अंततः सर संघचालक की कलई खुल गयी !

विश्लेषण , , बृहस्पतिवार , 20-09-2018


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लाल बहादुर सिंह

संघ प्रमुख भागवत ने कहा, " हम सभी एक ही देश की संतान हैं, भाई-भाई रहें। सब अपने हैं ।......जहां तक 'बंच ऑफ़ थॉट्स ' की बात है तो गुरूजी (गोलवलकर) के सामने जैसी परिस्थिति थी, वैसा विचार हुआ, लेकिन संघ बंद संगठन नहीं है। ऐसा नहीं है कि जो उन्होंने बोल दिया, वही लेकर चलें। हम अपनी सोच में भी परिवर्तन करते हैं।"

वैसे तो बहस इस पर भी लाज़मी है कि वह कौन सी ऐसी परिस्थिति थी जिसके नाम पर गोलवलकर के संविधान-विरोधी, लोकतंत्र-विरोधी, महिला-विरोधी, सामाजिक-न्याय विरोधी, मुस्लिम- विरोधी, मनु-स्मृति समर्थक, पितृसत्ता-समर्थक, हिटलर-मुसोलिनी समर्थक विचारों को भागवत न्यायोचित करार देना चाहते हैं ?

बहरहाल, गोलवलकर के आगे जाने और सोच में परिवर्तन के भागवत के बयान को लेकर माहौल बनाया जा रहा है कि संघ बदल रहा है !

क्या सचमुच ?

आइये, देखिये पहले ही रियल्टी चेक में 'भाई-भाई' की लफ़्फ़ाज़ी कैसे खंड खंड पाखंड बिखर गयी!

जब उनसे अयोध्या में राम-मंदिर पर सवाल पूछा गया, तब 'बदलते' संघ के प्रमुख से स्वाभाविक अपेक्षा क्या होनी चाहिए ?

कि वह यह कहते कि क्योंकि हम सब हिंदुस्तानी भाई-भाई हैं, इसलिए बलात किसी के धर्मस्थल का ध्वंस और उस पर कब्ज़ा कर अपना धर्मस्थल बनाना सर्वथा अनुचित है, 

कि वह यह कहते कि क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र और उसकी एकता सर्वोपरि है, इसलिए ऐसा कोई भी कदम जो देश के नागरिकों के बीच दरार पैदा करता है और इस तरह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है, हम उसका समर्थन नहीं करते ।

कि वह यह कहते कि हम क्योंकि संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हैं, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का जब और जैसा फैसला होगा , ठीक होगा ।

( उनसे यह अपेक्षा करना तो ज्यादती ही होती कि वह मंदिर के नाम पर अतीत में अपने 'परिवार' द्वारा चलाये गए उस उन्मादी अभियान के लिए क्षमा मांगेंगे जिसने आपसी भाईचारे का खून किया, गंगा-जमनी तहज़ीब को तबाह किया, राष्ट्रीय एकता को कमजोर किया और संविधान और लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई !)

जी नहीं, उन्होंने यह सब कुछ नहीं कहा ! उल्टे, उन्होंने ख्वाहिश जाहिर की, "मेरा मत है कि मंदिर निर्माण शीघ्र होना चाहिए जिस किसी उपाय से हो सकता हो, शीघ्र हो " !

गौर कीजिए, यहां उन्होंने यह तक नहीं कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मानेंगे, जो अब आमतौर पर तमाम शीर्ष भाजपाई मंत्री भी औपचारिकतावश या मजबूरीवश कहते हैं !

मंदिर शीघ्र बनाने पर जोर देकर ही वह नहीं रुके, उन्होंने अपना इशारा साफ़ कर दिया, "अध्यादेश का मामला सरकार के पास है ।", "आंदोलन में क्या करना है, यह विषय रामजन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति का है " !

कहीं यह अपने प्रचारक को जो देश का प्रधानमंत्री है, सर्वोच्च न्यायालय और संसद को बाईपास करके मंदिर के लिए अध्यादेश लाने का संकेत तो नहीं है !

कहीं यह भगवा ब्रिगेड को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के इंतज़ार की बजाय "आंदोलन" छेड़ने के लिए हरी झंडी तो नहीं है !

देखा आपने, भाईचारे की सारी जुमलेबाजी और संघ में बदलाव की अमूर्त वैचारिकी ठोस यथार्थ के पहले ही झटके में काफूर हो गयी !

दरअसल संघ भारतीय राज और समाज का बड़े पैमाने पर हिन्दूकरण करने में सफल हुआ है। इसके लिए उसे निश्चय ही मौजूदा पूंजीवादी विपक्ष, विशेषकर कथित युवा नेताओं का आभारी होना चाहिए जिन्होंने अपने वैचारिक खोखलेपन तथा राजनैतिक अवसरवाद में विचारधारा का पूरा क्षेत्र संघियों को चरने के लिए छोड़ दिया है और कई मायनों में उनके आगे समर्पण कर दिया है। संघ अपने इस कथित बदलाव की नकाब में समाज के उन तबकों में प्रवेश कर रहा है जो राजनैतिक रूप से आज गैर भाजपा दूसरे राजनैतिक दलों के (वास्तविक या संभावित) सामाजिक आधार हैं परंतु जहां विचारधारा का कवच नदारद है -उदारवादी तबके, नयी पीढ़ी, प्रोफेशनल्स, महिलाऐं, दलित-पिछड़े-आदिवासी-अल्पसंख्यक । उनके बीच एक confusion पैदा कर देना, अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना और ideological hegemony कायम करने की जद्दोजेहद है यह संघ सुप्रीमो की !(जिसे अंततः भाजपा की डूबती नैया पार लगाने के काम लगाया जाना है) ।

2019 के चुनाव में भाजपा की संभावित पराजय की स्थिति के लिए repositioning है यह संघ की !

राष्ट्र के किन्ही असावधान क्षणों में, गफलत पैदा कर मंदिर अध्यादेश/आंदोलन के उन्माद की कहीं यह तैयारी तो नहीं ?!

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

 








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