तीन तलाक अध्यादेश: महिलाअों की मुक्ति नहीं वोट की चिंता

मुद्दा , , शुक्रवार , 21-09-2018


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अरविन्द जैन

नई दिल्ली। चार साल में तीस अध्यादेश। तीन तलाक़ विधेयक लोकसभा में पारित मगर राज्यसभा में अटका-लटका। संसद में विधेयक पास नहीं हो पाया तो, जारी कर दो अध्यादेश। क्या यह संसद कि अवमानना नहीं? संविधान की अवमानना नहीं? क्या ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते तलाशे जा सकते हैं? संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण,  कोयला खदान हो या तीन तलाक़. सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? क्या यह ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता नहीं? क्या यह अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार नहीं? क्या ऐसे ही होगा राष्ट्र का नव-निर्माण? अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं। 

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्तियों (जस्टिस जे.एस. खेहर, जस्टिस कूरियन जोसेफ, जस्टिस यू.यू. ललित, जस्टिस आर.एफ. नरीमन और जस्टिस अब्दुल नजीर) की संविधान-पीठ द्वारा 22 अगस्त, 2017 को मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘तीन तलाक’ को निरस्त करने के बाद, ‘तीन तलाक’ संबंधी ‘मुस्लिम महिला विवाह का अधिकार संरक्षण विधेयक, 2017’ शीतकालीन अधिवेशन में पेश करने के लिए सूचीबद्ध हुआ। हालांकि, फैसले के तत्काल बाद केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा था कि फैसले के क्रियान्वयन के लिए अलग से कानून बनाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उस समय केंद्र सरकार, कानून बनाए जाने के पक्ष में नहीं थी। बाद में तर्क यह दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर ‘तीन तलाक़’ की प्रथा जारी रही और कोई आमूल-चूल बदलाव दिखाई नहीं दे रहा था।

लोकसभा में सत्ताधारी दल का बहुमत होने के कारण विधेयक पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में आकर अटक-लटक गया। राज्य सभा में बहस के दौरान, सत्ताधारी दल के सहयोगी भी, विपक्ष के साथ खड़े नजर आए। लगता है कि सरकार इस विधेयक/अध्यादेश पर बहस के माध्यम से, 2019 के चुनावी बेड़े को पार ले जाना चाहती है। पक्ष- विपक्ष की नीति और नीयत, संदेह के घेरे में होना स्वाभाविक है। प्रतिपक्ष की नज़रों में “धार्मिक प्रतिशोध-प्रतिहिंसा से उपजा विधेयक, स्वागत योग्य नहीं”।

संविधान के अनुसार तो अध्यादेश ‘असाधारण परिस्थितियों’ में ही, जारी किये जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट तक कह चुकी है कि ‘अध्यादेशों’ के माध्यम से सत्ता बनाए-बचाए रखना, संवैधानिक धोखाधड़ी है’। राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो, संसद का संयुक्त सत्र बुलाया जा सकता था/है।हालांकि 1952 से आज तक केवल चार बार, संयुक्त सत्र के माध्यम से विधेयक पारित किए गए है। संयुक्त सत्र बुला कर विधेयक पारित कराना, भले ही संवैधानिक है लेकिन व्यावहारिक बिलकुल नहीं। जानते हो ना! संविधान के अनुच्छेद 123 (दो) के तहत छह महीने के भीतर ‘अध्यादेश’ के स्थान पर विधेयक पारित करवाना पड़ेगा और अनुच्छेद 85 के तहत छह महीने की अवधि संसद सत्र के अंतिम दिन से लेकर, अगले सत्र के पहले दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए। पहले की तरह अगर लोकसभा और राज्यसभा से मंजूरी नहीं मिली तो?

निश्चय ही संसद का कामकाज ठप होने की बढ़ती घटनायें, गहरी चिन्ता का विषय हैं। विपक्ष को विरोध का अधिकार है, पर संसद में हंगामा करके बहुमत को दबाया नहीं जा सकता। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष की जिम्मेदारी है कि मिल बैठ कर आम सहमती बनायें। विपक्षी हंगामे या हस्तक्षेप से बचने के लिए, अध्यादेश का रास्ता बेहद जोखिमभरा है। अपनी भूमिका और विवेक के माध्यम से विपक्ष का सहयोग जुटाते। क्या आये दिन अध्यादेश जारी करने का, कोई व्यावहारिक समाधान या विकल्प नहीं? तीन तलाक़ विधेयक पारित ना होने के बाद ऐसा क्या हो गया कि अध्यादेश को लाने की तत्काल जरूरत पड़ गई। ऐसे समय में अध्यादेश लाने से मुस्लिम महिलाओं को क्या लाभ? 

हम जानते हैं कि जिस दिन (26 जनवरी,1950) संविधान लागू हुआ, उसी दिन तीन और उसी साल 18 अध्यादेश जारी करने पड़े। नेहरु जी ‘जब तक रहे प्रधानमंत्री रहे’ और उन्होंने अपने कार्यकाल में 102 अध्यादेश जारी किये। इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में 99, मोरार जी देसाई ने 21, चरण सिंह ने 7, राजीव गांधी ने 37, वी.पी.सिंह ने 10, गुजराल ने 23, वाजपेयी ने 58, नरसिम्हा राव ने 108 और मनमोहन सिंह ने (2009 तक) 40 अध्यादेश जारी करे-करवाए।सत्ताधारी दलों के सभी नेता संविधान को ताक पर रख, अनुच्छेद 123 का ‘राजनीतिक दुरूपयोग’ करते रहे हैं। क्या ‘अध्यादेश राज’ कभी खत्म नहीं होगा? 

