क्या होटलवाले पुण्य प्रसून-शाह फैजल से बड़े देशभक्त हैं?

मुद्दा , , सोमवार , 18-02-2019


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प्रेम कुमार

अजीब माहौल है। हर कोई देशभक्त है। आप पूछेंगे इसमें अजीब क्या है, देशभक्त होना तो बहुत अच्छी चीज है। अजीब देशभक्त होना नहीं है बल्कि देशभक्त होकर देशभक्ति के गुण निर्धारित करना है, दूसरों की देशभक्ति में कमी ढूंढ़ना है, खुद को बड़ा देशभक्त बताना है। आपकी जिज्ञासा और बढ़ गयी होगी कि ऐसी बातें क्यों की जा रही हैं। बात ही कुछ ऐसी है। 

स्वयंभू देशभक्तों ने रोका Live इंटरव्यू

पुण्यप्रसून वाजपेयी लाइव इंटरव्यू कर रहे थे। जम्मू-कश्मीर से देश का पहला आईएएस टॉपर शाह फैज़ल दिल्ली के सम्राट होटल में बैठकर इंटरव्यू दे रहे थे। सबकुछ वैधानिक तरीके से चल रहा था। मगर, अचानक होटल के मैनजर, कर्मचारी पहुंच गये। वहां मौजूद पत्रकार की मानें तो वे कहने लगे कि ये इंटरव्यू अभी रोकिए। तुरंत रोकिए। देश का माहौल ठीक नहीं है। इंटरव्यू को जबरदस्ती रोक दिया गया। एक लाइव इंटरव्यू को बीच में रोकना पत्रकारिता में अपराध माना जाता है, मगर होटल के स्वयंभू देशभक्तों को इससे क्या मतलब?

पुण्य की टीम ने होटल कर्मचारियों को लाख समझाया कि आप गलत कर रहे हैं। जिस व्यक्ति का इंटरव्यू हो रहा है वह खुद आईएएस अधिकारी रह चुके हैं। इस्तीफ़ा दिए अभी साल नहीं बीता है। ज़िम्मेदार व्यक्ति हैं। आपलोग पत्रकारों को अपना काम करने दीजिए। कहीं से कोई दिक्कत है, तो बताएं हम दूर कर देते हैं। मगर, वे तो बस इंटरव्यू रोकने पर आमादा थे। हम ऐसे ही स्वयंभू देशभक्त और देशभक्ति की बातें कर रहे हैं।

शाह फैजल-पुण्य प्रसून वाजपेयी नहीं समझते संवेदनशीलता?

शाह फैजल के बोलने से देश का माहौल ख़राब हो जाएगा। पुण्य प्रसून वाजपेयी को इस बात का इल्म नहीं है कि देश का माहौल ख़राब करने वाले कंटेंट क्या होते हैं। इसकी समझ केवल उन लोगों को ही है जो देशभक्ति का ठेका लिए घूम रहे हैं। होटल कर्मचारी-मैनेजर पूर्व आईएएस शाह फैजल से अधिक बड़े देशभक्त हो गये। पुण्य प्रसून वाजपेयी से वे बड़े देशभक्त हो गये। तय किसने किया? खुद उन्होंने ही, जो खुद को बड़ा देशभक्त बता रहे हैं।  

पुण्य प्रसून वाजपेयी स्थापित एंकर हैं। उनकी राय से सहमति या असहमति हो सकती है, मगर पत्रकारिता की दुनिया में उनका खड़ा रहना ही पत्रकारिता की दिशा और उसके बहाव को प्रभावित करता है। अन्यथा अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, मित्र रोहित सरदाना वाली इकलौती धारा ही दिखलायी देती। पुण्य प्रसून की धारा रवीश कुमार से भी मैच करती है। फिलहाल जो तीसरी धारा है वह निर्णायक नहीं है। इसलिए उसकी चर्चा नहीं करते हैं।

शर्म किन्हें आनी चाहिए?

इन्हीं होटल कर्मचारियों की तरह टीवी एंकरों ने चर्चा के दौरान पैनलिस्ट को भी देशभक्ति के अपने बने-बनाए दायरे में बांध दिया। या सफलतापूर्वक ऐसी कोशिश की। यह प्रयास जारी है। देश के देशभक्त एंकरों की भाषा पर गौर कीजिए- देश एक है। दुश्मन के ख़िलाफ़ देश एकजुट है। यह संदेश जाना चाहिए। राजनीति नहीं होनी चाहिए। देखिए, आप राजनीति कर रहे हैं। आप राजनीति मत कीजिए। आपको शर्म आनी चाहिए।

