सुनिए सरकार! मुमताज कुछ कहना चाहती है

विरासत , , शुक्रवार , 13-07-2018


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जनचौक ब्यूरो

वो अजूबा है। दुनिया उसे ‘सेवन वंडर्स ऑफ वर्ल्ड’ कहती है। एक शहंशाह की मुहब्बत का अक्श है उसमें। मुहब्बत की एक ऐसी निशानी, जिसने पूरी दुनिया को हैरत में डाल रखा है। जिसके दीदार से दिल में मुहब्बत हिलोरे भरने लगती है। नजरें हटाने को जी नहीं करता।

वो ताजमहल अपनी किस्मत को रोता है। आगरा की जिस आबोहवा में शाहजहां और मुमताज की मुहब्बत की खुशबू फैली थी, वो जहर बन गई है। हवा में फैला ये जहर शाहजहां और मुमताज की इस आखिरी निशानी को बर्बाद कर रहा है। दिल्ली से आगरा और आस-पास के पूरे इलाके में फैले पार्टिकुलेट मैटर, कूड़ा जलने से उठने वाला धुआं और राख ताज की खूबसूरती को बदरंग कर रहा है।    

ताजमहल की दीवारों की चांदी सी सफेद रंगत पीली दर पीली होते-होते अब हरी हो रही है। ताजमहल को एक घुन धीरे-धीरे खा रहा है। और सरकारी अमला कुछ कर नहीं पा रहा। केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया का कोई कदम ताजमहल को बचाने की तरफ बढ़ता नहीं दिख रहा।

तभी देश की सबसे बड़ी अदालत को कहना पड़ता है – “ताजमहल का संरक्षण करो, या बंद करो या जमींदोज कर दो।“  

अचरजों से भरी बेमिसाल इमारत को जमींदोज करने, तोड़ देने, ढहा देने की बात कही गयी है। तोड़ना और बनाना इंसानी फितरत है। पर जिसे तोड़ देने की बात कही गयी, वो बहुत खास है। कुछ ऐसा, जो अपनी तरह का इकलौता है। सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसी सख्त बातें क्यों कहनी पड़ी?

जरूर कुछ संगीन बात होगी। सुप्रीम कोर्ट नाराज है, ताजमहल की दुर्दशा पर। जिस इमारत को पूरी दुनिया आंखे फाड़कर देखती है; उस इमारत के संरक्षण को लेकर न केंद्र सरकार को चिंता है, न उत्तर प्रदेश सरकार को और न ही आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया को। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच नाराजगी भरे लहजे में कहती है – “ये तो पूरी तरह उदासीनता है। आपको इसकी (ताजमहल) जरा भी परवाह नहीं है।“

सुप्रीम कोर्ट के इन शब्दों का मतलब समझने की कोशिश करिए। 

ताजमहल कोई आम इमारत नहीं है। हिंदुस्तान आने वाले हर सैलानी का एक सपना है। या कहें कि विदेशी सैलानी ताज देखने के बहाने हिंदुस्तान घूमता है। आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। सरकारी वेबसाइट tajmahal.gov.in बताती है कि इसे देखने हर साल 70 से 80 लाख टूरिस्ट आते हैं। जिनमें 6 से 7 लाख टूरिस्ट विदेशी होते हैं। आप अंदाजा लगाइए भारत में सालभर में आने वाले कुल एक करोड़ विदेशी सैलानियों में से करीब 6 से 7 फीसदी ताजमहल देखने जरुर आते हैं।  

सुप्रीम कोर्ट कहता है कि एफिल टावर को देखने आठ करोड़ लोग आते हैं। इतनी भीड़ आने के बावजूद फ्रांस की सरकार ने प्रोटेक्टन के साथ ही उसका कारगर प्रबंधन किया हुआ है। और हिंदुस्तान में ताजमहल को एक करोड़ लोग भी देखने नहीं आते, फिर भी सरकार इसका संरक्षण या मैनेजमेंट नहीं कर पा रही है। ताजमहल के संरक्षण को लेकर लापरवाह सरकार से सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ता है - “उत्तर प्रदेश सरकार को कोई परवाह नहीं है। अभी तक ताजमहल को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई एक्शन प्लान या विजन डॉक्यूमेंट पेश नहीं किया गया है।“

सुप्रीम कोर्ट तल्ख होकर केंद्र सरकार को निर्देश देता है कि दो हफ्ते के अंदर एफिडेविट देकर बताए, अब तक ताजमहल के संरक्षण के लिए क्या किया और भविष्य में क्या करने का प्लान है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां क्या बताती हैं?

सरकार एक इमारत को नहीं संभाल पा रही है। या कहें सरकारी अमले में एक इमारत को प्रोटेक्ट करने की क्षमता नहीं है। स्मार्ट सिटी की बात करने वाली सरकार की नीति में विरासत के संरक्षण के लिए कितनी जगह है, ये सुप्रीम कोर्ट के कमेंट बताते हैं।

या संभव है, लालकिले की तरह ताजमहल को किसी चायपत्ती वाले को किराए पर देने का विचार चल रहा हो।

ताजमहल है या तेजोमहालय, इस बहस में उलझने वाले सियासी सितारों से पूछना चाहिए कि वो सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से कितने सहमत हैं – “ताजमहल को जमींदोज कर दो।“

उस मीडिया से भी सवाल पूछिए। जो ताजमहल के गुंबदों में मंदिर की आकृति ढूंढता है। ताजमहल की बुनियाद, दीवारों और मुंडेरों पर उकेरे प्रतीकों में धर्म के चिन्ह तलाशने लगता है। क्या मीडिया के इन ‘विदूषकों’ को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों की खबर नहीं है?   

क्या कहती होगी शहंशाह शाहजहां की रुह? जब जब वो ताजमहल को देखता होगा, उसका दिल जोर से धड़कता होगा। सीने में तेज दर्द उभरता होगा; जैसे अब जान निकल जाएगी। मुझे लगता है, शाहजहां के लिए अब ये रोज की बात हो गयी होगी। आसमानी परी से संगमरमर को धीरे-धीरे पीला और फिर हरा होते देख किसकी न जान निकलेगी। सुप्रीम कोर्ट को शाहजहां के दर्द का अहसास है। पर सरकार और सिस्टम को नहीं है।

ताजमहल के बीचों-बीच उस कब्र में पड़ी मुमताज की आंखें नम होंगी। और दिल उस सरकार और सिस्टम को कोसता होगा, जो उसके पति की आखिरी निशानी को संभाल नहीं पा रहा है। दुख की बात है, दोनों (शाहजहां-मुमताज) के अहसास दूर-दूर मर रहे हैं।

(जितेंद्र भट्ट पेशे से पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली स्थित एक प्रतिष्ठित इलेक्ट्रानिक चैनल में काम करते हैं।)

 








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