निजी हित और सुविधा की राजनीति बनाम क्रांति का मोर्चा

मुद्दा , जयपुर, सोमवार , 19-11-2018


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मदन कोथुनियां

राजस्थान का विधानसभा चुनाव आमजन के बुनियादी मुद्दों से हटकर टिकट बंटवारे के शोरगुल, बगावत व सोशल मीडिया के नव-पत्रकारों की भेंट चढ़ता जा रहा है। जो नव-बौद्धिकों की खेप पिछले सालों में तैयार हुई थी वो पुरातनपंथी बौद्धिकों की तरह चुनावी समर में गोते लगाती नजर आ रही है। जो नव-बौद्धिक लोग व्यवस्था परिवर्तन की बड़ी-बड़ी हांकते थे वो अपराधी, बाहुबली व जनता से कटे हुए उजले ठगों के समर्थक बनकर बाड़े में सिमटते नजर आ रहे हैं।

इसे भारतीय लोकतंत्र का सेक्युलर उत्सव माना जाना चाहिए क्योंकि जो बुद्धिजीवी, वैचारिक लोग पानी पी-पीकर सदा सड़ी-गली व्यवस्था का दोष राजनेताओं को देते थे और जो जागरूक नागरिक राजनेताओं को दोषी व बुद्धिजीवियों को पक्षपाती बता रहे थे वो सब चुनावी अखाड़े में एकसाथ मिलकर झूम रहे हैं!

जागरूकता का आलम देखिए कि जो कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाता है वो कट्टर हिन्दू बन जाता है और जो बीजेपी छोड़कर कांग्रेस के बाड़े में कुलांचे भर लेता है वो एकदम सेक्युलर। कांग्रेस व बीजेपी का टिकट नही पाने वाले व्यवस्था परिवर्तन के सबसे बड़े नायक हो जाते हैं। उन्हें भी तीसरे खेमे में कुछ यूं लिया जाता है- "व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ने के लिए तीसरे मोर्चे में आपका स्वागत है।"

बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा सरीखे तमाम बुनियादी मुद्दे हर बार की तरह इस बार भी हाशिये पर चले गए हैं। जनता उसी भ्रमजाल में फंसती नजर आ रही हो ऐसा भी नहीं है। राजस्थान में 50% से ज्यादा मतदाता सोशल मीडिया के शोरगुल से दूर हैं। युवाओं की जो फौज सोशल मीडिया में है वो अपने-अपने नेताओं के समर्थक बनकर बंटी हुई है। मगर जो 50% लोग सोशल मीडिया से दूर हैं वो भले ही पूरे राजस्थान के माहौल के मुताबिक जागरूक न हों मगर ज्यादातर मतदाता अपने बुनियादी मुद्दों को देखकर ही मत का प्रयोग करते हैं या अपनी जाति को लेकर रूढ़िवादी ही बना रहता है।

आरएसएस व बीजेपी के हिन्दू हित के जाल में इन 50% लोगों को यह सोशल मीडिया की बहकी युवा पीढ़ी कितनी फंसाने में कामयाब होगी , उस पर बीजेपी की जीत निर्भर करेगी। अभी 22 तारीख के बाद मोदी-योगी-शाह जैसे हिंदुत्व के बड़े-बड़े भाषण वीरों के लतीफे आएंगे तो माहौल बदलता नजर आएगा। कांग्रेसी नेता मंदिरों में पूजा करके जनेऊ दिखाते हुए निकलेंगे तो कई भावुक लोगों के नयनों से अश्रुधारा निकलती नजर आएगी।

दोनों स्थापित पार्टियों का बड़ा कैडर है जो किसी कारण से थोड़ा बहुत नाराज भी है तो उसको साध लिया जाएगा या उनके बाप-दादाओं का गुणगान करके भावुकता के जाल में फंसा लिया जाएगा। जो कांग्रेस में रहा है उसको चाहे आप मुरारी बापू की कथा में बैठा दो अंतरात्मा में तो कांग्रेस जिंदाबाद के नारे ही गूंजते रहेंगे और जिसने आरएसएस की निक्कर पहन ली या एक बार बीजेपी में रह गया चाहे उसको बापूजी के पैरों में बैठा दो नारा तो जय श्रीराम का ही लगाएगा!

