इस यज्ञ में हमारी नागरिकता और उसकी पहचान भी हो रही है स्वाहा

ख़बरों के बीच , , बृहस्पतिवार , 17-05-2018


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महेंद्र मिश्र

बनारस का गर्डर हादसा, हादसा नहीं बल्कि होशोहवास में रचा गया नरसंहार है। लोग पूछ रहे हैं आखिर पीएम मोदी संवेदना जताने के लिए अपने क्षेत्र में क्यों नहीं गए। सवाल पूछने वालों को इस बात को समझना चाहिए कि वो उससे भी बड़ी घटना को अंजाम देने में लगे हुए थे। जिसमें संविधान की हत्या करनी थी और लोकतंत्र को खुली मंडी में नीलाम करना था। देश के संविधान और लोकतंत्र की हत्या का जब मोदी जी अपने कार्यकर्ताओं के साथ जश्न मना रहे थे तब बनारस की घटना स्वाभाविक तौर पर उनके लिए छोटी हो गयी थी। और आप सब भी एक ऐसे व्यक्ति से संवेदनशीलता की उम्मीद कर रहे हैं जिसकी सरपरस्ती में गुजरात जैसा नरसंहार हुआ हो। 

देश की सर्वोच्च कुर्सी पर तो उन्हें पहुंचाया ही इसीलिए गया है कि जरूरत पड़ने पर उससे भी बड़ी घटना को अंजाम दे सकें। संवेदनशीलता और जवाबदेही की बात आने पर पीड़ितों की कुत्ते और बिल्लियों से भी तुलना करने से न हिचकें। उन घटनाओं के मुकाबले ये हादसे तो कुछ भी नहीं है। ऐसा नहीं हो सकता है कि एक शख्स कहीं संवेदनहीन हो और दूसरी जगह बिल्कुल संवेदनशील हो जाए। क्योंकि इंसान मशीन नहीं होता है। एक शख्स जो अपनी मां, पत्नी और परिवार के प्रति संवेदनशील नहीं हो सकता है वो अचानक गैरों के प्रति संवेदनशील हो जाएगा। इस तरह की बेमानियों के साथ जीना और उसकी अपेक्षा करना अपने में ही किसी एक बड़ी बेईमानी से कम नहीं है।

हां पीएम यात्रा जरूर करते अगर उसकी कोई राजनीतिक जरूरत होती। लेकिन अभी न तो हाल में कहीं यूपी में कोई चुनाव है और न ही उसकी कोई जरूरत है। और पीएम को भी इस बात का पूरा भरोसा है कि उनका दुमछल्ला मीडिया और संगठित भक्त मिलकर मामले को संभाल लेंगे।

वैसे भी पीएम और उनकी पार्टी सारी चीजों को देश के संविधान और व्यवस्था के हिसाब से चलाने की जगह अब ग्रहों और नक्षत्रों के सहारे चलाने में ज्यादा रुचि लेते हैं। बंगाल चुनाव के दौरान पुल हादसे को उसी रूप में उन्होंने पेश किया था। एक दैवीय संकेत! यहां भी भांड़ मीडिया ने उसी काम को शुरू कर दिया है। जिसमें किसी प्रशासन और उसकी व्यवस्था में दोष तलाशने से ज्यादा ग्रहों और नक्षत्रों की चाल को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। एक स्थानीय पेपर ने तो बाकायदा ज्योतिषियों से पूछकर इसकी खबर बनायी। और बनारस में इसी तर्ज पर कुछ लोगों ने सोचना भी शुरू कर दिया है।

हादसे के बाद बनारस की एक महिला मित्र से बात होने पर उन्होंने बताया कि वो खुद एक परिवार में गयी थीं जहां इसी तरह से लोग आपस में बात कर रहे थे। गणेश की प्लास्टिक सर्जरी कराने वाले और विमानों की खोज भारत में करने का दावा करने वालों ने समाज को जाहिलियत के इस स्तर पर पहुंचा दिया है कि अब व्यवस्था संबंधी कोई भी गड़बड़ी होती है तो उसका दोष उनके सिर पर नहीं मढ़ा जाएगा। मोदी और उनके तंत्र को कम से कम इस कामयाबी का श्रेय तो जरूर मिलना चाहिए।

बनारस का हादसा एक आपराधिक लापरवाही है। और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। सामान्य निर्माण के कामों में एकबारगी सोचा जा सकता है। लेकिन जब पुल पर गर्डर लगाया जा रहा हो तो उसके नीचे से ट्रैफिक संचालन की कैसे इजाजत दी जा सकती है? यहां तक कि निजी घरों के निर्माण में आवश्यक नियमों का पालन करना जरूरी हो गया है। यहां तो बाकायदा एक सरकारी काम सार्वजनिक जगह पर चल रहा था जिसके नियम सूत्रबद्ध हैं। और उस मोर्चे पर अगर कोई नाकामी हुई है तो उसे लापरवाही का दर्जा देकर पूरे मामले को हल्का करना होगा। ये शुद्ध रूप से हत्या की श्रेणी में आता है। क्योंकि सब कुछ पूरे होशोहवास में और जानबूझ कर किया गया है।

योगी जी मुआवजे से उन परिवारों की खुशियां नहीं लौटायी जा सकतीं। जिन्होंने अपनों को खोया है। आप उनके दर्द को चंद सिक्कों से नहीं कम कर सकते। अगर सचमुच आप में उनके प्रति थोड़ी भी संवेदनशीलता और जवाबदेही है और आने वाले दिनों में कोई दूसरा इस तरह का हादसा न हो उसके लिए ये घटना एक नजीर बननी चाहिए। जिसके तहत इस पूरे मामले में शामिल इंजीनियर, ठेकेदार और प्रशासनिक महकमे के हर सदस्य के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। बनारस हादसा एक ऐसा उदाहरण बनना चाहिए कि जिससे आइंदा इस तरह के निर्माण में प्रशासन किसी तरह की लापरवाही के बारे में सोचना ही बंद कर दे।

