पीएनबी फ्राड: जिनको बोलना चाहिए वो चुप हैं, बाकी कुछ भी बोले जा रहे हैं

मुद्दा , नई दिल्ली, रविवार , 18-02-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। देश में एक बड़ा घोटाला हुआ है। जनता की गाढ़ी कमाई के अरबों रुपये विदेश चले गए हैं। कोई उनकी गजनी से तुलना कर रहा है तो कोई गोरी से। सबसे खास बात ये है कि लुटेरे अपने देश के ही हैं। घोटाले को खुले तकरीबन 5 दिन हो गए हैं। लेकिन इस पर जिसका जवाब आना चाहिए वो चुप है। प्रधानमंत्री चुप हैं। वित्तमंत्री चुप हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चुप है। लेकिन दूसरे लोग बोल रहे हैं। 

बोल कौन रहा है? बोल रही हैं रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन। जिन्हें बोलना चाहिए राफेल सौदे पर वो बोल रही हैं पीएनबी फ्राड पर। आपको बता दें कि 17 नवंबर 2017 के बाद से उन्होंने राफेल पर चुप्पी साध रखी है। दूसरे बोल रहे हैं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद जिनका इस मामले से कोई दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है। उनकी जवाबदेही बनती थी सुप्रीम कोर्ट में जजों के अभूतपूर्व संकट के मामले में।

रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन।

तब उन्होंने चुप्पी साध रखी थी। बोलने की बात तो दूर तब कहीं किसी भूमिका में नहीं दिखे। तीसरे बोलने वाले शख्स हैं मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर। उन्हें बोलना चाहिए विश्व भारती के मसले पर। जिसमें अपने ही प्रस्तावित पैनेल में से किसी एक नाम पर राष्ट्रपति की संस्तुति के बाद अब उसे फिर से वापस करने की मांग कर रहे हैं। राष्ट्रपति जैसे अति सम्माननीय पद को ठेंगे पर रखने की अपने ही तरह की ये अलग ही मिसाल है। लेकिन उस पर चुप हैं। 

पीएम मोदी बोल भी रहे हैं तो एक ऐसे मसले पर जिसके बारे में खुद उनका कहना है कि उन्हें कोई अनुभव नहीं है। जिस परीक्षा की वो देश के तमाम बच्चों को सीख दे रहे थे उसके बारे में उनका अनुभव शून्य है। लेकिन यही शून्य शायद उनकी तरक्की का सबसे बड़ा हथियार बना हुआ है। लिहाजा उन्हें बहुत प्रिय है। दो घंटे से ज्यादा वो परीक्षा पर बोले लेकिन देश की जनता और विपक्ष को जवाब देने के लिए उनके पास दो मिनट नहीं थे। 

पीएम मोदी छात्रों के साथ।

 

घोटाले के बारे में बोलने वाले मंत्रियों की बातें भी बेहद दिलचस्प हैं। रविशंकर प्रसाद ने सबसे पहले ये बताकर कि घोटला 2011 से शुरू हुआ था। मामले को पूरी तरह से कांग्रेस के मत्थे मढ़ देने की कोशिश की। लेकिन जब सीबीआई की एफआईआर के जरिये ये बात सामने आ गयी कि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी को सारे एलओयू 2017-2018 के दौरान जारी हुए थे। तब मोर्चा संभाला सीतारमन ने। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी की पत्नी ने नीरव की शॉप से करोड़ों रुपये के डायमंड खरीदे हैं।

 

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सिंघवी की कंपनी के फ्लैट को नीरव ने शाप के लिए किराए पर ले रखा था। क्या कोई किसी की दुकान से सामान खरीदने भर से गुनहगार हो जाता है या फिर किराए पर मकान देने पर बाहर किए गए किराएदार के किसी गुनाह के लिए मालिक दोषी हो जाएगा? अब इस पर हंसा जाए या फिर इसे देश के सबसे बड़े चुटकुले की श्रेणी में रखा जाए। उसके बारे में फैसला ले पाना मुश्किल है। लेकिन सच यही है कि देश के रक्षा मंत्री की समझ का यही स्तर है। वो देश की जनता को या तो पूरी तरह से बेवकूफ समझती हैं। या फिर मान बैठी हैं कि सरकार जो भी कह देगी जनता उसे मंत्र की तरह स्वीकार कर लेगी। 

प्रकाश जावड़ेकर कह रहे हैं कि राहुल गांधी की 2013 में नीरव मोदी के साथ मुलाकात के बाद उसे एलओयू जारी किया गया था। ये पूछे जाने पर कि सारे एलओयू एनडीए शासनकाल के हैं तो उन्होंने मामले को गोल-गोल घुमाना शुरू कर दिया। ऊपर से कौन कहे घोटाले पर शर्मिंदा होने के उसे उजागर करने और फिर कार्रवाई करने का तमगा अपने सीने पर टांक लिया। जबकि सच ये है कि 2015 और 2016 में कारपोरेट मंत्रालय और पीएमओ को इस मामले की सीधी शिकायत की गयी थी। लेकिन पूरी सरकार सोती रही।

बात राजनीतिक जमात तक सीमित नहीं है। सरकार का खुलेआम पक्ष लेने वाले चैनल भी इसी रास्ते पर हैं। रिपब्लिक चैनल ने अपने एक ट्वीट में कहा कि 2015 में कोर्ट ने कांग्रेस सरकार को मेहुल के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे। अब उनसे कौन कहे कि 2015 में सरकार एनडीए की थी। 

रिपब्लिक चैनल का ट्वीट।

दरअसल ये पूरी एक रणनीति का हिस्सा है। जब सरकार के पास सवालों का जवाब नहीं है तो वो फिर पूरे मामले को उलझाने में जुट गयी है। पीएम, वित्तमंत्री या फिर रिजर्व बैंक इसलिए नहीं आगे आ रहे हैं क्योंकि उन्हें तथ्यों के हिसाब से जवाब देना होगा। जो खुद उनके खिलाफ जाते हैं। लेकिन दूसरे मंत्रियों के साथ ये बाध्यता नहीं है। इसका मतलब ये नहीं हो सकता है कि किसी मंत्री को सफेद झूठ बोलने की छूट मिल जाती है। क्योंकि अंततः किसी भी मामले में मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। लेकिन इस सरकार से किसी इस तरह की उम्मीद करना बेमानी है।

 






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