मोदी को लोकप्रिय बताने वाला "प्यू सर्वे" का बहुमत चाहता है देश में सैन्य और अधिनायक शासन

विशेष , , रविवार , 19-11-2017


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राजेश कुमार

‘प्यू रिसर्च सेंटर’ के ताजा सर्वेक्षण की रिपोर्ट का पहला पैरा कहता है कि अर्थव्यवस्था की दशा और देश की दिशा को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भारतीयों का समर्थन और अनुमोदन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा ही है। मोदी के पांच साल के कार्यकाल के तीन साल बीतने के बाद उनकी सरकार का ‘हनीमून पीरियड’ भले खत्म हो गया हो, भारत की मौजूदा स्थितियों को लेकर जनता का ‘लव अफेयर’ गहरा हुआ है। रिपोर्ट में बातें और भी हैं और सर्वेक्षणों के राजनीतिक निहितार्थों को लेकर बहुज्ञात जानकारियों में बिना कुछ और जोड़े फिलहाल इतना रेखांकित करना काफी होगा कि ‘प्यू’ की इस रिपोर्ट में भी महज 2,464 लोगों को भारत की सवा सौ करोड़ अवाम का प्रतिनिधि  मान लिया गया है। और नमूने के लिहाज से इसे ही उपयुक्त और पर्याप्त मान लेने की चालाकी साफ देखी जा सकती है। 

अंतर्राष्ट्रीय रुखों और रुझानों के सर्वेक्षण-अध्ययन के लिए विख्यात वाशिंगटन स्थित इस अमरीकी सेंटर ने इन 2,464 लोगों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थितियों, इनकी समझ और सरोकारों का कोई ब्योरा नहीं दिया है। अलबत्ता सर्वेक्षण रिपोर्ट के साथ संलग्न ‘अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों की प्रविधियां’ में दो सूचनाएं इस रिपोर्ट को समझने में मददगार हो सकती हैं - एक तो यह कि सेन्टर आम तौर पर ऐसे सर्वेक्षणों के लिए लोगों से टेलीफोन पर या कम्प्यूटर, पेन-नोटबुक के साथ आमने-सामने बातचीत करता है और दूसरे कि 18 वर्ष से अधिक वयस्क के 2,464 लोगों का यह माइक्रोस्कोपिक ‘सैम्पल’ बनाते हुए देश के कुल 36 राज्यों और केन्द्र-शासित प्रदेशों के सर्वाधिक आबादी वाले 18 राज्यों – केन्द्र-शासित प्रदेशों में से भी केरल और असम छोड़ दिये गए हैं। प्रविधि के इसी ब्योरे में बताया गया है कि इस ताजा सर्वेक्षण के लिए 21 फरवरी से 10 मार्च तक ‘सैम्पल’ से बातचीत केवल हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, गुजराती, मराठी और ओडिया भाषाओं में की गयी। यानि ‘सैम्पल’ से केरल, असम जैसे प्रदेश ही नहीं, मलयाली, असमी, बोडो, पंजाबी, संथाली, मैथिली, कश्मीरी, डोगरी, कोंकणी, सिंधी और नेपाली जैसी आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में जी-मर रहे लोगों को भी बाहर रखा गया। इस बहिष्करण के हेतु, मंशा और राजनीति का मसला पाठकों के विवेक पर छोड़ते हुए भूमिका के तौर पर दो-एक आखिरी बात और - ‘सैम्पल’ में शामिल लोगों के दिल, दिमाग, समझ, सरोकार, राजनीति और आग्रहों-दुराग्रहों तक के खाके बनाने-समझने की महती टीपें खुद रिपोर्ट में मौजूद हैं। अब जैसे यही कि नमूने के तौर पर लिए गये 2,464 लोगों में से 53 प्रतिशत ने सैनिक शासन की, 55 प्रतिशत ने विधायिका-न्यायपालिका के किसी भी दखल से मुक्त अधिनायकवादी शासन-व्यवस्था की और करीब 66 प्रतिशत ने ‘टेक्नोक्रेसी’ की पैरवी की, जिसमें सत्ता, निर्वाचित प्रतिनिधियों की बजाय विभिन्न क्षेत्रों के विषेशज्ञों के हाथ में होती है।

