संसद में तार-तार होते संविधान की भला किसे है फिक्र

मुद्दा , , शुक्रवार , 11-01-2019


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पुण्य प्रसून वाजपेयी

मोदी सत्ता के दस फीसदी आरक्षण ने दसियों सवाल खड़े कर दिये। कुछ को दिखायी दे रहा है कि बीजेपी-संघ का पिछड़ी जातियों के खिलाफ अगड़ी जातियों के गोलबंदी का तरीका है। तो कुछ मान रहे हैं कि जातीय आरक्षण के पक्ष में तो कभी बीजेपी रही ही नहीं तो संघ की पाठशाला जो हमेशा से आर्थिक तौर पर कमजोर तबके को आरक्षण देने के पक्ष में थी उसका श्रीगणेश हो गया । तो किसी को लग रहा है कि तीन राज्यों के चुनाव में बीजेपी के दलित प्रेम से जो अगड़े रुठ गये थे उन्हें मनाने के लिये आरक्षण का पासा फेंक दिया गया । तो किसी को लग रहा है आंबेडकर की थ्योरी को ही बीजेपी ने पलट दिया। जो आरक्षण की व्यवस्था इस सोच के साथ कर गये थे कि हाशिये पर पड़े कमजोर तबके को मुख्यधारा से जोड़ने के लिये आरक्षण जरुरी है । तो कोई मान रहा है कि शुद्ध राजनीतिक लाभ का पासा बीजेपी ने अगड़ों के आरक्षण के जरिये फेंका है ।

तो किसी को लग रहा है कि बीजेपी को अपने ही आरक्षण पासे से ना खुदा मिलेगा ना विसाले सनम । और कोई मान रहा है कि बीजेपी का बंटाधार तय है क्योंकि आरक्षण जब सीधे-सीधे नौकरी से जोड़ दिया गया है तो फिर नौकरी के लिये बंद रास्तों को बीजेपी कैसे खोलेगी । यानी युवा आक्रोश में आरक्षण घी का काम करेगा । और कोई तो इतिहास के पन्नों को पलट कर साफ कह रहा है जब वीपी सिंह को मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने वाले हालात में भी सत्ता नहीं मिली तो ओबीसी मोदी की हथेली पर क्या रेंगेगा। इन तमाम लकीरों के सामानांतर नौकरी से ज्यादा राजनीतिक सत्ता के लिये कैसे आरक्षण लाया जा रहा है और बिछी बिसात पर कैसी-कैसी चालें चली जा रही हैं ये भी कम दिलचस्प नहीं है ।

क्योंकि आरक्षण का समर्थन करती कांग्रेस के पक्ष में जो दो दल खुल कर साथ हैं उनकी पहचान ही जातीय आरक्षण से जुड़ी रही है पर उन्हीं दो दलों (आरजेडी और डीएमके) ने मोदी सत्ता के आरक्षण का विरोध किया । फिर जिस तरह आठवले और पासवान मोदी के गुणगान में मायावती को याद करते रहे और मायावती मोदी सत्ता के खिलाफ लकीरों को गाढ़ा करती रहीं उसने अभी से संकेत देने शुरु कर दिये हैं कि इस बार का लोकसभा चुनाव वोटरों को भरमाने के लिये ऐसी बिसात बिछाने पर उतारु है जिसमें पार्टियों के भीतर उम्मीदवार दर उम्मीदवार का रुख अलग अलग होगा । 

तो क्या देश का सच आरक्षण में छिपे नौकरियों के लाभ का है । पर सवाल तो इस पर भी उठ चुके हैं । क्योंकि एक तरफ नौकरियां हैं नहीं और दूसरी तरफ मोदी सत्ता के आरक्षण ने अगड़े तबके में भी दरार कुछ ऐसी डाल दी कि जिसने दस फीसदी आरक्षण का लाभ उठाया वह भविष्य में फंस जायेगा । क्योंकि 10 फीसदी आरक्षण के दायरे में आने का मतलब है सामन्य कोटे के 40 फिसदी से अलग हो जाना । तो 10 फीसदी आरक्षण का लाभ भविष्य में दस फीसदी के दायरे में ही सिमटा देगा । पर मोदी सत्ता के आरक्षण के फार्मूले ने पहली बार देश के उस सच को भी उजागर कर दिया है जिसे अक्सर सत्ता छुपा लेती थी ।

