यूपी की राजनीति में अप्रासंगिक होते पासी : सिमट गया राजनैतिक प्रभाव

विमर्श , , बृहस्पतिवार , 25-04-2019


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अजय कुमार

राजधानी लखनऊ की विधानसभा मोहनलालगंज में रायपुर गांव में पासी बिरादरी के 60 वर्षीय राजाराम लोकसभा चुनाव में मोदी के समर्थन में वोट देने की बात कह रहे हैं, दिलचस्प बात यह है कि राजाराम अपने ही क्षेत्र के सांसद व मौजूदा भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी कौशल किशोर को नहीं जानते हैं।

मोदी को वोट देने का कारण पूछे जाने पर वह 12 हजार की लागत से बने स्वच्छ भारत मिशन के शौचालय व उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस कनेक्शन से प्रभावित होना बताते हैं। चुनावी राजनीति में राजाराम की ही तरह ही अन्य पासी जाति के मतदाता भी इन्हीं परिस्थितियों से प्रभावित हैं। शुरू की बातों पर गौर करेंगे तो आप समझेंगे कि मोहनलाल गंज लोकसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और राजाराम अपनी ही जाति के दिग्गज पासी नेता व स्थानीय सांसद कौशल किशोर के बारे में पूछे जाने पर हैरानी जताते हैं। इससे दो मोटी-मोटी बातें निकल कर आती हैं कि पासी बिरादरी के नेता सीमित दायरे में पहचान बना पाते हैं। वहीं दूसरी ओर पासी बिरादरी का कोई नेतृत्व आम पासी बिरादरी को संगठनात्मक व विचाराधात्मक रूप से इकट्ठा नहीं कर पाया है। जिससे यूपी में बड़ी तादाद में मौजूद पासी बिरादरी राजनैतिक तौर पर अप्रासांगिक होती जा रही है।

आंकड़ों पर गौर करें तो दलितों में चमार, जाटव, धुसिया वोटरों के बाद पासी बिरादरी दूसरी बड़ी संख्या वाली जाति है जिनकी दलितों में 18 प्रतिशत आबादी यानी जाति है । यूपी की 50 विधानसभा की सीटों पर पासी बिरादरी के लोग प्रबल प्रभाव रखते हैं वहीं 10 लोक सभाओं में इनकी अच्छी खासी तादाद मौजूद है। 2012 की यूपी विधानसभा में पासी बिरादरी के 30 विधायक चुनकर आये थे, 2017 के विधानसभा चुनाव में जिनकी संख्या घटकर 25 पर आ गयी है। जो कि इस बिरादरी की गिरती राजनैतिक हैसियत की तस्वीर बयां कर रही है।

आखिर क्या कारण है कि यूपी के एक बड़े हिस्से की आबादी वाली जाति राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक व आर्थिक रूप से पीछे होती चली जा रही है। जानकारों के मुताबिक इस बिरादरी में स्थायी नेतृत्व व विचाराधारा का अभाव है जिससे इनके वोट सपा,बसपा, भाजपा, कांग्रेस सरीखी पार्टियों में बंटते रहते हैं जिससे इनको राजनैतिक दल गम्भीरता से नहीं लेते हैं।

मोहनलालगंज के गोविंदपुर गांव के दलित सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार पासी कहते हैं कि यह बदलाव अचानक नहीं आया है वो बताते हैं कि एक समय पासियों की राजनीतिक ताकत को पार्टियां नजरअंदाज नहीं करती थीं। वह बताते हैं कि 2003 के बाद बनी मुलायम सिंह की सरकार में लखनऊ जनपद से ही आरके चौधरी व कौशल किशोर को प्रदेश सरकार में मंत्री बनाया गया वहीं अयोध्या के अवधेश प्रसाद भी सरकार में मंत्री रहे हैं। परंतु यूपी की योगी कैबिनेट में पासी बिरादरी का प्रतिनिधित्व शून्य कर दिया गया है। इसके पीछे का कारण राजकुमार पासी बताते हुए कहते हैं कि राजनीति में विचारधारा व निष्ठा का महत्व होता है कुछ समय पहले उभरे पासी बिरादरी के नेता विधायक,सांसद बनने के लिए एक से दूसरे दल में जाने लगे जिससे पासियों में उनकी राजनैतिक विश्वसनीयता खतरे में पड़ गयी है। वहीं आपसी एकजुटता न होने के कारण राजनैतिक दलों ने इनको गम्भीरता से लेना बंद कर दिया है।

