घाटी में पत्रकारिता की संजीदा और सुसंगत आवाज थे शुजात

उर्मिलेश की कलम से , , शुक्रवार , 15-06-2018


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उर्मिलेश

अभी कुछ ही समय पहले हम लोगों ने दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में साथ-साथ लंच किया। हाल के वर्षों में शुजात का दिल्ली आना-जाना बढ़ गया था, इसलिए हम लोगों की मुलाकातें भी अक्सर होने लगी थीं। वह जब कभी दिल्ली आते, प्रायः फोन करते। कई बार मुलाकात होती और कई बार नहीं भी हो पाती। पर जब कभी मिलते, देर तक बैठते! दिल्ली में उसके बहुत सारे दोस्त थे। लेकिन श्रीनगर में मेरे गिने-चुने दोस्त हैं। शुजात उनमें एक था। मैं जब कभी श्रीनगर जाता। सबसे पहले उसे या इशफाक को फोन करता। फोन पर मैं पूछता, ‘शुजात कहां हो?’ उसका एक ही जवाब होता, ‘जनाब आप श्रीनगर पहुंच गये क्या?’ फिर हम मिलते और ढेर सारी बातें होतीं। जब तक जीवन है, श्रीनगर तो जाता ही रहूंगा पर अफसोस कि अब वहां शुजात नहीं मिलेगा! पर उसकी यादें ताउम्र जिंदा रहेंगी। 

जम्मू-कश्मीर के लोकप्रिय़ अखबार 'राइजिंग कश्मीर' के प्रधान संपादक शुजात बुखारी की नृशंस हत्या की खबर गुरुवार की शाम सबसे पहले मित्र-पत्रकार ओम थानवी से मिली। उस वक्त मैं अपने घर के पास एक पार्क में सैर के लिए निकला था। सुनकर बिल्कुल यकीन नहीं हो रहा था। इस खौफनाक सूचना के बाद कुछ देर के लिए लगा मानो पता नहीं मैं किस अंधेरी अतल गहराई में गिरता जा रहा हूं, जहां सिर्फ शून्यता ही शून्यता है! खबर पर यकीन करने में कुछ वक्त लगा। शुजात मेरे लिए सिर्फ एक पत्रकार-संपादक नहीं, वह एक प्यारा दोस्त भी था। ऐसा दोस्त, जिस पर हर हालत में यकीन किया जा सके। 

सन् 2016 के अक्तूबर महीने में मेरी किताब ‘कश्मीरः विरासत और सियासत’ (प्रथम प्रकाशन-2006) के नये संशोधित संस्करण का लोकार्पण होना था। शुजात को आमंत्रण मिला तो उसने बताया कि उस वक्त वह विदेश दौरे पर होगा। लेकिन अक्तूबर के पहले सप्ताह के अंत तक वह स्वेदश लौट रहा है। मैंने ताऱीख उसी के हिसाब से तय की। और वह जनाब विदेश-यात्रा की थकावट के बावजूद समारोह में हाजिर हो गये। श्रीनगर बाद में गये। उस कार्यक्रम में कुलदीप नैयर, प्रेमशंकर झा, एम एम अंसारी और संजय काक के साथ शुजात प्रमुख वक्ता थे। उसके संबोधन को काफी सराहा गया। कश्मीर पर शुजात के संतुलित नजरिये को ‘सत्ताधारी समूह की सोच’ वाले लोगों के अलावा सभी तरह के संजीदा लोग पसंद करते थे। उसके विचारों में सरहदी सूबे की अवाम का दर्द भी होता था और सियासी हल के जरूरी फार्मूले तलाशने की जद्दोजहद भी। यही वह संतुलन था जो उसे अन्य कई कश्मीरी पत्रकारों के बीच विशिष्ट और ज्यादा स्वीकार्य बनाता था।

पहली बार हम लोग संभवतः सन् 1997 या सन् 1998 के अगस्त-सितम्बर महीने में श्रीनगर में मिले थे। तब शुजात ‘कश्मीर टाइम्स’ के श्रीनगर ब्यूरो में संवाददाता थे। कुछ ही समय बाद में वह 'द हिन्दू' के साथ जुड़े। कई साल ‘ द हिन्दू’ के श्रीनगर संवाददाता के रूप में काम करने के बाद वह अपना अखबार 'राइजिंग कश्मीर' लेकर आये। बहुत कम समय में ही उनका अखबार सरहदी सूबे का प्रमुख अखबार बन गया। 

शुजात प्रतिभाशाली संपादक-पत्रकार के अलावा बेहद जहीन और दोस्ताना तबीयत का इंसान था। वह न जाने कितने लोगों का दोस्त था। और हर दोस्त उसे अजीज समझता था। सचमुच हरदिल-अजीज! 

पता नहीं, किसने और क्यों उससे दुश्मनी पाली थी! क्या कभी इसका खुलासा हो सकेगा कि उस जैसे प्यारे इंसान का कत्ल करने वाले और कराने वाले कौन हैं? काश, कश्मीर को इस बात का पता चलता!

