संघपरस्त जागरण ने पत्रकारिता में बेशर्मी की हदों को किया पार,कठुआ में बच्ची के रेप को बताया झूठा

पड़ताल , नई दिल्ली, शुक्रवार , 20-04-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। साम्प्रदायिक अभियानों में हमेशा आरएसएस का हथियार बनते रहे `दैनिक जागरण` ने नीचता और बेशर्मी की नयी मिसाल पेश की है। कठुआ की 8 साल की बच्ची के अपहरण, कई दिनों तक मंदिर में उसके साथ गैंगरेप और फिर उसकी नृशंस हत्या ने दुनिया को झकझोर कर रख दिया है पर `दैनिक जागरण` 20 अप्रैल, 2018 के अंक में मुखपृष्ठ पर अपनी मुख्य खबर में निष्कर्ष देता है -`बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म`। दुष्कर्म के मामलों में जरूरी संवेदनशीलता और कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर लिखी गई यह खबर फोरेंसिक लैब की उस रिपोर्ट के बावजूद लिखी गई है जो सबूतों को मिटाने की तमाम कोशिशों के बाद बच्ची के साथ गैंग रेप की पुष्टि करती है।

इस खबर को समझने के लिए इस भयानक वारदात के बाद की भगवा ब्रिगेड की करतूतों और खुद को नंबर-1 कहने वाले इस अखबार के चरित्र को समझना जरूरी है। सबसे पहले उस खबर का जिक्र जिसे आज जमकर वायरल किया जा चुका है। इस खबर में अखबार कठुआ कांड की दो चार्जशीट्स होने का दावा करता है और तरह-तरह की गोलमोल बातें करता है। एफएसएल रिपोर्ट को बिंदुवार रखने के बजाय उसके कुछ बिंदुओं को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश करता है।

अखबार एफएसएल रिपोर्ट में हाइमन के फटने की बात का जिक्र करता है पर एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के हवाले से बताने लगता है कि हाइमन किन-किन स्थितियों में फट सकता है। `घुड़सवारी, तैराकी, साइकलिंग आदि जोर के कामों` में हाइमन फटने की संभावना बताई जाती हैं। फैसला सुना दिया जाता है कि बच्ची के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ था। चोट भी किस-किस तरीके से लग सकती है जैसी कहानियां भी इस खबर में सुनाई जाती हैं। यह भी कि देवस्थान में लोग नतमस्तक होते हैं, वहां की सफाई भी होती है तो फिर वहां से बाल कैसे मिल सकता है।

इस अखबार और उसके पीछे काम कर रही ताकतों को दिक्कत यही है कि सबूतों की तमाम सफाई के बावजूद एफएसएल की रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि होती है। एफएसएल की यह रिपोर्ट दिल्ली की लेबोरेट्री से आई है। पुलिस की चार्जशीट में कहा गया है कि एसआई दत्ता और तिलक राज साजिश में शामिल थे। सबूत मिटाने के लिए बच्ची के कपड़े भी धो दिए गए थे। इसके बावजूद एफएसएल और चिकित्सीय परीक्षण में जो प्रमुख बातें हैं, उनमें से कुछ इस तरह हैं-

1-      पीड़िता के फ्रॉक और सलवार पर मिले खून के स्पष्ट धब्बे उसके डीएनए प्रोफाइल से मेल खाते हैं।

2-     वजाइना के धब्बों में मिला खून भी पीड़िता का था।

3-    पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट भी कहती है कि हाइमन को चोट पहुंची थी।

4-    वजाइना के भीतर खून के धब्बों वाले डिस्चार्ज थे।

5-      दिल्ली के ही मेडिकल एक्सपर्ट्स का निष्कर्ष है कि पीड़िता की हत्या से पहले उसके साथ एक से ज्यादा लोगों ने बलात्कार किया।

6-      पीड़िता को भोजन के बिना रखा गया और उसे सिडेटिव दिया गया।

7-      मौत की वजह गला घोंटा जाना था जिसकी वजह से हार्ट अटैक हुआ।

8-      मंदिर के भीतर से मिले बाल की डीएनए प्रोफाइलिंग मृतक बच्ची की डीएनए प्रोफाइल से मैच करती है। हत्या की जगह से मिले बाल की डीएनए प्रोफाइलिंग आरोपी के डीएनए से मेल खाती है।

