पूनम जी! व्यवस्था को माओवादी ही दिखता है किसानों का संघर्ष

बयान पर बवाल , , मंगलवार , 13-03-2018


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अल्पयु सिंह

डियर पूनम महाजन जी!

कोई और बात शुरु करने से पहले आपके झुमके के बारे में पूछना चाहती हूं। वही जो पिछले साल रायपुर में कहीं गिर गया था। यकीन मानिए सीएम रमन सिंह भी बहुत चिंतित हुए थे कि आप रायपुर पार्टी के कार्यक्रम से आईं और उस दौरान बीजेपी के किसी कार्यक्रम में झुमका गंवा बैठीं। सीएम साहेब ने उस झुमके को ढूंढने में प्रशासनिक अमले को लगा दिया था। यहां तक कि बिलासपुर में लोगों से अपील तक कर डाली थी कि किसी को आप का सोने का वो झुमका मिले तो कृपया पुलिस को लौटा दें। खैर अब तो आप उस फेवरेट झुमके को भूल गईं होगी या फिर दूसरा बनवा लिया होगा।

लेकिन क्या आप जानती हैं कि 180 किलोमीटर चल मुंबई पहुंचने वाली किसान महिलाओं में से कईयों के पास चप्पल की दूसरी जोड़ी तक नहीं थी। तलघरी, पालघर, नासिक से आए इन किसानों में से कईं 60 साल से ज्यादा उम्र की महिलाएं थीं। इन लोगों ने 6दिन में सैंकड़ों किलोमीटर नापे। साथ में बच्चे भी थे। सोशल मीडिया में आप ने वो तस्वीर तो देखी होगी जिसमें एक बूढ़ी महिला के पैरों से खून रिस रहा है। लेकिन शायद आपको खून के रंग से ज्यादा झंडे का रंग लाल दिखा। सही भी है मुंबई की सड़कों पर अन्नदाता की मानव निर्मित लाल लकीर ने कईयों की आंखें विस्मय से फैला दीं।

तो बात झंडे की हो रही थी, शायद उन्ही झंडों को देख आपने कहा कि ये आदिवासी शहरी माओवादियों से प्रभावित हैं। अब जब आपके सीएम साहेब ही कह चुके थे कि प्रदर्शन में शामिल 95 फीसदी किसान नहीं आदिवासी हैं, तो आपका ये कहना कतई ज्यादा नहीं है। बिल्कुल नहीं सरकार में बैठे लोग तो खेती और किसानों को लेकर बहुत पहले ही बहुत कुछ कह चुके हैं। मसलन किसान नपुंसकता के चलते आत्महत्या करते हैं या फिर किसानों को बीज मंत्र पढ़कर बोना चाहिए वगैरह वगैरह।

मैडम!आप बीजेपी की तेरतर्रार युवा सांसद हैं, लोकसभा में बैठती हैं तो जरुर जानती होंगी कि पिछले 20 सालों में सिर्फ महाराष्ट्र में 65 हजार से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की है। और बात पिछले साल की ही करें तो 2400 किसानों ने मौत को गले लगाया है। जब पी साईनाथ जैसे शख्स कहते हैं कि 2014 के बाद खेती-किसानी के हालात खराब हुए थे तो अतिश्योक्ति नहीं लगती, उन्होंने तो जिंदगी का बड़ा हिस्सा किसानों के बीच गुजारा है।

अब जरा उन्हीं लोगों की बात कहें जिन्हें आप माओवाद से प्रभावित बताती हैं। लाॅग मार्च में एक शख्स थे रामराजे महादिक, चालीस साल के महादिक मराठवाड़ा के परभनी से आते हैं, कपास की खेती में इस साल उन्हें भयंकर नुकसान हुआ है,लेकिन सरकारी मुआवजा उनके हाथ नहीं आया। वजह सरकार ने कुछ लोगों को इस दायरे से बाहर रखा, ऐसा क्यों किया गया किसी को नहीं पता। महादिक सिर्फ इतना जानता है कि अगर उसे मुआवजा ना मिला तो हालात फाके के हो जाएंगे।

मोर्चे में शामिल एक दूसरा शख्स था अंबादास शारदुल। 53 साल का नासिक जिले का अंबादास पांच एकड़ की जिस जमीन पर खेती करता है, उससे गुजारा तो हो रहा है, लेकिन पट्टा उसका नहीं है। अंबादास के लिए ये जमीन ही सबकुछ है, वो जमीन पर पट्टा चाहता है। ये उसके लिए जीवन मरण का सवाल है।