शुजात के इस तरह से जाने के बाद अब मैं कह सकता हूं कि जम्मू-कश्मीर में आज अनेक जगहें फिर से बेहद खौफनाक हो गई हैं। शायद, मिलिटेंसी के सबसे काले दिनों से भी ज्यादा! वाजपेयी-मनमोहन दौर में मिलिटेंसी का राजनीतिक हल तलाशने की जो कोशिशें हुईं, उनका बेहतरीन नतीजा दिखने लगा था। लेकिन सन् 2014-15 के बाद घाटी के हालात फिर खराब होने शुरू हो गये। चीजें पटरी से उतरने लगीं। हाल के वर्षों में वहां पत्रकारों पर कभी जानलेवा हमले नहीं हुए थे। पर गुरुवार की मनहूस शाम ईद से ऐन पहले शुजात बुखारी जैसी मशहूर शख्सियत को खत्म कर दिया गया। 

मिलिटेंसी के शुरुआती दिनों में (सन् 1993) श्रीनगर स्थित बीबीसी के दफ्तर में लेटर-बम के विस्फोट के जरिये मुश्ताक अहमद नामक एक प्रतिभाशाली फोटो पत्रकार की जान ली गई थी। वरिष्ठ पत्रकार यूसुफ जमील बुरी तरह घायल हो गये थे। सन् 2003 में परवेज मोहम्मद सुल्तान नामक एक पत्रकार की श्रीनगर के इसी इलाके में हत्या हुई थी। उसके बाद संभवतः यह किसी पत्रकार की पहली हत्या है। कश्मीर में मिलिटेंसी और आतंक के सबसे बुरे दिनों में भी पत्रकारों या पर्यटकों पर (कुछेक अपवादों को छोड़कर) हमले नहीं होते थे।

पत्रकारों के लिए कश्मीर देश के अन्य़ राज्यों, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, त्रिपुरा, झारखंड या बिहार के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित दिखता था। पर इस बार शुजात जैसे एक बड़े पत्रकार और संपादक को मार डाला गया, उसकी आफिस के बिल्कुल पास! इन पंक्तियों के लिखे जाने तक किसी भी आतंकी ग्रुप या मिलिटेंट समूह ने हत्या की जिम्मेदारी नहीं ली है, जो खास लोगों की हत्या के बाद वे अमूमन घोषित करते रहे हैं! शासन की तरफ से भी हत्यारों के बारे में कोई ठोस बात सामने नहीं आई है। बीबीसी की एक खबर के मुताबिक कश्मीर जोन पुलिस ने संदिग्ध हत्यारों की कुछ तस्वीरें जारी की हैं। 

मैं जानता हूं, शुजात के बारे में अब बहुत सारी बातें कही जायेंगी। कुछ लोग राज्य की पीडीपी सरकार से उसकी कथित निकटता की भी बात कहेंगे। दरअसल, शुजात के भाई बशारत बुखारी राज्य की मौजूदा महबूबा मुफ्ती सरकार में संसदीय कार्यमंत्री हैं। लेकिन अपने भाई की राजनीतिक सम्बद्धता से शुजात की पत्रकारिता कत्तई प्रभावित नहीं थी। वह अनेक बार अपने अखबार में महबूबा सरकार की आलोचना भी छापते रहे। उनका अखबार किसी भी धारा या समूह से प्रभावित नहीं रहा। यही कारण अपेक्षाकृत नया होने के बावजूद उसे ‘ग्रेटर कश्मीर’ के बाद घाटी का सबसे प्रमुख अखबार माना जाने लगा था। बहुत कम समय में ‘राइजिंग कश्मीर’ सरहदी सूबे का एक स्थापित अखबार बन गया। 

शुजात का कश्मीर विमर्श मुझे हमेशा तथ्यपरक और वस्तुपरक लगा। अपने लेखों, संपादकीय अग्रलेखों और तकरीरों के जरिये उसने कश्मीर के अंदर और बाहर सरहदी सूबे की राजनीतिक समस्या पर संतुलित और वस्तुपरक विमर्श के लिए जगह बनाने की कोशिश की। इस मायने में शुजात ‘सत्ता-प्रतिष्ठान व सुरक्षा-विशेषज्ञ लॉबी’ और अलगाववादी लॉबी, दोनों से अलग अपनी स्वतंत्र और तथ्यपरक समझ से कश्मीर समस्य़ा को समझने और उसके राजनीतिक समाधान की कोशिश पर जोर देते थे।

पर ईद से ऐन पहले घाटी में सुसंगत सोच के एक बेहद शालीन और समझदार संपादक को बंदूकों के जरिये खामोश कर दिया गया। पर मुझे लगता है, किसी भी मुल्क, सूबा या इलाके में इस तरह की नृशंस हत्या के जरिये किसी संजीदा-सुसंगत आवाज को हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता। क्योंकि विचार कभी नहीं मरते! विश्वास है, शुजात का ‘राइजिंग कश्मीर’ उसकी आवाज बुलंद रखेगा! 

सलाम और श्रद्धांजलि दोस्त!

(लेखक उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और राज्यसभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रहे हैं।)








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