राफ़ेल की कीमत क्यों छुपा रही है सरकार?

मुद्दा , , रविवार , 12-02-2018


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विवेक सक्सेना

राफ़ेल फिर विवादों में है। विपक्ष सरकार से इसकी वास्तविक कीमत जानना चाहता है पर सरकार इसे छुपा रही है। इससे आशंका बढ़ रही है कि इस सौदे में कोई घोटाला तो नहीं हुआ? दरअसल  भारत जो 36 राफ़ेल लड़ाकू जेट विमान खरीदने का सौदा किया है उनमें से हर विमान की कीमत करीब 700 करोड़ रुपए है। इनमें उन शस्त्रों व दूसरी आधुनिक प्रणालियों की कीमत शामिल नहीं है जो कि इन विमानों में लगायी जाएगी। यह विमान कितने मंहगे हैं इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में जो रुस एसयू-30 एम के आई विमान वायुसेना में इस्तेमाल किए जा रहा है उनकी तुलना में राफेल दुगने मंहगे हैं। इन विमानों में वायु से जमीन पर मार करने वाली जो मिसाइलें फिट की जाएंगी उस प्रणाली की कीमत अलग से देनी होगी। 

भारत ने 2001 में 126 मीडियम मल्टी रोल क्रांम्बेट एयरक्राफ्ट (बहुउपयोगी लड़ाकू विमान) एमएमआरसीए खरीदने का फैसला 2001 में किया था। हालांकि इनकी खरीद का प्रस्ताव 2007 में प्रकाशित किया गया जिसमें इसका विस्तृत ब्यौरा था कि विमान में क्या-क्या खूबियां होनी चाहिए। इसके लिए प्रस्तावित निर्माताओं से जानकारी मंगवाई गई। यह प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि यह प्रस्ताव हासिल करने में पांच साल लग गए। जनवरी 2012 में अमेरिका एफ-18 व एफ-16, रुसी मिग-35, योरोपीय यूरोफाइटर, स्वीडन की साब ग्रिमेन सरीखी कंपनियों ने निविदाएं भेजीं। इन तमाम कंपनियों में से फ्रांस की डसाल्ट व उसकी भागीदार कंपनी थेल्स एंड सैफरान को चुना गया। यह तय किया गया कि इस कंपनी से भारतीय वायुसेना 126 विमान खरीदेगी इनमें से 108 विमान भारत में हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स के साथ संयुक्त उपक्रम में बनाए जाएंगे व डसाल्ट कंपनी भारत को उनके निर्माण संबंधी तकनीकी जानकारियों व प्रौद्योगिकी उपलब्ध करवाएगी। 

भारत सरकार यह बात बढ़ चढ़कर कह रही थी कि यह आधुनिक विमान देश में ही तैयार होगा मगर खुद उसकी निर्माता कंपनी ने ही इसका खंडन कर दिया। डसाल्ट कंपनी ने न केवल भारत को उनके निर्माण की तकनीक देने से इंकार कर दिया बल्कि दो टूक शब्दों में कह दिया कि एचएएल द्वारा बनाए जाने वाले विमानों की गुणवत्ता की वह गारंटी नहीं लेगी। मामला यहीं अटक गया। फिर पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा के पहले एक भारतीय प्रतिनिधि मंडल फ्रांस गया और उसने इस कंपनी को भरोसा दिलाया है कि हम 36 विमानों की जो पहली खेप खरीदेंगे वह फ्रांस में ही बनी होगी। भारत यह डील करने के लिए बेहद उत्सुक नजर आ रहा था। नरेंद्र मोदी इस खरीद का सेहरा अपने सिर बांधने के लिए ज्यादा उत्सुक थे कि उन्होंने इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह में फ्रांस के राष्ट्रपति होलैंदे को मुख्य अतिथि बना डाला।

अगले ही दिन भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर व फ्रांस के रक्षा मंत्री ली ब्रायन ने 36 राफेल विमान खरीद के समझौता मसौदे पर दसतखत कर दिए। काफी लंबे अरसे तक भारत व फ्रांस के बीच आफसैट क्लाज पर विवाद बना रहा। आफसैट क्लाज के तहत भारत चाहता था कि जितना पैसा इस खरीद पर वह खर्च कर रहा है उसका एक बड़ा हिस्सा फ्रांसीसी कंपनियां भारत में निवेश करे। अंततः यह तय हुआ कि कुल खरीद राशि का 60 फीसदी हिस्सा भारत में निवेश किया जाएगा। इसमें से कितना वास्तव में निवेश होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। जब पेप्सी ने भारत में कदम रखने की पहल की थी उसने भी यही ऐलान किया था कि हर एक डॉलर के आयात के बदले हम भारत से पांच डालर का सामान निर्यात करेंगे। आज इसका उल्टा भी नहीं हो रहा है।

