संगीन इरादों का संकेत देता है भागवत का बयान

धर्म-सियासत , , बुधवार , 14-02-2018


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अनिल जैन

 

नई दिल्ली। कल्पना कीजिए कि भारतीय सेना की तुलना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तैयारियों के संबंध में जो बयान संघ के सुप्रीमो मोहन राव भागवत ने दिया है, वैसा ही बयान अगर असदउद्दीन औवेसी ने या किसी अन्य मुस्लिम, दलित या आदिवासी संगठन के नेता ने दिया होता तो सरकार, सत्तारुढ़ दल और मीडिया का रवैया क्या होता! सरकार भले ही फौरी तौर पर बयान को नजरअंदाज कर जाती या उसके कुछ मंत्री कड़ी निंदा वाला बयान जारी कर देते मगर सत्तारुढ़ दल तथा संघ के प्रवक्ता और देशभक्ति का व्यापार करने वाले टीवी चैनलों ने तो निश्चित ही आसमान सिर पर उठा लिया होता। ज्यादा कुछ नहीं तो कम से कम बयान देने वाले नेता और उसके संगठन को देशविरोधी तो करार दे ही दिया गया होता और देश के कुछेक शहरों में तो बयान देने वाले नेता के खिलाफ मुकदमे तक दर्ज करा दिए गए होते। 

हालांकि संघ सुप्रीमो के बयान पर भी प्रतिक्रियाओं का बाजार गरम है। कांग्रेस सहित दूसरे विपक्षी दल इस बयान को देश की सेना का अपमान करार दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही है। तरह-तरह के चुटकुलों के जरिए भागवत और संघ की खिल्ली भी उड़ाई जा रही है। संघ और भाजपा की ओर से भागवत के बयान का बचाव करते हुए उस पर सफाई पेश की जा रही है। कहा जा रहा है कि उनके बयान का गलत अर्थ निकाला जा रहा है। इस सबके बीच भागवत के बयान के निहितार्थों पर चर्चा लगभग 'नहीं’ के बराबर हो रही है। 

भागवत यह बयान भारतीय सेना की तुलना में संघ की तैयारियों के संबंध में आया है। बिहार के मुजफ्फरपुर में संघ के एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि युद्ध की स्थिति में भारतीय सेना को तैयार होने में छह से सात महीने का वक्त लग सकता है लेकिन स्वयंसेवक दो से तीन दिन में ही तैयार होकर मौके पर पहुंचने में सक्षम हैं।

आमतौर पर संघ अपने मुखिया के किसी भी बयान पर कभी भी लिखित में स्पष्टीकरण जारी नहीं करता है, लेकिन भागवत के ताजा बयान पर संघ की ओर से बाकायदा लिखित बयान जारी कर सफाई पेश की गई है। इस बयान में कहा गया है कि भागवत के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है और उसका गलत अर्थ निकाला जा रहा है। दरअसल, मोहन भागवत का बयान न तो जुबान फिसलने वाला मामला है और न ही वह सेना का अपमान करने के मकसद से दिया गया है। वह बेहद सोचा-समझा और नपा-तुला बयान है, जिसे महज खिल्ली उड़ाकर या कठोर तंज कस कर खारिज नहीं किया जा सकता। 

जो भी व्यक्ति संघ को और उसके काम करने के तरीके को ठीक तरह से जानता है उसे मालूम है कि संघ का हर काम संगठित और योजनाबद्ध तरीके से होता है। सर संघचालक को कब क्या बोलना है, कैसे बोलना है और कितना बोलना है, यह भी पूरी तरह 'सु’नियोजित होता है। उनके बयान चाहे मुसलमानों की कथित बढ़ती आबादी के संबंध में हो, भारतीय विवाह संस्था के बारे में हो, हर हिंदू को चार से अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाला हो, दलितों आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के आरक्षण को लेकर हो, लड़कियों और महिलाओं के पहनावे को लेकर हो या फिर बलात्कार जैसे अपराधों को आधुनिक शिक्षा का परिणाम बताने वाला हो, हर बयान के पीछे संघ की विचारधारा और मकसद छुपा होता है। ऐसे बयान भले ही किसी को बकवास, हास्यास्पद या निंदनीय लगे लेकिन संघ परिवार के लिए उसके गहन-गंभीर मायने होते हैं। इसलिए संघ और उसके ढेर सारे बगल-बच्चा (आनुषांगिक) संगठनों की कार्यप्रणाली से वाकिफ लोगों को भागवत के ताजा बयान पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए। 