शर्म किसको आनी चाहिए? होटल के कर्मचारियों-अधिकारियों को या इंटरव्यू दे रहे या ले रहे शाह फैजल या पुण्य प्रसून को? अभी हम यह सवाल यह मानकर कर रहे हैं कि होटल वाले अपनी मर्जी से देशभक्ति का प्रदर्शन कर रहे होंगे। उन पर कोई बाहरी दबाव नहीं होगा। उन पर व्यावसायिक मजबूरियों का भी दबाव नहीं होगा। हम यह भी बात नहीं उठा रहे हैं कि सम्राट होटल जहां इटरव्यू हो रहा था, उससे 50 कदम की दूरी पर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आवास भी है। उन्हें कुछ पता था या नहीं। उन्होंने निर्देश भिजवाया था या कि उनके चमचों ने स्वत: संज्ञान लेकर होटल मालिक को हड़काया था। इन सारी स्थितियों-परिस्थितियों को अभी रहने देते हैं।

वाजिब बात बोल रहे थे शाह फैजल

शाह फैजल को बोलने नहीं दिया गया। वे क्या बोल रहे थे? वे बोल रहे थे कि जम्मू-कश्मीर की समस्या को पहले पहचानिए। राजनीतिक शून्यता को ख़त्म कीजिए। राजनीतिक दल की ज़िम्मेदारी सैनिकों को मत सौंपिए। यह मानिए कि लोग सरकार से नाराज़ हैं। नाराज़ लोगों से बातचीत कैसे करें। उनको कैसे मनाएं। इसके लिए स्थानीय राजनीतिक दलों पर भरोसा कीजिए। यह नीति ख़त्म कीजिए कि मशीन गन लगाकर, गोले-बारूद बिछाकर, लोगों की जानें लेकर कश्मीर की समस्या का अंत किया जा सकता है।

शाह फैजल कह रहे थे कि एक ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है कि अब युवाओं ने तर्क करना छोड़ दिया है। बस लड़ने-भिड़ने की बातें हो रही हैं। ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं थी। जरा सोचिए कि एक संतुलित विचारों वाला व्यक्ति जो हाल फिलहाल तक हमारी सरकार का हिस्सा रहा हो, जो आईएएस टॉपर रहा हो। ऐसे व्यक्ति के पास इस घटना के बाद कश्मीर में बोलने के लिए क्या रह जाएगा जब वह दिल्ली से लौटेगा। यही ना कि आपको टीवी तक पर बोलने नहीं दिया गया। अब कैसी गुलामी देखना चाहते हो? कितना मुश्किल होगा शाह फैजल के लिए कश्मीर में भटके हुए लोगों को समझाना।

CRPF की कुर्बानी को क्या सरकारों ने माना शहादत?

पुलवामा की घटना पर देश के प्रधानमंत्री ने अगले दिन कहा था कि कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। जब इतनी बड़ी संख्या में और स्वत: स्फूर्त तरीके से देशभक्त पैदा हो रहे हैं, तो निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी का बोलना सार्थक होता दिख रहा है। उनके लिए, बीजेपी के लिए कुर्बानी सार्थक हो चुकी है। अगर ये वोटों में बदल जाए तो फिर बात पक्की समझ लीजिए।

देशभक्ति दिखा रहे और सिखा रहे लोगों को यह बात नहीं दिखलायी देती कि सीआरपीएफ के जवानों को शहीद तक का दर्जा नहीं दिया गया। देश में सबसे बड़ी आतंकी कार्रवाई से देश में शोक दिखा, मगर इसका सरकारी प्रकटीकरण नहीं हुआ। आप कुछ सवालों पर गौर करें- 

क्या एक दिन के शोक की भी घोषणा नहीं की जा सकती थी? 

क्या तिरंगे को झुकाने का यह अवसर नहीं था? 

क्या प्रधानमंत्री अपने रूटीन के कार्यक्रमों को एक दिन के लिए रोक नहीं सकते थे?  

क्या कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक होने में 18-19 घंटे लगते हैं? 

क्या वंदेमातरम् एक्सप्रेस के उद्घाटन समारोह से खुद को प्रधानमंत्री अलग नहीं रख सकते थे? 

क्या पालम एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति की कमी नहीं खल रही थी? 

ऐसे कई एक सवाल हैं जो स्वयंभू देशभक्तों को नहीं दिखते। ऐसे देशभक्तों को उन कार्यक्रमों में काले झंडे दिखाने चाहिए थे जो सीआरपीएफ के जवानों की शहादत की अनदेखी करते हुए संपन्न कराए गये। कहां थे तब देशभक्त? बोलने की आज़ादी भी जब छिन जाएगी, तो सिर्फ गुंडे ही बोलेंगे। शरीफ लोगों के लिए बोलने की स्थिति नहीं रह जाएगी।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और तमाम टीवी बहसों के पैनल में गेस्ट के तौर पर उन्हें देखा जा सकता है।)








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S. Kumar :: - 02-18-2019
ये वही पुण्य प्रशून वाजपेयी है न जो पैसे लेकर कजरी का इंटरव्यू किया था जो लीक हो गया था जिसके बाद ABP ने इसे लात मारकर निकाल दिया था।