ये सभी तथ्य चार्जशीट के साथ अदालत को सौंपे गए हैं। चार्जशीट का हिंदी अनुवाद भी नेट पर उपलब्ध है। इसके बावजूद इन तथ्यों की अनदेखी कर `बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म` शीर्षक से अखबार की लीड छापना कोई अचानक हुई संपादकीय भूल नहीं है। केस कोर्ट में है और यौन हिंसा के केस में अखबार का फैसला सुना देना छोटी बात नहीं है। दरअसल, यह खबर उसी मुहिम का हिस्सा है जो 17 जनवरी को बच्ची का शव मिलने के बाद जांच का शिकंजा कसते चले जाने के बाद छेड़ दी गई थी। सभी जानते हैं कि किस तरह जम्मू में भगवा ब्रिगेड ने इस नृशंस वारदात के आरोपियों के बचाव में तिरंगे झंडे लेकर जुलूस निकाले, बाजार बंद कराए, कोर्ट में चार्जशीट पेश किए जाने में भी बाधा पैदा की। इन जुलूसों में जम्मू सरकार के भाजपा कोटे के मंत्री तक शामिल थे। दुनिया भर में थू-थू हुई तो इस मुहिम में खुले तौर पर जरा झिझक पैदा हुई। इस बीच राष्ट्रपति ने इस घटना पर शोक जताया और प्रधानमंत्री ने भी अपने ढंग से अफसोस जाहिर किया। लेकिन, लगता है कि फ्लोटिंग कहे जाने वाले समर्थकों के बीच नुकसान की भरपाई के लिए इस तरह की खबर जरूरी थी जो सारी कारगुजारियों को जरा संबल दे सके। अखबार की खबर, खासकर उसके शीर्षक ने यह संबल मुहैया कराया। दिन भर इस खबर को जमकर वायरल किया गया। 

यह भी गौरतलब है कि जो कवि-कवियत्रियां अपने ढके-छिपे ढंग से साम्प्रदायिक अभियानों के प्रति हमदर्दी रखती रही हैं, 2 अप्रैल के दलितों के भारत बंद और कठुआ प्रकरण में खाल से बाहर आने लगी थीं। इस प्रकरण में ऐसे कथित बुद्धिजीवी स्त्री-पुरुष रोना रो रहे थे कि केस को नरेटिव देकर धर्म से जोड़ा जा रहा है। यह विलाप शर्मनाक था क्योंकि इस प्रकरण को साम्प्रदायिक नरेटिव देकर न्याय प्रक्रिया में सीधी बाधा पहुंचाने वाला पीड़ित खानाबदोश परिवार नहीं था बल्कि यही कथित साम्प्रदायिक बुद्धिजीवी और इनकी मातृशक्ति भगवा ब्रिगेड थी। आज अखबार की खबर आते ही इनमें से कई ने भाव-विभोर होकर कविताएं रचीं और अब तक की कारगुजारियों को जस्टीफाई घोषित कर डाला। वे अपनी जमीर से यह नहीं पूछ सके/सकीं कि क्या उनके लिए ऐसी कोई बच्ची थी भी या नहीं जिसे अगवा कर मार डाला गया। 

शाम होते-होते इस खबर को लेकर जवाब आने लगे तो बताया गया कि उसे पोर्टल से हटा लिया गया है। वेबसाइट पर खबरें लगाकर हटा लेने के खेल इसी तरह खेले जाते हैं जैसे बीजेपी के सीनियर लीडर तक फेक न्यूज ट्वीट करके वायरल हो जाने के बाद हटा लिया करते हैं। खबर ई-पेपर पर मौजूद है, लोगों के घरों में भी और सोशल मीडिया पर प्रिंट अखबार और ई-पेपर की कटिंग भी वायरल हो चुकी हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार और कोर्ट इस अखबार की करतूत के खिलाफ संज्ञान लेंगे। सरकार से तो इसकी अपेक्षा ही गलत है। अखबार के मालिक सरकार चला रही पार्टी का हिस्सा रहे हैं, उसके जरिये राज्य सभा भी पहुंचे हैं। इस अखबार को संघ का प्रिय अखबार कहा भी जाता है और वह हमेशा यह साबित भी करता रहा है।

मायावती जैसी प्रसिद्ध दलित नेत्री को लेकर अपमानजक टिप्पणी प्रकाशित करने से लेकर दंगों में साम्प्रदायिक भूमिका निभाना इस अखबार का चरित्र रहा है। अतीत में उसका कुछ नहीं बिगड़ सका तो फिलहाल उसे इस बात में कोई शक भी नहीं होगा कि उसका कुछ बिगड़ने जा रहा है। यह जरूर है कि इस तरह की करतूतों से पता चल रहा है कि इस केस में साजिशों का दौर रुकने वाला नहीं है। न्याय व्यवस्था में इन तत्वों का कोई यकीन नहीं है और न इन्हें यह शर्म है कि दुनिया में देश की भद पिट रही है। लग यही रहा है कि ये तत्व उस बच्ची के साथ की गई नृशंसता को जस्टीफाई करने की मुहिम जारी रखने वाले हैं। फेसबुक के बहुत सारे कथित राष्ट्रवादी-हिंदूवादी पन्नों पर तो उस बच्ची के साथ रेप को लेकर लगातार घिनौने स्टेटस जारी हैं ही।

 




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