यानी देश में जो रोजगार है उसे भी क्यों भर पाने की स्थिति में कोई भी सत्ता क्यों नहीं आ पाती है ये सवाल इससे पहले गवर्नेंस की काबिलियत पर सवाल उठाती थी । लेकिन इस बार आरक्षण कैसे एक खुला सियासी छल है ये भी खुले तौर पर ही उभरा है । यानी सवाल सिर्फ इतना भर नहीं है कि देश की कमजोर होती अर्थव्यवस्था या विकास दर के बीच नौकरियां पैदा कहां से होंगी । बल्कि नया सवाल तो ये भी है कि सरकार के खजाने में इतनी पूंजी ही नहीं है कि वह खाली पड़े पदों को भर कर उन्हें वेतन तक देने की स्थिति में आ जाए । यूं ये अलग मसला है कि सत्ता उसी खजाने से अपनी विलासिता में कोई कसर छोड़ती नहीं है । 

तो ऐसे में आखिरी सवाल उन युवाओं का है जो पाई-पाई जोड़ कर सरकारी नौकरियों के फार्म भरने और लिखित परिक्षा दे रहे हैं । और इसके बाद भी वही युवा भारत गुस्से में हो जिस युवा भारत को अपना वोटर बनाने के लिये वही सत्ता लालालियत है जो पूरे सिस्टम को हड़प कर आरक्षण को ही सिस्टम बनाने तक के हालात बनाने की दिशा में बढं चुकी है । यानी जिन्दगी जीने की जद्दोजहद में राजनीतिक सत्ता से करीब आये बगैर कोई काम हो नहीं सकता । और राजनीतिक सत्ता खुद को सत्ता में बनाये रखने के लिये बेरोजगार युवाओं को राजनीतिक कार्यकर्ता बनाकर रोजगार देने से नहीं हिचक रही है । बीजेपी के दस करोड़ कार्यकर्ताओं की फौज में चार करोड़ युवा हैं । जिसके लिये राजनीतिक दल से जुड़ना ही रोजगार है ।

राजनीतिक सत्ता की दौड़ में लगे देश भर में हजारों नेताओं के साथ देश के सैकड़ों पढ़े-लिखे नौजवान इसलिये जुड़ चुके हैं क्योंकि नेताओं की प्रोफाइल वह शानदार तरीके से बना सकते हैं । और नेता को उसके क्षेत्र से रुबरु कराकर नेता को कहां क्या कहना है इसे भी पढ़े लिखे युवा बताते हैं, और सोशल मीडिया पर नेता के लिये शब्दों को न्यौछावर यही पढ़े लिखे नौजवान करते हैं । क्योंकि नौकरी तो सत्ता ने अपनी विलासिता तले हड़प लिया और सत्ता की विलासिता बरकरार रहे इसके लिये पढ़े लिखे बेरोजगारों ने इन्हीं नेताओं के दरवाजे पर नौकरी कर ली ।

शर्मिंदा होने की जरुरत किसी को नहीं है क्योंकि बीते चार बरस में दिल्ली में सात सौ से ज्यादा पत्रकार भी किसी नेता , किसी सांसद , किसी विधायक , किसी मंत्री या फिर पीएमओ में ही बेरोजगारी के डर तले उन्हीं की तिमारदारी करने को ही नौकरी मान चुके हैं । यानी सवाल ये नहीं है कि आरक्षण का ऐलान किया ही क्यों गया जब कुछ लाभ नहीं है बल्कि सवाल तो अब ये है कि वह कौन सा बड़ा एलान आने वाले दो महीने में होने वाला है जो भारत की तकदीर बदलने के लिये होगा । और उससे डूबती सत्ता संभल जायेगी । क्या ये संभव है । अगर है तो इंतजार कीजिये और अगर संभव नहीं है तो फिर सत्ता को संविधान मान लीजिये जिसका हर शब्द अब संसद में ही तार तार होता है ।

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)








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