पेप्सी की तरह डसाल्ट कंपनी के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि अपने विमान न बिक पाने के कारण यह कंपनी घाटे के दौर से गुजर रही थी व कर्मचारियों की कटौती और तालाबंदी तक की नौबत आ गई थी। करीब सात साल पहले सितंबर 2009 में तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने यह ऐलान किया था कि ब्राजील के राष्ट्रपति लूला द सिल्वा 36 राफेल विमान खरीदने के लिए राजी हो गए। इसे फ्रांस के सबसे बड़े अखबार ‘ली फिगारो’ ने राष्ट्रपति की बहुत बड़ी उपलब्धि बताया था। मालूम हो कि यह अखबार भी उसी कपंनी का है जो कि राफेल विमान तैयार करती है। उसके बाद दोनों देशों के राष्ट्रपति कई बार एक दूसरे से मिले पर यह डील नहीं हो सकी। 

राफेल के बारे में भारत का सबसे विश्वस्त और एक समय दुनिया का सुपर पावर कहे जाने वाले रुस की राय भी जान लेनी चाहिए। जब यह खरीद होने जा रही थी तो भारत में रुस के राजदूत एलेक्जेंडर कदाकिन ने कहा कि उन्हें यह खबर सुनकर बेहद आश्चर्य हुआ है। क्योंकि अगर भारत पाकिस्तान या चीन से मुकाबला करने के लिए राफेल खरीद रहा तो युद्ध के मैदान में यह उनके लड़ाकू विमानों के सामने मच्छर साबित होंगे। उन्हें मच्छरों की तरह मार दिया जाएगा। 

सबसे अहम बात इस विमान की कीमत है। यह वास्तव में कितने में खरीदा जा रहा है। इसके बारे में सरकार ने कुछ स्पष्ट नहीं किया है सिवाय यह बताने के कि यह दो सरकारों के बीच हुआ सौदा है जिसमें भारत-फ्रांस से विमान खरीदेगा। अगर सीधे शब्दों में कहा जाएगा तो इसका मतलब यही निकलेगा कि इस डील में कोई दलाल नहीं है इसलिए किसी को कमीशन या दलाली दिए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। पर वहीं इसमें और इसकी कीमत पर प्रश्न चिन्ह लग चुका है। सूत्रों के मुताबिक 2007 में राफेल 126 विमानों के लिए 10.5 बिलियन डॉलर ले रहा था।

जबकि सितंबर 2016 में हुई डील के मुताबिक वह मात्र 36 विमान 7.87 बिलियन पौंड में बेचेगा। मतलब यह है कि जो विमान 2007 में 626 करोड़ रुपए का मिल रहा था वह बिना आधुनिक यंत्रों के 680 करोड़ का मिलेगा व इसमें राडार निर्देशित मिसाइल फिट करने के बाद इसकी कीमत 1600 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगी। यहां यह भी बताना जरुरी हो जाता है कि भारत सरकार के 600 पैरामीटर्स पर सफल उतरने के बावजूद दुनिया के सिर्फ तीन देशों की वायुसेना में ही इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। यह है फ्रांस, इजिप्ट व कतर। यहां याद दिलाना जरुरी हो जाता है कि जब यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल के दौरान यह विमान खरीदने पर लगभग आम राय बन चुकी थी तब भाजपा के राज्यसभा सदस्य व पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा व सांसद एमवी मैसूरा रेड्डी ने यह कह कर सबको चौंका दिया था कि उनके पास जो जानकारी है उसके मुताबिक राष्ट्रहित में इसे खरीदना ठीक नहीं होगा। तत्कालीन रक्षा मंत्री उनके इस बयान के बाद इतने आहत हुए कि उन्होंने खरीद का फैसला ही टाल दिया। 

वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक यह विमान ‘वैनिला प्राइस’ पर खरीदा जा रहा है। इसका मतलब है कि आप जो आइसक्रीम खरीद रहे हो उसकी स्टिक, रैपर या कोन के पैसे अलग से चुकाने होंगे। यह तो उस घोड़े के खरीदने जैसा है जिसकी लगाम, काठी व नाल आदि की कीमत अलग से वसूली जाएगी व वह उस घोड़े की कीमत से भी ज्यादा हो। मजेदार बात तो यह है कि अगर यह विमान भारत में बनाया गया तो इसकी कीमत और भी बढ़ जाएगी क्योंकि भारत में मजदूरी, फ्रांस की तुलना में तीन गुना ज्यादा है। रक्षा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जब हमें 126 विमानों की जरुरत हो तो मात्र 36 विमान खरीदने से क्या फायदा। भारत को 42 विमान स्क्वैड्रनों की जरुरत है जबकि उसके पास मात्र 30 ही हैं। मालूम हो कि एक स्क्वैड्रन में 18 विमान होते है। मौजूदा स्क्वैड्रनों के मात्र 48 फीसदी विमान ही तुरंत कार्रवाई करने की स्थिति में हैं। यदि राफ़ेल विमान आ जाता है तो उस हालत में भी 75 फीसदी विमान ही किसी भी समय में युद्ध में हिस्सा लेने की हालत में होंगे। वैसे इस विमान की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता है।

पाकिस्तान के पास जो एफ-16 अमेरिकी विमान है। उनके जरिए वहां की सीमाओं से 50 किलोमीटर दूर तक मिसाइल के जरिए निशाना बनाया जा सकता है। जबकि राफ़ेल विमान के जरिए आकाश से पृथ्वी पर 150 किलोमीटर की दूरी तक मिसाइल के जरिए वार किया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि आज हम खतरे का सामना कर रहे हैं और विमान सालों बाद हमें मिलेगा। नरेंद्र मोदी के खासमखास सुब्रमण्यम स्वामी राफ़ेल विमान खरीदे जाने के सबसे विरोधी रहे हैं। उन्होंने इसकी खरीद की प्रक्रिया के दौरान सरकार को ऐसा न करने के लिए आगाह किया था। अब वे अपने विरोध को निर्णायक मोड़ पर ले जाने की तैयारी में है। 

वैसे इस देश की विडंबना ही रही है कि देश आजाद होने से लेकर आज तक हुई तमाम रक्षा खरीदों पर सवालिया निशान लगे और जिन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में यह खरीदें हुई वे बदनाम हुए। देश की पहली रक्षा खरीद पुरानी जीपों की खरीददारी थी। यह खरीद करने में ब्रिटेन में नियुक्त तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त ने बहुत अहम भूमिका निभाई थी। 

आजाद भारत का सबसे पहला वह भी रक्षा घोटाला लंदन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वेंगालिल कृष्णन कृष्णामूर्ति ने किया था जिन्हें वीके कृष्णामूर्ति के नाम से जाना जाता था। वे जवाहरलाल नेहरु के बेहद करीब थे। उन्होंने सारे नियम-कानून ताक पर रखकर भारतीय सेना के लिए 200 विलीज जीप खरीदने का सौदा किया। इसके लिए 80 लाख रुपए का भुगतान कर दिया गया। बड़ी मुश्किल से 200 की जगह 155 जीपें मद्रास बंदरगाह पर पहुंचीं। सेना ने उन्हें लेने से मना कर दिया क्योंकि वे द्वितीय विश्वयुद्ध में इस्तेमाल की जा चुकी थीं। उनकी हालत बहुत खराब थी। उन्हें रंगपोत करके ओवरहाल करके बेचा गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने सेना पर इन्हें स्वीकारने के लिए दबाव डाला। इस मामले को  लेकर संसद में बहुत हंगामा हुआ। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में बोफोर्स तोपों की खरीद पर हुए विवाद के कारण उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रक्षा मंत्री रहे जार्ज फर्नांडीस पर सैनिकों के कफन की खरीद में घोटाले के आरोप लगे तो मनमोहन सिंह सरकार हैलीकॉप्टर खरीद सरीखे विवादों में फंसी और अब जो विमान खरीदे जा रहे हैं उन्हें लेकर तरह-तरह की अटकलें व अफवाहों का बाजार गर्म है।

(विवेक सक्सेना वरिष्ठ पत्रकार हैं और बहुत समय तक इंडियन एक्सप्रेस समूह से जुड़े रहे हैं।) 

 






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