संघ चाहता है पैट्रन का किरदार

मुद्दा , , मंगलवार , 18-09-2018


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जनचौक ब्यूरो

चार साल तक बीजेपी और मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत की घोषणा करते रहने के बाद अचानक संघ को इलहाम हुआ कि ये नारा गलत है लिहाजा वो उसका समर्थन नहीं करता है। देश में नेहरू को आखिरी अंग्रेज बताने वाले और हर तरीके से उनकी चरित्र हत्या के प्रयास के बाद अब संघ को आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के होने का अहसास हुआ है। परिकल्पित हिंदू राष्ट्र को दरवाजे पर खड़ा देख, देश में गाय और बीफ के नाम पर घेर-घेर कर मुस्लिम मॉब लिंचिंग को हवा देने वाला संगठन अब कह रहा है कि उसकी परंपरा सबको साथ लेकर चलने की है।

संघ के सुर में अचानक आये इस बदलाव की आखिर वजह क्या है? दरसअल चार सालों तक सरकार में रहने के बाद अगले चुनाव में उसे बीजेपी के सत्ता में नहीं आ पाने का भय सताने लगा है। हमेशा पर्दे के पीछे से खेल खेलने वाला संघ पहली बार खुल कर मोदी के शासन में तमाम चीजों की अगुवाई कर रहा था। लिहाजा किसी बीजेपी और उसके संगठन से ज्यादा विपक्ष के निशाने पर अब संघ रहता है। 

अनायास नहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार संघ का नाम लेकर देश में चल रही तमाम चीजों के लिए उसे जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। यही बात संघ को अंदर से परेशान कर रही है। क्योंकि संघ जानता है कि अगर सत्ता की निगाह तिरछी हो गयी तो फिर उसके लिए अपने तंत्र को चलाना मुश्किल हो जाएगा। लिहाजा उसने अब 2019 के बाद की तैयारी शुरू कर दी है। दिल्ली में संघ का तीन दिनों तक चलने वाला कनक्लेब उसी नजरिये से रखा गया है। जिसमें अपने बारे में बताने के साथ ही विपक्ष समेत अपने से इतर तमाम संगठनों को भी न्योता दिया गया है। इसके जरिये संघ खुद को एक अंब्रेला संगठन के तौर पर पेश करना चाहता है।

संघ प्रमुख का कहना कि बीजेपी में स्वयंसेवक हैं और संघ से विचार लेना न लेना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है। इसके जरिये उन्होंने एक बार फिर आरएसएस को बीजेपी से अलग दिखाने की कोशिश की है। लेकिन इसकी असलियत देश देख चुका है। जब आडवाणी जिन्ना के मसले पर संघ से इतर रुख अपनाए तो किस तरह से उन्हें पैदल कर दिया गया। इसलिए पहले भले ही किसी को कोई भ्रम रहा हो लेकिन मोदी काल में संघ और बीजेपी के नाभि-नाल के रिश्ते को अब कोई अनाड़ी ही नहीं समझ पाएगा। कम से कम वैचारिक मसलों पर बीजेपी में संघ के बगैर पत्ता भी नहीं खड़कता है अब ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है।

संघ के इस मौजूदा रुख का असर बीजेपी और संघ दोनों संगठनों के रिश्तों में साफ-साफ दिखने लगा है। जो संघ और मोदी-शाह जोड़ी के बीच अंतरविरोध के रूप में सामने आ रहा है। दरअसल संघ ने 2019 में बहुमत न मिलने और यहां तक कि सरकार न बनने की स्थिति के लिहाज से तैयारी शुरू कर दी है। जिसमें एक बात बिल्कुल साफ दिख रही है कि किसी बड़े और धर्मनिरपेक्ष गठबंधन का चेहरा मोदी नहीं हो सकते हैं। इस लिहाज से उसने अभी से नितिन गडकरी को आगे करना शुरू कर दिया है। गडकरी के संघ के साथ खास रिश्ते होने के चलते दोनों के बीच विश्वसनीयता का संकट नहीं होगा। साथ ही एक उदार चेहरा जिसके विपक्ष के नेताओं के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं को आगे करना हर लिहाज से संघ के लिए लाभदायक साबित हो सकता है।

संघ की इस चाल को भांप कर अब मोदी और शाह भी उसी तरीके से व्यवहार करना शुरू कर दिए हैं। लिहाजा उन्होंने नितिन गडकरी की हर राह में रोड़ा अटकाना शुरू कर दिया है। मसलन अभी शिकागो में हुई विश्व हिंदू कांग्रेस में गडकरी का भाषण होना था लेकिन आखिरी मौके पर उनका कार्यक्रम ये कहकर रद्द कर दिया गया कि उन्हें बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में हिस्सा लेना है। अभी से प्रोजेक्शन के लिहाज से संघ गडकरी के साथ खड़ा हो गया है। रोड एवं ट्रांसपोर्ट मंत्रालय गडकरी के पास होने के चलते बताया जा रहा है कि यूपी में सड़कों के किनारे गडकरी और योगी आदित्यनाथ की जो तस्वीरें लग रही हैं उनमें मोदी की तस्वीर नदारद है।

इतना ही नहीं हाल में दिल्ली में संपन्न हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कृषि संबंधी प्रस्ताव को गडकरी को पेश करना था लेकिन आखिरी मौके पर उसे बदलकर उनकी जगह शिवराज सिंह चौहान से उसे पेश कराया गया। ये तमाम चीजें हैं जो संघ-बीजेपी के सत्ता तंत्र के भीतर चल रही हैं। अब ऊंट के करवट की दिशा को समझने के लिए जनता के फैसले का इंतजार करना होगा।








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