पियू की वाशिंगटन स्थित आफिस।

दिलचस्प यह कि इन टीपों के बीच ही बेशुमार उलटबांसियां भी हैं, मसलन सर्वे में शामिल लोगों का अधिकांश टेक्नोक्रेसी, आटोक्रेसी, सैनिक शासन का आकांक्षी भले हो, इस जमात का करीब 79 प्रतिशत देश में लोकतंत्र के मौजूदा हालात से भी संतुष्ट है, केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का ही भारी बहुमत नहीं, कांग्रेस समर्थकों का भी 65 प्रतिशत मोदी सरकार के अन्तर्गत लोकतांत्रिक संस्थानों की स्थिति से और 76 प्रतिशत भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर भी खुश-प्रसन्न है। बार-बार सांप्रदायिक हिंसा फूट पड़ने के बावजूद भारतीय अवाम का नहीं, बल्कि इन 2,464 लोगों के केवल 38 प्रतिशत का इसे बहुत बड़ी समस्या मानना, हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे के बरक्स तीन-साढ़े तीन साल में कुछेक लाख रोजगारों के ही सृजन और नोटबन्दी-जी.एस.टी. की मार से लाखों लोगों के बेरोजगार हो जाने की सरकारी-गैर सरकारी रिपोर्टों के बीच जमात के करीब 72 प्रतिशत लोगों का इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री के रुख को उचित और उपयुक्त बताना ऐसी ही कुछ उलटबांसियां हैं। उलटबांसियां और भी हैं, जो अभी परसों जारी ब्रूस स्टोक्स, डोरेथी मानेविच  और हान्यू च्वे की इस सर्वे-रिपोर्ट के लिए तैयार सैम्पल को अभिधा में नहीं, मुहावरे में भी नमूना बना देती है। 

इस मुख्तसर भूमिका के बाद पेश है, उस खबर का एक दूसरा प्रारूप जो 15 या 16 नवम्बर की शाम चैनल-चैनल धूम मचाता रहा था कि हर दस भारतीय में नौ मुरीद है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का। यह दूसरा प्रारूप उस दसवें नामुराद की तलाश नहीं है, जो ‘ना-मुरीद’ है, सबब इतना भर है कि हर खबर के कई प्रारूप संभव हैं, आप बस सत्ता के साये से उठिये और उसकी धमक से दूर, वहां जा बैठिये, जहां सत्ता का रहमोकरम नहीं जाता।‘पिउ’ सर्वे की रिपोर्ट को जरा ऐसे भी पढ़िये-

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारत में विधायिका और न्यायपालिका के किसी भी दखल से परे आटोक्रेसी, टेक्नोक्रेसी और सैनिक शासन तक के आकांक्षी लोगों के बीच अत्यन्त लोकप्रिय हैं।

प्रिन्सटन सर्वे रिसर्च एसोसियेट्स इंटरनेशनल के निर्देशन में ‘प्यू’ के सालाना सर्वेक्षण में भारत से शामिल 2,464 लोगों में करीब 90 प्रतिशत ने नरेन्द्र मोदी का समर्थन किया और उनके बारे में सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की। दिलचस्प यह है कि इनमें से 79 प्रतिशत लोग भारत में लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति से संतुष्ट हैं, लेकिन ‘कुल सैम्पल’ के 53 प्रतिशत ने सैनिक शासन की, 55 प्रतिशत ने संसद और अदालतों के किसी भी अंकुश से मुक्त एक मजबूत नेता की अधिनायकवादी सत्ता और 60 प्रतिशत ने जन-प्रतिनिधियों के बजाय विषेशज्ञों की टेक्नोक्रेट सत्ता-तंत्र की जोरदार पैरवी की। भारत के इन लगभग ढ़ाई हजार लोगों के बहुमत के अलावा, ‘प्यू’ से बातचीत में 38 देशों में से किसी भी देश के चुनिंदा ‘सैम्पल’ के बहुमत ने अधिनायकवाद की पैरवी नहीं की, जबकि तीन देशों के लोगों ने सैनिक शासन का और छह देशों के लोगों ने ‘टेक्नोक्रेसी’ की वकालत की।

सर्वेक्षण के नतीजों के अनुसार आटोक्रेसी, टेक्नोक्रसी और सैन्य शासन की वकालत करने वालों में अधिकतर शहरी क्षेत्र के, कालेज के या उच्चतर डिग्री धारण करने वाले और भाजपा समर्थक थे।

