1305 में लिखे दस्तावेज़ में अमीर खुसरो लिखते हैं की खिलजी ने हिन्दू ज़मींदारों के प्रति इतनी नरमी बरती जितनी उन लोगों को भी उम्मीद नहीं थी। कुछ मुस्लिम अतिवादियों ने बादशाह के इस सौहार्दपूर्ण रूप की आलोचना की।

अलाउद्दीन खिलजी एक नया मज़हब शुरू करना चाहता था

अकबर पहला बादशाह नहीं था जिसने 'दीन-ए-इलाही' के बारे में सोचा। हिन्दुस्तान की धरती पर खिलजी को सबसे पहले लगा की एक नया मज़हब जो सारे विभेद मिटा दे, शुरू करना चाहिये। 14वीं सदी के अन्य मुस्लिम लेखक और उलेमा जैसे ज़ियाउद्दीन बरनी खिलजी पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं कि, "खिलजी को इस्लाम में आस्था उतनी ही थी जितनी  एक अनपढ़-जाहिल को होती है"। बरनी खुद ही खिलजी के नये मज़हब बनाने के प्रयासों की आलोचना करता है। बरनी खिलजी पर 'हिन्दू-परस्त' होने का भी आरोप लगाता है। 

यह महत्वपूर्ण है कि 1316 में खिलजी कि मौत के बाद, उसकी हिन्दू रानी से पैदा हुई औलाद क़ुतुबुद्दीन शाह को सबसे पहले उसके अज़ीज़ सेना नायक मलिक कफूर ने गद्दी पर बैठाया।

पद्मावती की सामंतवाद विरोधी दास्तान अंग्रेजों की मार्फत समान्ती मूल्यों की समर्थक कहानी बन गयी!

जायसी के बाद पद्मावती के कम से कम दो और रूप सामने आये। पर कहानी में निर्णायक मोड़ ब्रिटिश लेखक जेंम्स टॉड ने अपनी मशहूर पुस्तक Annals and Antiquities of Rajasthan ने दिया। टॉड ही था जिसने पद्मावती से प्रेम प्रसंग गायब करके, पूरी दास्तान को एक वहशी मुस्लिम राजा के हवस के रूप में पेश किया। टॉड उस समय राजपूतों के इतिहास की अलग श्रृंखला बना रहा था। जिसके तहत राजपूतों का मुसलमानों से और अन्य हिन्दू जातियों से सम्बन्धों को दूर ले जाया गया। राजपूतों को कृषक समाज से अलग कर, एक शुद्ध लड़ाकू क़ौम के बतौर पेश किया जा रहा था। इसके पीछे राजस्थान के वो घराने थे जो अंग्रेजों की स्वामी भक्ति में लगे थे।

उपनिवेशवाद, फासीवाद और भंसाली की पद्मावती

फासीवाद आधुनिक समाज पर सामन्ती मूल्य थोपता है। फासीवाद की ज़मीन उपनिवेशवाद तैयार करता है। सबसे पहले अंग्रेजों ने मुगलों के समय से विकसित हो रहे आन्तरिक पूंजीवाद की भ्रूण हत्या की, उद्योग नष्ट किये। और मुगल-राजपूत-मराठा-अवध काल में पनप रही देसी आधुनिकता एवं प्रारम्भिक पूंजीवाद का गला घोंट दिया।  बंगाल से लेकर पूरे भारत में समान्त्वाद को पुन: स्थापित किया। 

भंसाली की पद्मावती खिलजी को वैसे ही पेश करती है, जैसे जेम्स टॉड ने किया। एक बर्बर, मुस्लिम आक्रांता के रूप में। और यही आरएसएस भी चाहता है। ऐसे में भंसाली संघ का ही काम कर रहे हैं।

फिल्म में दीपिका पादुकोण।

पद्मावती फिल्म के माध्यम से संघी राजपूतों को उकसा रहें हैं

बीजेपी गुजरात में बुरी तरह हार रही है। गुजरात में संघ परिवार की हार, लोकतन्त्र के माध्यम से सत्ता हासिल करने की उसकी कोशिश की हार है। अब इसके बाद संघ सत्ता हथियाने का गैर-लोकतान्त्रिक तरीका अपनाएगा। 

राजस्थान के बड़े राजपूत घराने कहतें हैं की अंग्रेज तो भारत उनको दे कर 1947 में गये थे। ये तो नेहरू बीच में लोकतन्त्र ले आया और सारा खेल खराब कर दिया। अब राजस्थान के बड़े राजपूत घराने करणी सेना का समर्थन कर रहे हैं। उसे फंडिंग कर रहे हैं। 

संघ तो पहले से ही माहौल को खराब करने की फिराक में था। और अब बड़े राजपूत घराने और  संघ के हित फिलहाल मिल गये हैं। लेकिन राजस्थान के बाहर आम राजपूत इस आन्दोलन का समर्थन नहीं कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य-प्रदेश के राजपूत राजस्थान के बड़े राजघरानों को गद्दार मानते हैं। 1857 की पहली जंग-ए-अज़ादी में कुछ अपवादों को छोड़,  राजस्थान के सभी राज घरानों ने अंग्रेजों का साथ दिया था। 

भंसाली की पद्मावती राजपूत घरानों और आरएसएस को एक अस्थायी गठ बंधन में बांधती है। जैसे-जैसे फिल्म की रिलीज़ डेट नज़दीक आयेगी, हिंसा को बढ़ावा दिया जायेगा। भाजपा राज सत्ता का एक हिस्सा भंसाली का समर्थन देगा। दूसरा हिस्सा करणी सेना का समर्थन करेगा। 

गुजरात में क्षत्रियों का एक बड़ा समूह है जो ओबीसी श्रेणी में आता है। इन गुजराती क्षत्रियों में अपनी जाति को लेकर 'हीन भावना' है। अभी तक यह तबका कांग्रेस की तरफ झुका था। फिल्म पद्मावती पर उन्माद इस हिस्से को भाजपा के पक्ष में गोलबंद कर सकता है। 

उत्तर प्रदेश में भी नगर निकाय के चुनाव हैं। भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है। यहां योगी खुद ठाकुर हैं। वो भी चाह रहे हैं की फिल्म को लेकर बवाल हो। और उत्तर प्रदेश का ठाकुर-राजपूत भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो। मुस्लिम बारावफात त्योहार भी 1 दिसंबर के आस-पास पड़ रहा है। ऐसे में बड़े दंगे भी हो सकते हैं। कम से कम आरएसएस तो कुछ इसी तरह से सोच रहा है। 

(अमरेश मिश्र इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम और अवध पर इनका विशेष काम है। और आजकल लखनऊ में रह रहे हैं।)

 






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