हालांकि पासी बिरादरी के ही दूसरे युवा कार्यकर्ता व वकील अशोक रावत इससे इत्तफाक नहीं रखते हैं। रावत का कहना है कि पिछले 20 वर्षों से पासी विरादरी विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा थोपे गए पासी नेतृत्व के पीछे लगा रहा। जिससे उसको निराशा ही हाथ लगी। अशोक रावत बताते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव से पूर्व सपा, बसपा से नाराज़ रहे पासी बिरादरी की आधी से अधिक आबादी ने भाजपा को वोट दिया लेकिन भाजपा ने पासी नेतृत्व के नाम पर पासी बिरादरी की ही सांसद कृष्णा राज को थोप दिया जिनका समाज से कोई मतलब नहीं रहता है।

पासी बिरादरी के नेतृत्व के बारे में अगर हम बात करें तो आरके चौधरी व कौशल किशोर ही ज्यादा व्यापक स्तर पर पहचान बना पाये हैं। लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों में हाशिए पर हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में अभी तक सपा, बसपा,कांग्रेस की यूपी में घोषित स्टार प्रचारकों की सूची में पासी जाति का कोई नेता स्थान नहीं बना पाया है। जबकि यूपी के लखनऊ, फैजाबाद, इलाहाबाद मंडल के हर जिले में पासी जाति के मतदाताओं की अच्छी संख्या है।

यूपी में लोकसभा की आरक्षित सीटों में मोहनलालगंज, बाराबंकी, हरदोई, मिश्रिख, बहराइच, बांसगांव, लालगंज, कौशाम्बी, मछलीशहर में आमतौर पर पासी सांसद ही चुने जाते रहे हैं लेकिन मौजूदा लोकसभा चुनाव में प्रमुख राजनैतिक दलों ने मोहनलालगंज को छोड़कर लगभग सीटों पर गैर पासी दलित जातियों पर दांव लगाया है। पासी बिरादरी इतनी अप्रासांगिक कैसे हो गयी इस पर हम बात करें तो पाते हैं कि कांशीराम के भागीदारी के फार्मूले से पासी बिरादरी के लोग ज्यादा प्रभावित हुए व राजनैतिक विचारधारा के तहत एकजुट हुए लेकिन बीएसपी नेतृत्व द्वारा पासी नेताओं की उपेक्षा से यह समाज बीएसपी से दूर होता जा रहा है।

2017 के विधानसभा चुनाव में पासी बिरादरी का ज्यादा समर्थन भाजपा को मिला पर उसका कारण भाजपा में मौजूद किसी पासी नेता की अपील या राजनैतिक विचारधारा के तहत नहीं था वह समर्थन पासी बिरादरी के हर चुनाव में एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने के क्रम में था। फिर भी बसपा व सपा से खिन्न बड़े वर्ग ने पासी मतदाताओं के भाजपा के समर्थन में खड़े होने में बड़ी भूमिका अदा की। अब जबकि पासी भाजपा में उपेक्षित हो गए हैं तो बसपा,सपा, कांग्रेस इनको भाव देने के मूड में नहीं दिख रही हैं। आशंका तो यही है कि लोकसभा चुनाव 2019 में पासियों की राजनैतिक ताकत और क्षीण हो जाएगी।

मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को पासी बिरादरी का वाजिब प्रतिनिधित्व व महत्व नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए समय समय पर पासी बिरादरी के नेताओं द्वारा अलग अलग राजनैतिक , सामाजिक प्लेटफार्म तैयार किए गए जो कि सीमित दायरे में सिमट कर रह गए। अगर हम कुछ प्रसांगिक रहे पासी बिरादरी के मंचों की बात करें तो यहां पर आरके चौधरी द्वारा बसपा से निकाले जाने के बाद 2002 में राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी की हम पहले बात करेंगे।

