फ़िलस्तीन: नेहरू के रास्ते पर मोदी

देश-दुनिया , , सोमवार , 12-02-2018


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अख़लाक़ अहमद उस्मानी

जॉर्डन के हेलीकॉप्टर और इजराइली एसकोर्ट के साथ पिछले शनिवार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ़िलस्तीन की यात्रा पर पहुंचे। पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद फ़िलस्तीन की यात्रा करने वाले वह भारत के दूसरे प्रधानमंत्री हैं। पिछले साल जुलाई में नरेन्द्र मोदी की इजराइल यात्रा और पिछले महीने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू की भारत यात्रा से लगातार यह संदेश जा रहा था कि भारत ने फ़िलस्तीन के प्रति अपने रवैये को बदल लिया है और वह इजराइल की तरफ पूरी तरह झुक गया है। अरब लीग के 1 करोड़ 31 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक के भूभाग पर अपने कूटनीतिक और व्यापारिक संतुलन के लिए भारत के पास सुनहरा मौका है कि वह अरब लीग में अपने पर्यवेक्षक राज्य के दर्जे का देशहित में इस्तेमाल करे।

निहत्थे और दमन के शिकार फ़िलस्तीनियों पर इजराइली जुल्म के साथ नैतिक और ऐतिहासिक रूप से भारत खड़ा नहीं हो सकता। भारत के लिए यह आर्थिक रूप से भी घाटे का सौदा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़िलस्तीन के लिए जिन प्रमुख समझौतों की घोषणा की है वह महात्मा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की फ़िलस्तीन के प्रति नीति को ही आगे बढ़ाता है।

हालिया समझौते के मुताबिक़ भारत फ़िलस्तीन में पांच करोड़ डॉलर यानी करीब 325 करोड़ रुपये के छह समझौते हुए। इसमें करीब 200 करोड़ रुपये से भारत फ़िलस्तीन के लिए सुपर स्पेशियालिटी अस्पताल बनाएगा। इसके अलावा 50 लाख डॉलर की लागत से महिला सशक्तीकरण केंद्र बनाया जाएगा। वहीं 50 लाख डॉलर का शिक्षा क्षेत्र में एक समझौता हुआ और रमाला स्थित राष्ट्रीय प्रिंटिंग प्रेस की मशीनों को लेकर भी एक करार हुआ।

जब भी कोई ग़ैर इस्लामी, ग़ैर अरब देश फ़िलस्तीन के साथ अपने रिश्तों में गर्मी दिखाता है, इसका फ़ायदा उसे अरब लीग के 22 इस्लामी देशों और उसकी जनता का नहीं बल्कि अरब की क़रीब डेढ़ करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के बाहर की इस्लामी दुनिया में भी सकारात्मक पहुंच का फायदा पहुंचता है। वह सुदूर पूर्व इंडोनेशिया, मलेशिया या ब्रुनेई हो, मध्य एशिया में कज़ाख़स्तान या किर्गिज़िस्तान हो, यूरोप का बोस्निया, कोसोवो या अल्बानिया हो या फिर अफ़्रीका में नाइजीरिया सेनेगल से लेकर जिबूती तक का इलाक़ा हो। इसके अलावा फ़िलस्तीन के प्रति हमदर्दी का रुख रखने का अर्थ समाजवाद और वामपंथ के उस बड़े धड़े तक भी भारत को अपनी छवि के सकारात्मक होने का लाभ मिलता है जिसकी अगुवाई ख़ुद भारत ने गुट निरपेक्ष आंदोलन के रूप में रखी थी।

दक्षिण अमेरिका की वामपंथी समाजवादी धरती से लेकर पूर्व सोवियत भूमि तक गुट निरपेक्ष देशों में भी फ़िलस्तीन को लेकर जो नीति थी, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उसी को भारत की नीति के रूप में आगे रखा। यह देखा जाना चाहिए कि भारत पहला ग़ैर अरब ग़ैर इस्लामी देश था जिसने 1974 में सबसे पहले फ़िलस्तीन मुक्ति आंदोलन से कूटनीतिक संबंध स्थापित किए और 18 नवम्बर 1988 को फ़िलस्तीन को देश का दर्जा दिया। आज भी भारत संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव यानी ‘टू स्टेट पॉलिसी’ पर सद्भावनापूर्ण बातचीत के आधार पर फ़िलस्तीनियों के लिए स्वतंत्र, स्वयंभू राष्ट्र का समर्थन करता है।

