नागपुर यात्रा से प्रणब का हासिल

ख़बरों के बीच , , मंगलवार , 12-06-2018


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महेंद्र मिश्र

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नागपुर यात्रा को लेकर एक ही पक्ष पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई है कि इससे आरएसएस को क्या लाभ होगा और उसने ऐसा क्यों किया। प्रणब की यात्रा के मकसद और उससे होने वाले उनके लाभ के पक्ष को अगर पूरी तरह से नहीं तो एक हद तक छोड़ दिया गया। जबकि दूसरा पक्ष पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। प्रणब जैसा राजनेता जो देश में राजनीति के भीष्म पितामह का दर्जा हासिल कर लिया हो। जाहिर है उसके किसी भी कदम के पीछे कोई एक उद्देश्य होगा। और एक ऐसा कदम जो उनके पूरे राजनीतिक जीवन पर भारी पड़ने जा रहा हो। उसको उठाने से पहले वो 100 बार सोचे होंगे। ऐसा नहीं हो सकता कि वो किसी प्रतिक्रिया में अपने जीवन भर की राजनीतिक कमाई को स्वाहा कर दें। न ही महज राजनीति में अपनी कुछ प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए वो ऐसा करेंगे।

इस पूरे प्रकरण में एक बात जो खास तौर पर चिन्हित की जा सकती है वो ये कि इस पर पूरा देश बोला लेकिन बीजेपी और खास कर उसका शीर्ष नेतृत्व बिल्कुल चुप्पी साधे रखा। क्या प्रणब की यात्रा में मोहन भागवत के साथ मोदी और अमित शाह की सहमति थी? इन चुप्पियों को देखकर ऐसा कुछ तो नहीं लगता है। तब इन चुप्पियों के गहरे निहितार्थ हैं। जिन्हें समझा जाना अभी बाकी है।

अगर एक लाइन में कहा जाए तो राष्ट्रपति पद से रिटायर होने के बाद भी प्रणब की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अभी जिंदा है। और राजनीतिक तौर पर अभी भी वो खुद को प्रासंगिक बनाए रखना चाहते हैं। इस कड़ी में वो किसी एक पार्टी या फिर संगठन से बंध कर भी नहीं रहना चाहते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो वो एक लिजेंड की भूमिका में खड़ा होना चाहते हैं। जिसमें सब लोग उनको देश के गार्जियन के तौर पर देखें। और किसी संकट के मौके पर अभी तक कांग्रेस के लिए निभाई जाने वाली भूमिका का अब वो देश के स्तर पर विस्तार करना चाहते हैं। आरएसएस के बुलावे के बाद अब राहुल गांधी द्वारा इफ्तार में उनका आमंत्रण इस बात को और पुष्ट करता हुआ दिखता है।

यात्रा की घोषणा होने के दिन ही मैंने उनके प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा का जिक्र किया था। तथा कहा था कि 2019 में बीजेपी की बहुमत की सरकार न बनने की स्थिति में राष्ट्रीय सरकार के गठन की किसी जरूरत पर उनकी प्रासंगिकता और बढ़ जाएगी। आरएसएस की उस दौर की यही सबसे बड़ी जरूरत होगी। जिसे प्रणब के साथ मिलकर वो पूरा कर सकता है। 

नागपुर में उन्होंने जो कुछ बोला है वो पीएम मोदी अक्सर बोलते ही रहते हैं। या फिर आरएसएस और उसके मुखिया अपने मंचों से दूसरों के द्वारा सुनते रहते हैं। प्रणब के भाषण में अगर कुछ आरएसएस के खिलाफ था तो बहुत कुछ उनके पक्ष में भी जाता है। मसलन आक्रमणकारियों में केवल मुसलमानों का जिक्र करना। शक, हूण और कुषाणों समेत आर्यों को छोड़ देना। भारतीय राष्ट्र का पश्चिमी राष्ट्र से भिन्नता पर जोर। और फिर संघ से जुड़े तमाम विवादों पर बिल्कुल चुप्पी बहुत कुछ समझने और बताने के लिए काफी था।

इन दो प्रमुख कारणों के अलावा बहुत कुछ छोटे-छोटे कारण भी हैं जिनको दरकिनार नहीं किया जा सकता है। मसलन गांधी परिवार से इस बात को लेकर नाराजगी कि उसने तीन-तीन मौकों पर बिल्कुल करीब आती पीएम की कुर्सी को उनसे दूर कर दिया। शायद इससे बड़ा बदले का कोई दूसरा मौका नहीं हो सकता था जब सोनिया गांधी अपने बेटे को राजनीति में खड़ा करना चाहती हों और बीच में प्रणब उसको लंगड़ी मार दें।

इसके साथ ही बताया जाता है कि तात्कालिक रूप से दो और चीजों ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया। जिसमें खुद उनके साथ सहयोगी के तौर पर काम करने वाली एक महिला का जिक्र आ रहा है जिनके जरिये संघ प्रमुख की बात उन तक पहुंचायी गयी। खास बात ये है कि कांग्रेस के दौर के सभी राज्यपालों के हटाए जाने के बाद भी उनके पति इसमें अपवाद रहे और अभी भी पहाड़ के राजभवन में पदासीन हैं। ऐसा प्रणब के प्रताप से ही संभव था।

दूसरी एक बात और कही जा रही है जो अभी तक के प्रणब के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए बहुत प्रासंगिक जान पड़ती है। और इस दौर में जबकि कारपोरेट की भूमिका सत्ता से लेकर समाज में बढ़ती जा रही है उसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। बताया जा रहा है कि 2019 के हवा के रुख को देखते हुए मुकेश अंबानी राहुल गांधी से मिलना चाहते हैं लेकिन उनको वहां से समय नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में ये बिल्कुल संभव है कि अपने पक्ष की सरकार के गठन की किसी संभावना को विकसित करने में वो किसी और से भी आगे बढ़कर मदद करें।

और वो संभावना अगर उनके किसी प्रणब जैसे खासमखास के लिए हो तो वो अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। प्रणब और अंबानी परिवार के बीच का करीबी रिश्ता जगजाहिर है। जिसमें बातें तो यहां तक की जाती हैं कि धीरूभाई अंबानी अपना बर्थडे केक तक बगैर प्रणब के पहुंचे नहीं काटते थे। और बताया जाता है कि ये रिश्ता अभी भी उसी तरह से बना हुआ है। ऐसे में इस यात्रा को उसके अंजाम तक पहुंचाने में मुकेश अंबानी की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

और सबसे आखिर में लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण बात कांग्रेस के परंपरागत विचार में मौजूदा नेतृत्व द्वारा फेर-बदल है। मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी न केवल आरएसएस बल्कि सीधे मनुवाद को निशाना बना रहे हैं। जो अभी तक कांग्रेस के किसी अध्यक्ष ने नहीं किया था। ऐसा बिल्कुल संभव है कि कांग्रेस की उदार हिंदू धारा का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रणब को ये बात नागवार गुजरी हो। और उसका उन्होंने इस तरह से प्रतिवाद करने का फैसला किया हो। 




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