देश के हर शहर, गांव, मोहल्ला, गली, सरकारी-गैर सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और मैदानों में संघ और उससे जुड़े अन्य संगठनों के स्वयंसेवक हिंदुत्व की खास विचारधारा के तहत नियमित जुटते हैं और अनुशासित ढंग से अपने एजेंडे पर काम करते हैं। सेना की वर्दी के समान प्रतीकात्मक तौर पर संघ के स्वयंसेवक भी खाकी निक्कर, सफेद शर्ट, काली टोपी और लाठी धारण करते हैं। हालांकि निक्कर का स्थान अब कुछ दिनों पहले फुल पैंट ने ले लिया है। संघ की शाखाओं में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, लेकिन सहयोगी संगठनों में महिलाओं के लिए दुर्गा वाहिनी जैसे संगठन हैं, जो अपने मूल संगठन के एजेंडे के तहत काम करते हैं। वर्षों से देखने में आता रहा है कि हर साल दशहरा के अवसर पर पथ संचालन के नाम पर देश के तमाम शहरों और गांवों में संघ के स्वयंसेवक सेवक अपनी वर्दी धारण कर तथा लाठियां लेकर सड़कों पर निकल कर अपना शौर्य प्रकट करते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से लाठियों के साथ अब अक्सर तलवारों, बंदूकों और अन्य हथियारों का प्रदर्शन भी होने लगा है। दुर्गा वाहिनी में शामिल महिलाएं भी ऐसे हथियारों का प्रदर्शन करती हैं। शस्त्र पूजा के नाम पर इन हथियारों की पूजा भी की जाती है। संघ अपने स्वयंसेवकों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने के लिए समय-समय पर शिविरों का आयोजन भी करता है। इन शिविरों में सेना के अवकाश प्राप्त अफसरों को प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया जाता है। इतना ही नहीं, स्वयंसेवकों को गोपनीय रू प से बम आदि बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। केरल, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि राज्यों में तो ऐसे कई ठिकाने हाल के वर्षों में पकड में भी आए हैं जहां से पुलिस ने भारी मात्रा विस्फोटक सामग्री बरामद की है।

यह सच है कि संघ के स्वयंसेवक देश में किसी भी बड़ी आपदा के मौके पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए राहत और बचाव कार्य में हिस्सा लेते रहे हैं, जैसे गुजरात के मोरवी में मच्छू बांध के टूटने से आई प्रलयंकारी बाढ़ और कच्छ और भुज में आए विनाशकारी भूकंप के वक्त। यह भी सच है कि युद्ध की स्थिति में देश में नागरिक संगठनों की भूमिका अहम हो जाती हैं। 1962 और 1965 के युद्ध के समय सेना में भर्ती का विशेष अभियान भी चला था और नौजवानों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दिया गया था। इन दोनों युद्धों के दौरान शहरी यातायात आदि संभालने में संघ के स्वयंसेवकों ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री ने संघ की इस भूमिका के लिए प्रशंसा भी की थी, जिसका हवाला देकर संघ के नेता और समर्थक अक्सर यह आभास कराने की कोशिश करते हैं कि वह एक सेवाभावी सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है। 

सवाल है कि क्या संघ अपने दावे के मुताबिक वाकई एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है? अगर ऐसा है तो फिर उसे हथियारों का प्रदर्शन करने तथा अपने स्वयंसेवकों को मारक हथियार चलाने और बम आदि बनाने का प्रशिक्षण देने की क्या जरुरत है? इस तरह की गतिविधियां किस तरह की सांस्कृतिकता के तहत आती है और इनसे किस किस्म का सामाजिक सद्भाव कायम होता है?

यह गौरतलब है कि संघ 93 वर्ष पुराना संगठन है। भागवत से पहले भी उसके पांच सर संघचालक हो चुके हैं। संघ की जो गतिविधियां आज चल रही हैं, वे भागवत के सर संघचालक बनने से पहले से जारी हैं। लेकिन इससे पहले किसी सर संघचालक ने ऐसा बयान नहीं दिया था, जबकि उनके दौर में देश को युद्ध की स्थिति का सामना भी करना पड़ा है। आज तो युद्ध जैसी कोई बात अभी तक नहीं है, फिर भी आज भागवत को यह बयान देने की जरुरत क्यों महसूस हुई?

वास्तविक अर्थों में संघ एक देशव्यापी मिलिटेंट यानी उग्रपंथी संगठन है। हिंदुत्व की खास विचारधारा के तहत एक व्यापक एजेंडे के तहत वह काम करता चला रहा है। राजनीतिक ताकत भी उसने पर्याप्त तौर पर अर्जित कर ली है, जिसके बूते वह केंद्र सहित देश के 19 राज्यों में सत्ता पर काबिज है। वर्षों की तैयारी और सत्ता प्रतिष्ठान के सहयोग से वह देश में एक सशस्त्र ताकत के तौर पर तैयार हो चुका है। सेना के कई अवकाश प्राप्त अफसर संघ के विभिन्न आनुषांगिक संगठनों में काम कर रहे हैं। संघ अपने प्रचार याकि अफवाह फैलाने वाले तंत्र का परीक्षण भी वर्षों से समय-समय पर करता आ रहा है।

इस संदर्भ में गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने वाला वाकया तो कुख्यात है ही। संघ प्रमुख भागवत का बयान उनके संगठन की इसी क्षमता को व्यक्त करने वाला है। उनके बयान का सीधा आशय यह है कि आज जरुरत नहीं है, क्योंकि आज तो हम सत्ता में हैं, लेकिन कल अगर हमारे प्रतिकूल कोई स्थिति आई तो संघ की यह सैन्य तैयारी भारतीय सेना को भी चुनौती दे सकती हैं और देश में गृहयुद्ध छेड़कर उथल-पुथल मचा सकती है। इसकी प्रवृत्ति आईएस या तालिबान जैसी हो सकती है। संविधानेत्तर तरीकों से सत्ता पर कब्जा करने के अलावा यह दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की हत्याएं कर सकती है, जिसका छिटपुट सिलसिला अभी भी चल ही रहा है। कुल मिलाकर भागवत का बयान देश के अन्य वर्गों, देश की साझा संस्कृति व धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों में यकीन रखने वाले लोगों और संघ की विचारधारा से असहमति रखने वाली सामाजिक-राजनीतिक ताकतों के लिए एक संगीन चेतावनी है, जिसे न तो महज सेना के अपमान से जोड़कर देखा जा सकता है और न ही उसकी खिल्ली उड़ाकर खारिज किया जा सकता है। 

 










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