2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सहयोग से आरके चौधरी मोहनलालगंज से विधायक बनने में कामयाब रहे जो कि बसपा द्वारा निकाले हुए किसी नेता की बड़ी सफलता रही। इस बीच में आरके चौधरी अपनी पार्टी का आधार बढ़ाने की कोशिश में लगे रहे। 2007 के विधानसभा चुनाव आरके चौधरी अपनी पार्टी से एक बार फिर चुनाव जीतने में कामयाब रहे लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी द्वारा खड़े किए गए करीब 200 प्रत्याशियों में किसी को सफलता नहीं मिली । 2009 के लोकसभा चुनाव में आरके चौधरी ने कांग्रेस पार्टी के समर्थन से लोकसभा चुनाव में दावेदारी की लेकिन चुनाव हार गए ।

2012 के यूपी विधानसभा चुनाव विधानसभा मोहनलालगंज, सरोजनीनगर, बछरावां से आरके चौधरी की पार्टी के प्रत्याशी मुख्य मुकाबले में रहकर हार गए जिसमें मोहनलालगंज से आरके चौधरी को भी हार का सामना करना पड़ा । हालांकि इस चुनाव में भले ही आरके चौधरी समेत राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी का कोई विधायक नहीं जीत पाया परन्तु लखनऊ व आस-पास के जनपदों में आरके चौधरी की पार्टी प्रभाव बनाने में कामयाब रही । आरके चौधरी चुनाव हारने के बाद संघर्ष को अख्तियार करने के बजाय 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए 1 साल बाद ही बीएसपी में शामिल हो गए । हालांकि मोहनलालगंज लोकसभा चुनाव में वह 2014 में बतौर बीएसपी प्रत्याशी एक और पासी विरादरी के प्रभावशाली नेता कौशल किशोर (भाजपा) से चुनाव हार गए ।

आरके चौधरी चुनाव हारने के बाद महज 1 वर्ष ही बीएसपी में रह सके। 2017 के विधानसभा चुनाव के पूर्व वह बीएसपी से बाहर आ गए। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के समर्थन से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी वह मोहनलालगंज से चुनाव लड़े लेकिन स्थानीय भाजपा सांसद कौशल किशोर व भाजपा कार्यकर्ताओं के द्वारा किए गए आंतरिक विरोध से वह चुनाव हार गए। विधानसभा चुनाव के बाद आरके चौधरी सपा में शामिल हो गए हैं लेकिन सपा में आरके चौधरी व उनकी बिरादरी को कोई खास महत्व नहीं दिया जा रहा है। आज कल अभी वह हाल ही में सपा को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुये हैं और मोहनलालगंज लोकसभा से कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। 

राजधानी लखनऊ के ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता रहे कौशल किशोर ने 2002 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई से निकलकर राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट पार्टी बनायी जिसका प्रमुख आधार पासी बिरादरी के मतदाता रहे । 2002 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी से ही कौशल लखनऊ की मलीहाबाद परम्परागत सीट से चुनाव लड़े और बड़े अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे। बाद में बनी सपा सरकार में कौशल को राज्य मंत्री बनाया गया।

कौशल के समर्थकों के मुताबिक दलित हितों के मुद्दों पर कौशल की सरकार से ठन गयी और 8 माह के कार्यकाल के बाद कौशल ने प्रदेश सरकार से इस्तीफा दे दिया। 2007 के विधानसभा चुनाव में कौशल किशोर चुनाव हार गए। जिसके बाद पासियों में राजनैतिक चेतना विकसित करने के लिए मोहनलालगंज के तत्कालीन सपा सांसद जयप्रकाश रावत व कौशल किशोर ने पारख महासंघ का गठन किया। जिसका उद्देश्य मुख्यधारा से इतर पासियों में राजनैतिक नेतृत्व पैदा करना था। पारख महासंघ के बारे में दो सिध्दांत प्रचारित हुए पहला कि पारख मतलब पासी, राजभर, खटिक बिरादरी का महासंघ है वहीं दूसरा यह संत कबीर के पारख शब्द से प्रभावित है।

