पूंजी निवेश के जरिये उपनिवेश बनाने का प्रतीक है श्रीलंका संकट

देश-दुनिया , , मंगलवार , 13-11-2018


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पुण्य प्रसून वाजपेयी

पड़ोसी देशों की कतार में पहली बार श्रीलंका में राजनीतिक संकट के पीछे जिस तरह चीन के विस्तार को देखा जा रहा है, वह एक नये संकट की आहट भी है और संकेत भी कि अब वाकई युद्ध विश्व बाजार पर कब्जा करने के लिये पूंजी के जरिये होंगे ना कि हथियारों के जरिये। ये सवाल इसलिये क्योंकि श्रीलंका के ऱाष्ट्रपति सिरीसेना ने जिस तरह प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर पूर्व राष्ट्रपति महिन्दा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया । जबकि रानिल विक्रमसिंघे के पास राजपक्षे से ज्यादा सीट है। और उसके बाद के घटनाक्रम में संसद को ही भंग कर नये चुनाव के ऐलान की तरफ बढ़ना पड़ा । इन हालातों को सिर्फ श्रीलंका के राजनीतिक घटनाक्रम के तहत देखना अब भूल होगी ।

क्योंकि राष्ट्रपति सिरीसेना और राजपक्षे दोनों ही चीन के प्रोजेक्ट के लाने के हिमायती हैं ये किसी से छुपा नहीं है । और जिस तरह चीन ने श्रीलंका में पूंजी के जरिये अपना विस्तार किया वह भारत के लिये नये संकट की आहट इसलिये है क्योंकि दुनिया एक बार फिर उस उपनिवेशी सोच के दायरे में लौट रही है जिसके लिये पहला विश्वयुद्ध हुआ। ये लकीर बेहद महीन है लेकिन आधुनिक वक्त में या कहें इक्सवीं सदी में उपनिवेश बनाने के लिये किसी भी देश को कैसे कर्ज तले दबाया जाता है और पिर मनमानी की जाती है ये एक के बाद एक कई घटनाओं से साफ से होने लगा है । और भारत की विदेश नीति इस दौड़ में ना सिर्फ चुकी है बल्कि चीन का सामना करने में इतने मुश्किल हालात पैदा हुये हैं कि एक वक्त बिना किसी एजेंडे के संबंध ठीक करने भर के लिये प्रधानमंत्री मोदी दो दिन की चीन यात्रा पर चले जाते हैं । 

दरअसल बात श्रीलंका से ही शुरू करें तो भारत और चीन दोनों ही श्रीलंका में भारी पूंजी निवेश की दौड़ लगा रहे हैं । और राजनीतिक उठापटक की स्थिति श्रीलंका में तभी गहराती है जब कोलंबो पोर्ट को लेकर कैबिनेट की बैठक में भारत-जापान के साथ साझा वेंचर को खारिज कर चीन को परियोजना देने की बात होती है । तब श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे इसका विरोध करते हैं । और उसके बाद राष्ट्रपति सिरीसेना 26 अक्टूबर को प्रधानमंत्री रानिल को ही बर्खास्त कर चीन के हिमायती रहे राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना देते हैं ।

और मौजूदा सच तो यही है कि कोलंबो पोर्ट ही नहीं बल्कि कोलंबो में करीब डेढ़ बिलियन डालर का निवेश कर चीन होटल, जहाज, मोटर रेसिंग ट्रैक तक बना रहा है । इसके मायने दो तरह से समझे जा सकते हैं । पहला, इससे पहले श्रीलंका चीन के सरकारी बैकों का कर्ज चुका नहीं पाया तो उसे हम्बनटोटा बंदरगाह सौ बरस के लिये चीन के हवाले करना पड़ा और अब कोलंबो पोर्ट भी अगर उस दिशा में जा रहा है तो दूसरे हालात सामरिक संकट के हैं । क्योंकि भारत के लिये चीन उस संकट की तरह है जहां वह अपने मिलिट्री बेस का विस्तार पड़ोसी देशों में कर रहा है । कोलंबो तक अगर चीन पहुंचता है तो भारत के लिये संकट कई स्तर पर होगा । यानी श्रीलंका के राजनीतिक संकट को सिर्फ श्रीलंका के दायरे में देखना अब मूर्खतापूर्ण ही होगा ।

