महाभियोग मामले में कोर्ट की स्वतंत्रता की दुहाई देने वाले केंद्र ने बदला सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मुद्दा , नई दिल्ली, बुधवार , 25-04-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। केंद्र सरकार न्यायपालिका में हस्तक्षेप की अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और सरकार के बीच कई बार तकरार हो चुकी है। जजों की नियुक्ति के मामले में कॉलेजियम की सिफारिश को लटकाने का मामला हो या फिर कर्नाटक हाईकोर्ट में एक जज के प्रमोशन को रोकने के लिए उसके चीफ जस्टिस को पत्र लिखने का मामला बार-बार दोनों पक्ष आमने-सामने आ जा रहे हैं। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश जे चेलमेश्वर दो-दो बार चीफ जस्टिस को पत्र लिख चुके हैं। एक दूसरे वरिष्ठ जज जोसेफ ने हाल ही में पत्र लिखा है। लेकिन इन पत्रों का सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। जिसका नतीजा है कि एक बार फिर उसने कोलेजियम की सिफारिश में एकतरफा तरीके से छेड़छाड़ की है। जिसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को एक बार फिर सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

सबसे पहले ‘दि प्रिंट’ के हवाले से आयी खबर में बताया गया है कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एडिशनल जज रामेंद्र जैन को कोलेजियम ने स्थाई करने की सिफारिश सरकार के पास भेजी थी। लेकिन बहुत दिनों तक कानून मंत्रालय इस फाइल पर बैठा रहा। और अब जबकि उनके तदर्थ नियुक्ति का टर्म पूरा होने जा रहा था तो बजाय उन्हें स्थायी करने के सरकार ने एकतरफा तरीके से उनके कार्यकाल को और छह महीने के लिए बढ़ा दिया।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस जे चेलमेश्वर और जस्टिस रंजन गोगोई की तीन सदस्यीय कोलेजियम ने सबसे पहले जस्टिस जैन की नियुक्ति की सिफारिश इसी मार्च महीने में भेजी थी। हालांकि केंद्र उस सिफारिश पर बैठ गया। जबकि कोलेजियम ने मामले को तुरंत निपटाने का निवेदन किया था क्योंकि जस्टिस जैन का कार्यकाल इसी 19 अप्रैल को पूरा हो रहा था।

उसके बाद उनके कार्यकाल के समाप्त होने के दो दिन पहले कोलेजियम ने एक बार फिर उनकी नियुक्ति की सिफारिश की। अपने प्रस्ताव में कोलेजियम ने इस बात को चिन्हित किया है कि उनके तबादले के मसले पर पहले ही 12 जुलाई 2017 को विचार हो चुका है जिसमें ये रिकार्ड में दर्ज है कि “पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में उन्हें बनाए रखने के पीछे विशिष्ट कारण है।”

सिफारिश के बाद भी केंद्र ने केवल उनके कार्यकाल को विस्तारित करने का फैसला लिया। ये अब तक चली आ रही परंपरा और कानून का उल्लंघन है। जिसके तहत कोलेजियम की सिफारिश को सरकार मानने के लिए बाध्य है। अगर कोलेजियम उसे दोबारा कहती है।

सरकार के सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप को लेकर बहुत सारे जजों ने खुलकर कड़ा एतराज जताया है। इसमें जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आयी है वो जजों की नियुक्तियों में दखलंदाजी करना कर रही है। सच ये है कि जस्टिस जे चेलमश्वर ने बाकायदा पत्र लिखकर इस मामले में फुल कोर्ट की बैठक बुलाने की मांग की थी। उनका कहना था कि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति में सरकार के दखल पर बातचीत होनी चाहिए।

इसके पीछे तात्कालिक और सबसे प्रमुख कारण जज पी कृष्ण भट्ट के खिलाफ जांच शुरू करना था जबकि सुप्रीम कोर्ट की कोलेजियम ने उनके प्रमोशन की सिफारिश की थी। उनके प्रमोशन को रोक कर केंद्र ने सीधे कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर उनके खिलाफ जांच बैठाने की जरूरत बतायी थी।

केंद्र के इस रवैये की आलोचना करते हुए जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा था कि अगर केंद्र को जज भट्ट को लेकर कोई आपत्ति थी तो हाईकोर्ट को पत्र लिखने की जगह उसे कोलेजियम के पास सिफारिश को लौटा देना चाहिए था। 








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