राष्ट्रपति भवन कई बार ‘संकेत’ दे चुका है कि अगली बार  किसी भी अध्यादेश पर, महामहिम अपने संवैधानिक अधिकारों, राष्ट्रीय हितों, राजनीतिक दायित्वों और संसदीय परम्पराओं का हवाला देकर गंभीर सवाल खड़े कर सकते हैं। एक बार किसी भी विधेयक,अध्यादेश या मंत्रीमंडल की सलाह को मानने से इनकार भी कर सकते हैं या पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो, यह मौजूदा सरकार के लिए सचमुच मुश्किल की घड़ी होगी। आखिर राष्ट्रपति कब तक ‘रबर की मोहर’ बने रहेंगे? 

बताने की जरुरत नहीं कि आर.सी. कूपर बनाम भारतीय संघ (1970) में संविधान के अनुच्छेद 123 की वैधता को चुनौती दी गई तो, सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से ही मना कर दिया और ‘तत्काल आवश्यकता’ के सवाल पर निर्णय लेने के काम राजनेताओं पर छोड़ दिया। अध्यादेशों को लेकर राज्यपालों की भूमिका पर अनेक बार गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।

इस संदर्भ में डॉ. डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (ए.आई.आर. 1987 सुप्रीम कोर्ट 579) में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक दस्तावेज है, जिसमें कहा गया है कि बार-बार ‘अध्यादेश’ जारी करके कानून बनाना अनुचित और गैर संवैधानिक है। अध्यादेश का अधिकार असामान्य स्थिति में ही अपनाना चाहिए और राजनीतिक उदेश्य से इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जा सकती। कार्यपालिका ऐसे अध्यादेश जारी करके, विधायिका का अपहरण नहीं कर सकती। 

उल्लेखनीय है कि कोयले सम्बंधित अध्यादेश 2014 को चुनौती देते हुए, जिंदल पावर एंड स्टील, बीएलए पावर और सोवा इस्पात लिमिटेड ने दिल्ली, मध्य प्रदेश और कोलकाता उच्च न्यायालय में पांच अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई। इन सभी याचिकाओं में कोयला अध्यादेश की संवैधानिक वैधता पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालयों के अंतरिम आदेश पर रोक लगाने और सभी याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में ट्रांसफर करने की गुहार लगाईं।कोयला मंत्रालय की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा  कि सभी लंबित याचिकाओं में कानूनी मुद्दे एक जैसे ही हैं। इसका विरोध करते हुए वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि कंपनी के शेयर होल्डिंग पैटर्न में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। मगर मुख्य न्यायाधीश एच. एल. दत्तू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने (3 फरवरी, 2015) हस्तक्षेप करने से साफ़ इनकार कर दिया। अध्यादेशों के संदर्भ में कानूनी लड़ाई का आरम्भ हो चुका है, अंत ना जाने कब और किस रूप में होगा। 

लगता है कि विपक्ष हाशिए से बाहर हो गया है और देश के बुद्धिजीवी चुप हैं या नज़रबंद।सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक मुद्दों (विशेषकर महिलाओं और दलित) पर, कहीं कोई हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा। मिडिया-टेलीविज़न सनसनीखेज ख़बरों, बेतुकी बहसों और ‘व्यक्ति विशेष’ की छवि संवारने-सुधारने में व्यस्त है। मगर मज़दूरों में असंतोष और महिलाओं, दलितों, आदिवासीयों और किसानों में जनाक्रोश बढ़ रहा है। खेत-खलिहान सुलग रहे हैं।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी, देश के तमाम संसाधनों पर कब्ज़ा करने में लगी है। आर्थिक सुधार और विकास के सारे दावे, अर्थहीन सिद्ध हो रहे हैं। काला धन अभी भी देशी-विदेशी बैंकों या जमीनों  में गड़ा है। सपनों के घर, हवा में झूल रहे हैं। ना जाने कितने ‘बेघर’ ठिठुरती सर्दियों में मारे गए। चुनावी राजनीति लगातार मंहगी होती जा रही है। न्यायपालिका मुकदमों के बोझ तले दबी है और राष्ट्रीय न्यायधीश नियुक्ती विधेयक असंवैधानिक ठहराया जा चुका है। जातीय, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का संकट, निरंतर गहरा रहा है। ऐसे में सरकार के सामने अनंत गंभीर चुनौतियां और चेतावनियां हैं।निसंदेह ‘अध्यादेशों’ के सहारे, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाना-बचाना मुश्किल है।राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना, समय और समाज की अपेक्षाएं पूरी कर पाना असंभव है। फिर  मौजूदा अध्यादेश से ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ कैसे हो पायेगी या हो जाएगी! 

                           (अरविन्द जैन सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं।)








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