ठीक वैसे ही जैसे चीन मालदीव में घुस चुका है । नेपाल में चीन हिमालय तक सड़क के जरिये दस्तक देने को तैयार हो रहा है । भूटान में नई वाम सोच वाली सत्ता के साथ निकटता के जरिये डोकलाम की जमीन के बदले दूसरी जमीन देने पर सहमति बनाने की दिशा में काम कर रहा है । और बांगलादेश जिस तरह हथियारों को लेकर चीन पर निर्भर है । करीब 31 अरब डालर लगाकर बांग्लादेश की दर्जन भल परियोजनाओं पर काम कर रहा है ।

हालांकि पहली बार बांग्लादेश ने पद्मा नदी पर बनने वाले 20 किलोमीटर लंबे पुल समेत कई अन्य परियोजनाओं को लेकर 2015 में हुये चीन के साथ समझौते से अब पांव पीछे खींचे हैं । लेकिन जिस तरह बांग्लादेश ने ढाका स्टाक एक्सचेंज को 11.99 करोड़ डालर में चीन को बेच दिया । और इसी के सामानांतर पाकिस्तान की इकोनामी भी अब चीन ही संभाले हुये है । तो क्या पाकिस्तन चीन का नया उपनिवेश है । और नये हालात में क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि चीन की विस्तारवादी नीति पूंजी निवेश कर कई देशों को उपनिवेश बनाने की ही दिशा में जा रही है । 

दरअसल ये पूरी प्रक्रिया भारत के लिये खतरनाक है । लेकिन समझना ये भी होगा कि इसी दौर में भारत की विदेश नीति ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को खत्म कर दिया । पड़ोसियों के साथ तालमेल बनाये रखने के लिये सार्क मंच भी ठप कर दिया । यानी जिस गुटनिरपेक्ष मंच के जरिये भारत दुनिया के ताकतवर देशों के सामने खड़ा हो सकता था । अपनी वैदेशिक सौदेबाजी के दायरे को विस्तार दे सकता था उसे अमेरिकी राह पर चलते हुये खत्म कर गया । तो क्या भारत की विदेश नीति आर्थिक हितों को पाने के लिये अमेरिकी उपनिवेश बनने की दिशा में जाने लगी है ।

ये सवाल इसलिये महत्वपूर्ण हैं कि आज भारत की इक्नामी तो खासी बड़ी है । लेकिन अमेरिका तय करता है कि भारत ईरान से तेल ले या नहीं । या फिर रुस के साथ हथियारों के समझौते पर उस विरोध भारत के लिये महत्वपूर्ण हो जाता है । जबकि एक सच तो ये भी है कि इंदिरा गांधी के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था आज सरीखे मजबूत भी नहीं थी । लेकिन तब इंदिरा गांधी अमेरिका से भी टकरा रही थीं । वाजपेयी के दौर में भी परमाणु परिक्षण अमेरिका को दरकिनार करने की सोच के साथ हुये । 

तो आखिरी सवाल ये खड़ा हो सकता है कि अब रास्ता क्या है । दरअसल भारत का संकट भी राजनीतिक सत्ता को पाने या गंवाने पर जिस तरह जा टिका है उससे सारी नीतियां किस तरह प्रभावित हो रही हैं ये सभी के सामने हैं । क्योंकि हम ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र में विदेशी पूंजी और विदेशी ताकतों पर निर्भर होते जा रहे हैं । ताजा मिसाल रिजर्व बैक का है । जो देश के आर्थिक संकट का एक नायाब चेहरा है । चुनावी बरस होने की वजह से सत्ता चाहती है रिजर्व बैक 3 लाख करोड़ रिजर्व राशि मार्केट में झोंके । यानी इतनी बड़ी राशि के बाजार में आने से तीन असर साफ पड़ेंगे ।

पहला, डालर और मंहगा होगा । दूसरा मंहगाई बढ़ेगी । तीसरा पेट्रोल की किमतें और बढ़ेंगी । यानी सत्ता में बने रहने की तिकड़म अगर देश की इकोनामी से खिलवाड़ करे तो ये सवाल आने वाले वक्त में किसी भी सत्ता से पूछा जा सकता है कि विदेशी निवेश के जरिये राजनीतिक सत्ता जब उपनिवेश बन जाती है तो फिर देश को उपनिवेश बनाने से कोई कैसे रोकेगा।

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

 








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