लेकिन शायद ये सलाह गलत शख्स को दी जा रही है या फिर उससे इस तरह की उम्मीद करना ही बेमानी है। जो पार्टी पूरे देश में हत्या और मौतों को रोकने की जगह मौका पड़ने पर आग में घी डाल कर उसे और भड़काने का काम करती हो। उसको इस तरह की किसी घटना को रोकने की सलाह देना अपनी जगहसाई करना है। उसके लिए बनारस हादसा भी उसी की एक सहयोगी कड़ी भर है।

दरअसल मौतों और हत्याओं से पूरे समाज के पारे को गरम रखने में मदद मिलती है। और ऐसा होने पर उसका अपने मनमुताबिक संचालन आसान हो जाता है। केंद्र में आयी बीजेपी पिछले चार सालों में इस काम को बखूबी कर रही है। हिंसा, मार-काट और उत्पीड़न इस सरकार का पर्याय बन गया है। अनायास नहीं मुद्दे न भी हों तो आरएसएस के हाइड्रा संगठनों के जरिये उन्हें ढूंढ कर खड़ा कर दिया जाता है।

एक चीज लोगों को समझनी होगी जो शायद अभी उस रूप में देखी नहीं जा रही है। परपीड़न से समाज में सुख पाने का जो फार्मूला विकसित किया गया है वो न केवल हर उस नागरिक के खिलाफ जाता है जो एक स्वस्थ, सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे वाले समाज का पक्षधर है बल्कि इससे पूरे समाज के एक जातीय-कबीलाई समाज में तब्दील हो जाने का खतरा है।   

एक दौर में ऐसा हो ही सकता है कि पूरे हिंदू समाज को मुसलमानों के उत्पीड़न पर आनंद आ रहा हो। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हिंदू खुद एक ऐसे कबीलाई तबके में तब्दील होता जा रहा है जो कई श्रेणियों में बंटा है। श्रृंखलाबद्ध ये श्रेणियां भी एक दूसरे का उसी तरह से उत्पीड़न में सुख पाती हैं जैसा कि मुसलमानों को उत्पीड़ित कर हासिल करने की कोशिश की जा रही है। बल्कि एक दूसरे नजरिये से कहा जाये तो दलितों और सवर्णों के बीच का अंतरविरोध मुसलमानों के अंतरविरोध से भी कहीं ज्यादा है।

और आखिर में हम एक ऐसी जमात में तब्दील कर दिए जा रहे हैं जिसमें पूरा समाज एक दूसरे के उत्पीड़न और सामने वाले को नीचा दिखाने में ही संतुष्टि का अनुभव कर रहा है। यही बात शासकों और उसकी जमात के लिए सबसे मुफीद साबित हो रही है। क्योंकि यहीं आकर उसकी सभी जवाबदेहियां खत्म हो जाती हैं।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में नागरिकता का जो लोप हो रहा है उसकी कोई भरपाई नहीं है। पिछले सत्तर सालों में राज्य और उसकी संस्थाओं के जरिये हमने लोकतंत्र का जो ढांचा खड़ा किया है वो अब चरमरा कर धराशायी होने के कगार पर है। लोकतंत्र की आहुति देने के शासकों के इस काम में हम उनका खुला सहयोग दे रहे हैं। लेकिन हम नहीं जानते हैं कि इस यज्ञ में हमारी नागरिकता और उसकी पहचान भी स्वाहा हो जा रही है।




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Rahul :: - 05-17-2018
Is desh ko mansikta badlne ka kaam to pichle kai varasho se chal raha hai. Aaj desh ko Jo takte dhoke or kapat se kabja kar chla rahi hai bo takte ka uddesh hi is savidhan ko nahi manna hai. Bo to angrejo ke takat ke karan 1947 me ye takte apna sir nahi utha paayi dhere dhere dharmikta ka afeem chta chta kar in takato ne takniki or media ka durpog karke aaj satta haasil ki hai. Bharat desh ka PM jab munch se khulkar dhamki de deta hai to kha raha koi kanoon, rajyapal bjp ke trained agent ki trh kaam kar rahe hai bo Sara isliye hai ki bjp ne aaj apne RSS ke mansikta ko desh ke savedhnik pado par baitha diya hai. Aandiben rajyapal hone ke bad party ke karkartao ko party president ki trh margdarshan de rahi hai or nahi syllebus ki Trining lene gyi hai taaki aane bal samay me Karnataka ki trh performance de paaye. Kul milakar bjp is desh ke kanoon or savidhan ko kabhi nahi manti yeh nahi loktantra hai jisko pure vishav ne saraha or Sara world loktantraik multi ko promote karta hai lekin RSS ma bachhaa bjp kabhi bhi savidhan mulyo ko nahi manti. Ye log is desh ko Taliban or serial bna kar hi manege,, ab to united nation me desh ke loktantra ko save karne ki maang ki jaani chahiye. Yadi ESA nahi hota to is desh me varg sangrash ki stathi banegi or bjp bhi yahi chahti hai ki bo ESE halat paida karke maarkaat kar bhay ka mahool bna sake or uske samne khade hone Bali shaktiyo ka daman kar Sake.. Isliye ab pure desh ke loktantra me bisbas rakhne balo ko aandolan ke sewa koi rasta sesh nahi reh jata hai. Ek bat or vese loktantra ko save karne ki jimmewari rajnetik dalo ki hai jisme bo fail sabit Huey hai viseshkar CONGRESS jisko bjp ko harane ke liye rajnetik dalo ki lambandhi nahi ki.