सीमा पर नहीं, घर में लड़ेगी भागवत की सेना!

ख़बरों के बीच , , बुधवार , 14-02-2018


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महेंद्र मिश्र

भारतीय समाज और व्यवस्था अपने जीवन के सबसे गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। एक तरफ कश्मीर में सीमा को एक बार फिर गरम किया जा रहा है। तो दूसरी तरफ घर में ही एक ऐसी ताकत खड़ी हो गयी है जो पूरी सेना और संविधान को चुनौती दे रही है। और ऊपर से ये जमात मौजूदा सरकार को निर्देशित करने की भूमिका में है। मुजफ्फरपुर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान को इसी आइने के चौखटे में देखा जाना चाहिए। जब वो कह रहे हैं कि उनकी ताकत सेना से भी बड़ी हो गयी है। तो उसके कुछ निहितार्थ हैं। सीधे खारिज करने की जगह उसे समझने की जरूरत है।

क्योंकि वो सेना न तो सीमा पर पाकिस्तान से लड़ने जा रही है और न ही चीन की सेना से डोकलाम में मोर्चा लेगी। लेकिन सेना है तो उसका इस्तेमाल होगा ही। फिर उसके लिए केवल घर बचता है। बल्कि कहा जा सकता है कि उसका इस्तेमाल हो रहा है। अभी घोषित तौर पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। लेकिन अघोषित तौर पर सभी दलित, पिछड़े, आदिवासी और गरीब इसके निशाने पर हैं। और ये सिलसिला आगे बढ़ा तो निश्चित तौर पर देश को एक बड़े गृह युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए।

दरअसल मुसलमानों के खिलाफ संघ की लड़ाई प्रायोजित है। जिसके लिए उसे अलग से अपने समर्थकों में “राष्ट्रवाद” की हवा भरनी पड़ती है। और फिर उस “राष्ट्रवादी” गुस्से को मुसलमानों की तरफ मोड़ना पड़ता है। लेकिन ये बात गौर करने की है कि अगर मुसलमानों के खिलाफ लड़ने वाला तबका किसी संघ के इशारे पर अपनी जान देने के लिए तैयार है तो फिर वही उसके अपने जो स्वाभाविक दुश्मन हैं। जिनको जीवन भर उसने अपने पैरों की जूती समझ कर उन पर शासन करता रहा है। उनके साथ उसका क्या सुलूक होगा?

उस व्यापक वंचित, दलित और पिछड़े तबके का सशक्तीकरण ही सवर्ण-सामंती वर्चस्व की कीमत पर हुआ है। पिछले 25 सालों में सत्ता और समाज के वर्चस्व से वंचित रहने की इस तबके की कुंठा अब दलितों और पिछड़ों पर हमले के रूप में सामने आ रही है। इलाहाबाद में बीच चौराहे पर सवर्ण दबंगों द्वारा एक दलित छात्र की हत्या इसी का नतीजा है। वहां एकबारगी उसे भले ही सीधे दलित समझकर न मारा गया हो। लेकिन सवर्ण तबके में ये अहसास की सत्ता अपनी है और अब कुछ भी गलत करके बचा जा सकता है। इस घटना को अंजाम देने के पीछे सर्वप्रमुख कारण है। 

देश में ये पूरा तबका आज खुद को ही सत्ता समझने लगा है। इस हिस्से के युवा भले बेरोजगार हों। लेकिन उनमें सत्ता में रहने का अहसास पैदा करा दिया गया है। और सत्ता का ये नशा ही उन्हें संघ के गणवेशधारियों से इतर एक विस्तारित सेना के अभिन्न हिस्से में तब्दील कर दिया है। इसलिए आने वाले दिनों में मुस्लिम समुदाय से इतर बाकी सामाजिक समुदायों के बीच अंदरूनी संघर्ष छिड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।

लेकिन आरएसएस चीफ के दावे के विपरीत संघ परिवारियों को शर्मिंदा करने वाला एक दूसरा सच भी है। लड़ाई के किसी भी मोर्चे पर संघ कभी आगे नहीं रहा है। इसके उलट देश में उसके भागने और माफी मांगने का ही इतिहास है। आजादी की लड़ाई हो या आपातकाल का समय सभी जगहों के लिए ये बात सही है। आजादी की लड़ाई इसका सबसे दुरुस्त उदाहरण है। जिसमें अमूमन तो उसने हिस्सा ही नहीं लिया। और किसी ने लिया भी तो वो सावरकर साबित हुआ।

माफी मांगा और अंग्रेजों की सेवा में जुट गया। और बाद में अंग्रेजों के निर्देश पर मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाने की हद तक चला गया। संघ-बीजेपी के नेता बंटवारे के लिए नेहरू को कोसते नहीं थकते। जबकि सच्चाई ये है कि बंटवारे की नींव इनके पुरखों ने डाली। और उसकी असली जिम्मेदार मुस्लिम लीग के साथ सत्ता की रास रचायी। उसके बाद दूसरी लड़ाई के मोर्चे का सच ये है कि आपातकाल में जेलों में बंद इनके नेता सरकार को चिट्ठियां लिखते रहे। और बहुत सारे इलाज के बहाने खुद को अस्पतालों में भर्ती करा लिए थे। यही इनका इतिहास है। 

इसलिए इनकी पूरी वीरता सत्ता के संरक्षण में चलती है। जैसे ही सत्ता जाती है फिर पर्दे के पीछे से ये दंगों के अपने पुराने खेल में जुट जाते हैं। भागवत के उद्घोष में एक और चीज शामिल थी जिस पर गौर किया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिस दिन देश हिंदू राष्ट्र बन जाएगा और व्यवस्था उसके मुताबिक चलने लगेगी। उस दिन आरएसएस की भूमिका खत्म हो जाएगी और वो खुद को समाप्त कर लेगा। अब ये हिंदू राष्ट्र किसकी कीमत पर बनेगा। इसकी राह में कौन रोड़ा है? आंख मूंद कर भी कोई बता सकता है वो संविधान और मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था है।

अगर कोई शख्स संविधान और लोकतंत्र को खुलेआम चुनौती दे रहा हो और उसकी कब्र खोदने की तैयारी कर रहा हो। और फिर इस कड़ी में उनकी रक्षा करने वाली सेना के सामने सबसे बड़ी सेना खड़ी कर लेने का ऐलान कर रहा हो। तब किसी के लिए भी खतरे की आशंका को समझना कठिन नहीं होना चाहिए। और अगर संघ उस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ता है तो उसको रोकने वाली ताकतें भी कम नहीं हैं। और न ही किसी रूप में कमजोर हैं। लिहाजा यही बात एक बड़े गृहयुद्ध की आशंका को पैदा कर देती है।






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