2012 के विधानसभा चुनाव में पारख महासंघ के समर्थन से 9 विधानसभा के प्रत्याशी चुनाव लड़े जिसमें कौशल किशोर महज 1200 मतों से चुनाव हार गए। वहीं अन्य प्रत्याशी भी कोई खास प्रभाव नहीं डाल पाये। लगातार हो रही चुनावी हार से कौशल ने मुख्यधारा के राजनीतिक दलों में जाने का फैसला किया। लोकसभा चुनाव 2014 के पूर्व वह भाजपा में शामिल हो गए और मोहनलालगंज लोकसभा से बतौर भाजपा प्रत्याशी वह सांसद चुने गए। हालांकि पूर्व की भांति व अलग मिज़ाज रखने वाले कौशल को भी अपेक्षाकृत भाजपा में महत्व नहीं मिल पाया है।

राजधानी लखनऊ में ही गृहमंत्री, उपमुख्यमंत्री, कई कबीना मंत्री होने के कारण कौशल किशोर को आशातीत पहचान नहीं मिल पाती है। वहीं सांसद बनने के बाद जनता में यह संदेश गया कि कौशल को ब्यूरोक्रेसी में कमजोर आंका जाता है। जून 2017 लखनऊ भाजपा के जिलाध्यक्ष रामनिवास यादव ने भाजपा सांसद को पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। मीडिया नोटिस लीक होने के बाद भाजपा में कौशल के वजन के बारे में बातें होने लगीं। गरीब, कमजोर समाज को न्याय दिलाने की बात करने वाले पासी समाज के नेता कौशल किशोर के ही लोकसभा क्षेत्र में दलितों पर अपराध बढ़ते जा रहे हैं।

आजकल राजनीतिक दल पासियों को कितना महत्व दे रहे हैं इस बात को आगे बढ़ाते हुये कुछ इस तरह से कहा जा सकता है कि उत्तर-प्रदेश में भाजपा ने काम न करने वाले सांसदों के टिकट काटे हैं उनमें सबसे अधिक दलित समुदाय के मौजूदा सांसद ही भाजपा को मिले जो नॉन परर्फ़ोर्मर हैं, और उनमें भी खासकर पासियों की संख्या सबसे अधिक है। जैसे शाहजहांपुर से कृष्णा राज, बाराबंकी से प्रियंका रावत, हरदोई से अंशुल वर्मा, बहराइच से सावित्रीबाई फुले, (सभी पासी), हाथरस से कमलेश दिवाकर, मछली शहर से राम चरित्र निषाद, इटावा से अशोक दोहरे, सोनभद्र से छोटेलाल खरवार। दिल्ली में उदित राज और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री विजय सांपला का भी टिकट भारतीय जनता पार्टी ने काट दिया है। 

इसके साथ ही यहां एक बात गौर करने वाली है कि जहां पासी बिरादरी (जाति) में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति के तहत अपनी पैठ बनाई और बढ़ाई है, वहीं उसी तरह से समाजवादी पार्टी में भी पासी जाति के नेता और उनकी भागीदारी किसी न किसी रूप में हमेशा ही मौजूद रही है। जिसमें पासी जाति के सांसद, विधायक, मंत्री और संगठन के स्तर पर किसी न किसी रूप में हमेशा ही मौजूद रहे हैं समाजवादी पार्टी में मौजूदा पासी नेताओं में प्रमुख रूप से अवधेश प्रसाद, शैलेंद्र पासी, सुधीर रावत, जय प्रकाश रावत, अशोक रावत, रीना चौधरी, सुशीला सरोज, सर्वेश अंबेडकर आदि शामिल हैं।

लेकिन इसके विपरीत पासियों की नाराजगी बहुजन समाज पार्टी से इसलिए रही कि जब कांशीराम की बसपा संगठन पर पकड़ कम हो गयी और सारी शक्तियां मायावती के हाथ में चली गयीं उसके बाद मायावती ने एक-एक करके सभी पुराने नेतृत्व को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उसी में पासियों के दिग्गज नेता आरके चौधरी भी बसपा से बाहर कर दिये गए। पुराने कार्यकर्ता कहते हैं कि इस तरह से मायावती ने जानबूझकर पासियों को राज्य से लेकर जिले के संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद आज तक बहुजन समाज पार्टी में संगठन के स्तर पर कोई पासी नेतृत्व उभर कर नहीं आ पाया। 

(युवा समाजशास्त्री डॉक्टर अजय कुमार भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में फेलो हैं। वह दलित समाजशास्त्र और इतिहास के आपसी संबंध पर शोध कर रहे हैं।) 








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