ऐसी हजारों कहानियां हैं, दुखड़े हैं। सरकार से शिकायतें हैं। जो सरकारें सुनती नहीं वजह साफ है कि दिल्ली ही नहीं मुंबई भी ऊंचा सुनती है। तभी किसानों को खामोशी के साथ एक दिन सैंकडों किमी का सफर तय करना पड़ता है। और जब वो किसान सड़क पर उतरता है तो सबकी आंखें अचम्भे से फैल जाती हैं। लेकिन क्या आप भूल गईं कि दो साल पहले मार्च में ही नासिक के सीबीएस चैक में किसानों का ऐसा ही रेला दिखा था। 40 हजार किसान इन्हीं मांगों के साथ बैठे थे, फिर अक्तूबर में उसी साल पालघर में सूबे के आदिवासी कल्याण मंत्री विष्णु सवारा का भी घेराव किया गया था। उस वक्त भी सरकार ने बातचीत के लिए बुलाया था। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात। इसीलिए किसानों को इस बार मुंबई आना ही पड़ा।

ठीक कहते हैं आप के सीएम कि ये आदिवासी हैं किसान नहीं, वो खेत जोतते हैं। लेकिन पट्टा उनके नाम नहीं। लेकिन ये तो वो भी जानते हैं और आप भी जानती हैं कि आदिवासियों के किसान बनने का रास्ता फॉरेस्ट राइट्स एक्ट से होकर गुजरता है। नवंबर 2017 में Community Forest Rights &Learning and advocacy group Maharashtra की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के 21 जिलों में सामुदायिक वन अधिकार को लेकर काम ना के बराबर हुआ है। इसमें गढ़चिरौली ही अपवाद है। क्या ये सही नहीं कि राज्य में चुनाव से पहले वाकई कुछ किसानों को वन जमीन के पट्टे दिए गए। लेकिन बाद में प्रक्रिया का हवाला देकर वापस ले लिए गए।

मान लेते हैं कि लाल झंडे थामे ये किसान आपको लेफ्ट की विचारधारा की याद दिलाते हैं। बात सही है। लेकिन सवाल ये भी है कि क्यों आम मुंबईकर ने दिल खोलकर लाल झंडे थामे इन लोगों का स्वागत किया। बात साफ है पूनम जी। दरअसल इन लोगों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी दारुण जीवन गाथा की एक झलक क्या दिखाई, सत्ता की असंवेदनशीलता पैरो में फूटी बिवाई की शक्ल में रिस कर बाहर आ गई। पब्लिक सेंटिमेंट बड़ी चीज होती है यही वजह है कि फणनवीस साहब को डैमेज कंट्रोल करना पड़ा। किसानों की बातें सुनने को लेकर फुर्ती दिखानी पड़ी। कांग्रेस, एनसीपी, मनसे और शिवसेना को किसानों के साथ खड़ा होना पड़ा। वैसे भी फणनवीस साहब कैसे भूल सकते हैं कि 2004 में किसानों ने चंद्रबाबू को चुनाव में धूल चटा दी थी।

खैर! आपको ये तो पता ही होगा कि इन लोगों को वापस उनके घर पहुंचाने के लिए सरकार ने स्पेशल ट्रेनें भी चलवाईं। क्योंकि फणनवीस सरकार की सेहत के लिए किसानों का ये जमावड़ा कतई सही नहीं था। वैसे स्पेशल ट्रेन चलवाने का आरोप तो आपके ऊपर भी लगा था। कहा जाता है कि 31 मई 2016 को आपको भोपाल हवाई अड्डे से मुंबई की फ्लाइट पकड़नी थी। जिसके लिए बीना से भोपाल जाना था। इसीलिए एक स्पेशल ट्रेन चलवाई गई जिसे रास्ता देने के लिए रा्स्ते में रोजाना जाने वाली ट्रेनों को रोका गया था। खैर छोड़िए। पुरानी बात है।

नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने एक दफा कहा था कि 80 फीसदी सुविधाओं पर 20 फीसदी लोगों का कब्जा है और ये 80 फीसदी लोग इन 20 फीसदी लोगों का जीवन आरामदायक बनाने के लिए काम करते हैं। उनकी थ्योरी गलत नहीं है। इसीलिए 80 फीसदी ये जनता जब 20 फीसदी लोगों को आईना दिखाती है, तो नतीजा ऐसे ही बयानों की शक्ल में आता है जैसा आप ने दिया। आप युवा नेता हैं, बीजेपी में युवाओं की सोच की बागडोर आपके हाथ में हैं उम्मीद है कि आप किसानों के बीच रह उनकी समस्याओं को जड़ से समझने की कोशिश करंेगी। ना कि राजनीति की उस अश्लील बयानबाजी को बढ़ावा देंगी, जैसा कि आपने इस संबंध में किया।

                                                          (एक  मतदाता)

                               (अल्पयु सिंह पेशे से पत्रकार और डाॅक्यूमेंट्री निर्माता हैं।)    


 






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