शायद अकारण नहीं है कि इन ढाई हजार लोगों में से 63 प्रतिशत ने जम्मू कश्मीर के सीमा क्षेत्रों की समस्या से निबटने के लिये और अधिक सैन्य बल के इस्तेमाल की वकालत की, हाल के वर्षों में बार-बार जातिगत और सांप्रदायिक हिंसा फूट पड़ने के बावजूद केवल 38 प्रतिशत ने इसे बहुत बड़ी समस्या माना और दुनिया भर में साख की त्वरित गिरावट के बावजूद करीब 49 प्रतिशत ने अमरीका के और करीब 40 प्रतिशत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में भी सकारात्मक राय जाहिर की। इन लोगों में से 41 प्रतिशत ने ट्रम्प को राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त और 42 प्रतिशत ने एक मजबूत नेता तक बताया, जबकि 37 प्रतिशत ने चुनिंदा मुस्लिम देशों से आव्रजन पर बंदिशें लगाने की ट्रम्प की योजना का समर्थन किया।

यह तब है जब ‘प्यू सेंटर’ ने अन्य 37 देशों के जिन कम-ज्यादा लोगों से बात की उनमें औसतन 75 प्रतिशत ट्रम्प को अहंकारी, 65 प्रतिशत ‘असहिष्णु‘ और 62 प्रतिशत ‘खतरनाक’ तक कह रहे थे। अलबत्ता रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस समर्थकों में जरूर अमरीका और राष्ट्रपति ट्रम्प में कम भरोसा देखा गया।

अमरीका और अन्य देशों के बारे रुखों और रुझानों के आकलन-अध्ययन में लगे वाशिंगटन स्थित अमरीकी थिंक टैंक ‘प्यू रिसर्च सेंटर’ की यह सर्वेक्षण रिपोर्ट ऐसे समय जारी की गई है, जब नरेन्द्र मोदी को अपने ही गृह-राज्य गुजरात के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की ओर से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। आपको बता दें सेंटर ने पिछले लोकसभा चुनावों से पहले भारत में अपनी पहली सर्वे-रिपोर्ट जारी की थी और 2,464 लोगों के ही ‘सैम्पल’ से बातचीत के आधार पर कहा था कि देश के 63 प्रतिशत लोग केन्द्र में भाजपा की सरकार और 78 प्रतिशत लोग नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के हक में हैं। 

अब अंत में ब्रूस स्टोक्स, डोरेथी मानेविच और हान्यू च्वे की रिपोर्ट के शेष महत्वपूर्ण बिन्दुओं को शामिल करते हुए जोड़ा जा सकता है- 

-कि भारत के इन और ऐसे 2,464 लोगों में मोदी की लोकप्रियता चरम पर है और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी सहित कोई भी उनके आसपास भी नहीं है।

-कि मोदी की इस लोकप्रियता का मूल अर्थव्यवस्था की हालत और बेराजगारी, आतंकवाद और भ्रष्टाचार पर उनके रुख से इन ढाई हजार लोगों के अधिकांश की बढ़ती संतुष्टि में है। ‘सैम्पल’ में दस में से आठ लोगों ने आर्थिक हालात को ‘अच्छा’ बताया और सात ने गरीब कल्याण की उनकी नीति और बेराजगारी, आतंकवाद और भ्रष्टाचार पर उनके रूख का अनुमोदन किया।‘सैम्पल’ में जो कांग्रेस समर्थक थे, उनकी तुलना में अर्थव्यवस्था के बारे में भाजपा समर्थकों की राय अधिक सकारात्मक जरूर थी, लेकिन देश की आम दिशा को लेकर दोनों समूह समान रूप से संतुष्ट थे।

-कि इन लोगों में से लगभग 73 प्रतिशत ने रोजगार के अवसरों में कमी को देश की एक बड़ी समस्या तो माना, लेकिन 72 प्रतिशत ने इस समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री के रूख को उचित और उपयुक्त बताया।

-कि मोदी के कामकाज की न्यूनतम रेटिंग, साम्प्रदायिक सौहार्द्र पर उनकी और उनकी सरकार के रुख को लेकर थी, फिर भी करीब आधे ने इस संबंध में भी मोदी और उनकी सरकार के रवैये पर संतोष व्यक्त किया।

आदि-आदि।

    (राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)                          






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