सवाल यह है कि इजराइल के साथ इतनी गलबैयां करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इजराइल के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के फौरन बाद फ़िलस्तीन की याद कैसे आई। फ़िलस्तीनी शरणार्थी, राजनीतिक या स्थाई शरणार्थी, फ़िलस्तीनी मूल के साथ नई नागरिकता वाले प्रोफाइल के साथ लाखों फ़िलस्तीनी ना सिर्फ़ अरब और इस्लामी देश वरन् हर स्थान पर वैचारिक रूप से अपने सबब के लिए सरगर्म हैं। वह कामयाब व्यापारी और लॉबिस्ट के रूप में भी बहुत सक्रिय हैं। भारत के लिए अरब सोना उगलने वाली ज़मीन है। वहां बसे लाखों कामगार सालाना 20 अरब डॉलर से अधिक की रकम रेमिटेंस के रूप में भारत भेजते हैं जिससे हमारा तेल भुगतान बास्केट को बैलेंस रखने में हमें बहुत मदद मिलती है।

इसके अलावा ग़ैर तेल कारोबार में भारत से यहां दवाइयां, भारी मशीनें और अन्य सामान निर्यात होता है। इजराइल के बहुत पक्ष में झुकने की छवि बनने से यदि भारतीय कामगारों की नौकरी जाती है तो रेमिटेंस तो जाएगा ही, बेरोज़गारों की एक नई पीढ़ी देश लौटने पर मजबूर हो जाएगी। अब तक भारतीयों के साथ अरब में धर्म और क्षेत्र के आधार पर नफ़रत देखने को नहीं मिलती। इसी तरह यदि भारत के निर्यातक सामान की सूची में चीन से भारत को बहुत प्रतियोगिता है। भारत की यह जगह खाली होती है तो भी भारत को दूसरा पड़ोसी और दुश्मन चीन को बढ़त मिलती है। एक इजराइल के बदले चीन और पाकिस्तान बढ़त ले जाए, ये कहाँ की समझदारी है?

पाकिस्तान के दुर्दांत आतंकवादी हाफ़िज़ सईद की फ़िलस्तीन के पक्ष में बुलाई गई रैली में जब फ़िलस्तीन के पाकिस्तान में राजदूत ने शिरकत की तो भारत की आपत्ति के फ़ौरन बाद राजदूत को फ़िलस्तीन वापस बुला लिया गया। अरब लीग के अलावा इस्लामी देशों के सबसे मज़बूत संगठन ओआईसी यानी इस्लामी राष्ट्र संगठन में हमेशा पाकिस्तान के भारत विरोधी एजेंडे के ख़िलाफ़ फ़िलस्तीन और ईरान दोनों खड़े होते रहे हैं। भारत यदि इजराइल के पक्ष में यूँ ही झुकता रहता तो पाकिस्तान को ओआईसी में कूटनीतिक बढ़त मिलती है।

पाकिस्तान यह तर्क दे सकता है कि ग़ैर इस्लामी देश भारत को इतनी तवज्जो क्यों मिलनी चाहिए जबकि वह फ़िलस्तीन की आज़ादी और ईरान की सुरक्षा के साथ समझौता कर रहा है और वह इजराइल को महत्व दे रहा है। बेशक नरेन्द्र मोदी ने फ़िलस्तीन की यात्रा करके 350 करोड़ रुपए के ढांचागत विकास का जो काम करने का करार किया है, वह भारत की कूटनीति के नेहरू मॉडल पर लौटने की भरपूर दलील है। फ़िलस्तीन सिर्फ़ एक देश नहीं, विचारधारा और कूटनीति का बड़ा केन्द्र है। आप आम फ़िलस्तीनियों से बात कीजिए, पंडित नेहरू के बारे में उनके दिलों में जो सम्मान है उससे आपका दिल भर आएगा। 

( लेखक कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं )

 






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