कहने का तात्पर्य यह है कि स्थापित नेताओं के भड़काऊ भाषणों, तल्ख भाषा व जातीय गौरव के हिसाब से माहौल बदलता जाएगा और जिन्होंने पिछले कुछ दिनों से बगावत का पोषण प्राप्त किया है वो ठंडा पड़ता नजर आयेगा।

जब तक ब्रेनवाश करके पहले का डेटा मिटाया नहीं जाता तब तक सिर्फ चुनावी समर में बगावत का नारा शोरगुल में अपनी उपस्थिति तो दर्ज करवा सकता है मगर व्यवस्था परिवर्तन की तरफ मजबूती से कदम नहीं बढ़ा सकता।

राजस्थान में जितने भी कांग्रेस-बीजेपी से परे विकल्प के पहले प्रयास हुए हैं वो अपनी-अपनी पार्टियों से उचित लाभ न मिलने से नाराज नेताओं की अपने निजी हित के लिए बगावत मात्र रही थी और उसके मुकाबले देखा जाए तो कामरेडों को छोड़कर कहीं दूसरी जगह इस बार का नजारा भी ज्यादा जुदा नजर नहीं आ रहा है। कामरेड सदा से अपनी पार्टी व विचारधारा पर कायम रहे हैं।

जब भी कोई नई पार्टी बनती है तो स्थापित पार्टियों से नाराज नेता आगे आता है और फिर विचारहीन युवाओं की भीड़ जुटाता है और उसी भीड़ को देखकर स्थापित पार्टियों से बाकी पीड़ित नेता भी साथ आ जाते हैं। इन पीड़ितों की बगावतों में निश्चित विचारधारा न होने के कारण ज्यादा दम तो नहीं होता है मगर हम तो डूबेंगे सनम तुझे भी ले डूबेंगे की तर्ज पर तरुण युवा नेतृत्व को बर्बाद जरूर कर देते हैं।

एक बात यह भी देखी जानी चाहिए कि जब जनता स्थापित पार्टियों से नाराज होकर सवाल पूछने के मूड में आती है उस समय जनता को नया विकल्प बताकर यह पीड़ितों का नव-संघ सौ मर्ज की एक दवा की तर्ज पर अलादीन का चिराग दिखाने लग जाता है कि इसे रगड़ो और सब समस्या खत्म।

सोशल मीडिया के नव-बौद्धिकों को इस बात का ख्याल जरूर रखना चाहिए कि यहां नाबालिग ज्यादा हैं चाहे वो उम्र से न हों मगर बुद्धि से जरूर हैं। इसलिए उनको देखकर लहर/तूफान मत समझिए। स्थापित पार्टियों के राजनेताओं का गठजोड़ जेब कतरों से लेकर बड़े-बड़े अपराधियों तक से होता है। दिन में ये आमने-सामने होकर मुंह से आग लगाते हैं मगर शाम ढलते ही तीसरा खड़ा न हो उसके लिए मिलकर रणनीति तैयार करते हैं।

पांच साल में एक महीना उत्सव का होता है इसे जनता के मुद्दों का पिंडदान करके राजनैतिक पंडितों के गृहप्रवेश का त्यौहार माना जाना चाहिए। अगर किसी को कोई शंका हो तो पार्टियों के प्रत्याशियों की लिस्टों को जिस तरह उत्सुकता पूर्वक देखा/सामने रखा गया था क्या उसी प्रकार पार्टियों के घोषणा-पत्रों के प्रति उतनी उत्सुकता/चर्चा नजर आई? जब तक चेहरों के बजाय करतूतों पर चर्चा नहीं होगी तब तक जनता बेवकूफ बनती रहेगी और नेता बेवकूफ बनाते रहेंगे!

(जनचौक के लिए ये रिपोर्ट/लेख जयपुर से मदन कोथुनियां ने लिखी है।)








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