तुष्टीकरण के नए पोशाक में मोदी

विश्लेषण , , मंगलवार , 18-09-2018


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रामशरण जोशी

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंदौर यात्रा और बोहरा समुदाय के सम्मेलन में जाना इस बात का सबूत है कि 2019 के चुनाव को केंद्र में रख कर भाजपा और नरेंद्र मोदी एक नई रणनीति तैयार कर रहे हैं। मैं समझता हूं कि संघ और भाजपा का नेतृत्व इस निष्कर्ष पर लगभग पहुंच चुका है कि देश के अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को लिए बगैर लोकतांत्रिक तरीके से राज करना मुश्किल है। इसका कत्तई ये मतलब नहीं है कि संघ और भाजपा की विचारधारा में कोई बुनियादी बदलाव आया है। लेकिन प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति में विभिन्न समुदायों और वर्गों के योगदान को मोदी और अमित शाह की जोड़ी बखूबी जानती है। मोदी और शाह यह जानते हैं कि हिंदू और खासकर सवर्णों के बल पर दोबारा सत्ता में आना मुश्किल है। 

आज भाजपा के खिलाफ जनता में भारी आक्रोश है। जमीनी स्तर पर लोग अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। राजनीतिक रूप से नए-नए समीकरण बन रहे हैं। अगर महागठबंधन खासकर उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस की एकता चुनाव के दौरान भी बनी रहती है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि एनडीए का सत्ता में आना नामुमकिन है। 

2014 में मोदी के साथ जो जादू काम कर रहा था आज वह जादू लगभग उतर चुका है। उनके भाषणों में सत्य कम जुमलेबाजी ज्यादा होती है। अब उनके भाषणों में वह आकर्षण नहीं है जो पिछले आम चुनावों के दौरान थी। हर मुद्दे को हल करने का वादा करके सत्ता में आए मोदी ने किसी एक मुद्दे को भी हल करने में सफल नहीं रहे हैं। इसलिए जनता अब उन पर पहले की तरह विश्वास नहीं कर रही है। 2014 में उन्होंने देश भर में घूम-घूम कर कहा था कि यदि हम सत्ता में आते हैं तो हर भारतीय के खाते में औसतन 15 लाख रुपये आएगा। लेकिन 15 लाख कौन कहे, पांच हजार भी नहीं आए। बाद में कहा गया कि यह जुमला था। 

भाजपा मीडिया के माध्यम से अपने पक्ष में तरह-तरह के तर्क गढ़ कर प्रचारित करवा रही है। उसी में से एक है कि नोटबंदी के बाद हुए हर चुनाव में भाजपा जीती। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि नोटबंदी के बाद भाजपा हर चुनाव जीती है। जब मोदी का जादू शिखर पर था तो मोदी बिहार और दिल्ली विधानसभा का चुनाव हारे। गोवा और मणिपुर में किस तरह सरकार बनाए, यह सबको पता है। जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है वहां पिछले 20 साल से सपा-बसपा सिंड्रोम काम कर रहा था। पहले वहां बसपा फिर सपा का शासन रहा। उसके विरोध में वहां वोट पड़ा।  

गुजरात में अमित शाह ने 150 सीटें लाने का दावा किया था। लेकिन पिछली बार जो 115 सीटें थीं उसे भी बरकरार नहीं रख सके। सिर्फ 99 सीट पाए। मोदी ने पूरे प्रदेश में कितनी रैलियां की। इसके बाद भी वे बहुमत नहीं ला सके। मैं इसे राजनीतिक पराजय कहूंगा। अब देखिए कर्नाटक में क्या हुआ? नरेंद्र मोदी और भाजपा ने वहां कितनी रैलियां और सभाएं की। किस स्तर पर जाकर कांग्रेस और जेडीएस के खिलाफ अभियान चलाया। लेकिन बहुमत नहीं मिला। कर्नाटक में हर राजनीतिक हथियार का इस्तेमाल करने के बावजूद भी सरकार भी नहीं बना सके।

अब भाजपा ने ‘‘अजेय भारत, अटल भाजपा’’ का नारा उछाला है। यानी भाजपा को कोई पराजित नहीं कर सकता। यह भी एक राजनीतिक जुमला है। वैसे जैसे 15 लाख रुपये प्रत्येक भारतीय के खाते में आने का। लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक पार्टी की स्थिति अटल नहीं होती है। दूसरा, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का यह कहना कि मैं पचास साल तक राज करूंगा। यह राजनीतिक अहंकार है। मैं इसे अधिनायकवाद कहूंगा। आप किस आधार कह रहे हैं कि 50 साल तक राज करूंगा। यह 50 वर्ष का शासन और अटल भाजपा का नारा अलोकतांत्रिक और तानाशाही वाला है। कोई पार्टी कैसे कह सकती है कि वह आने वाले पचास वर्षों तक राज करेगी? भाजपा 2014 को दोहराने का ख्वाब देख रही है। 

अभी पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। पिछले साढ़े चार वर्षों में देश के सामने जो चुनौतियां उभरी हैं, बेरोजगारी की समस्याएं बढ़ी हैं, महंगाई बढ़ी है, पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं। नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा के पास इसका समाधान नहीं है। अब भाजपा विभिन्न जातियों के सम्मेलन औ मुस्लिम समुदाय के प्रमुखों के पास ठौर खोज रही है। बोहरा समुदाय के धर्मगुरु सैयदना से मिलना और उनकी तारीफ उसी राजनीति की कड़ी है,जिसका विरोध भाजपा और संघ तुष्टीकरण कह कर करती रही हैं। कांग्रेस पर भाजपा का ये आरोप रहा है कि वह मुसलमानों के तुष्टीकरण की राजनीति करती है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को संघ-भाजपा मौलाना मुलायम कहते थे। अब नरेंद्र मोदी अल्पसंख्यकों को गफलत में रखने के लिए तुष्टीकरण की नई पोशाक पहन कर आ रहे हैं।

अब भाजपा नेता महागठबंधन की खिल्ली उड़ा रहे हैं। कह रहे हैं कि स्वार्थ में ये लोग एक हो रहे हैं। लेकिन वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 और 1999 में जो एनडीए की सरकार अस्तित्व में आयी थी, वह 24 पार्टियों का महागठबंधन था। उस समय अखबारों में लिखा गया कि ‘‘भानुमति का महागठबंधन’’। अब आप अपनी ही रणनीति के खिलाफ जा रहे हैं। आज जो महागठबंधन बनने जा रहा है मोदी और शाह की जोड़ी उससे भयभीत है। इसके बावजूद यह दंभ और प्रचार किया जा रहा है कि हम दोबारा सत्ता में आएंगे। महागठबंधन बनने के बाद यूपी और बिहार में भाजपा की चूल हिल जाने की संभवना है। दक्षिण भारत में भाजपा है नहीं। ऐसे में 2019 भाजपा के सामने बड़ा डरावना रूप लिए खड़ा है। 

यदि 2019 के चुनाव सामान्य परिस्थितियों में हुए तो भाजपा का आना नामुमकिन है। लेकिन मैं इस बात को रेखांकित करना चाहता हूं कि यदि असाधारण परिस्थितियां पैदा कर दी जाती हैं तो चुनाव प्रभावित होगा। मसलन वर्तमान सत्ता पाकिस्तान से युद्ध छेड़ सकती है, देश में कई तरह से अशांति पैदा की जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो देश को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। 

        (रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह आलेख उनसे बातचीत पर आधारित है।)








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