न्याय की किसी कसौटी पर खरा नहीं उतरता सीबीआई चीफ को हटाए जाने का फैसला

पड़ताल , , शुक्रवार , 11-01-2019


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संजय कुमार सिंह

सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा पर आरोप थे, सीवीसी ने उनकी जांच की और आधी रात की कार्रवाई में प्रधानमंत्री ने उन्हें पद से हटा दिया। प्रधानमंत्री को यह अधिकार नहीं है इसलिए मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बहाल कर दिया। इस शर्त के साथ कि सीबीआई निदेशक नियुक्त करने वाली समिति उन्हें हटाने के बारे में निर्णय करे। और तीन सदस्यों की इस समिति में एक सदस्य प्रधानमंत्री भी हैं। इस समिति ने उन्हें हटा दिया जबकि आरोप है कि आलोक वर्मा रफाल मामले में प्रधानमंत्री के खिलाफ जांच करने वाले थे इसलिए उन्हें आधी रात की कार्रवाई में हटाया गया। अब जैसा कि नवोदय टाइम्स ने शीर्षक लगाया है, “स्पीडी ट्रायल में सीबीआई प्रमुख नपे”। क्या इसलिए कि बीस दिन में रिटायर होने से पहले वे प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी ही जांच कर सकते थे। वरना देश में स्पीडी ट्रायल की मांग तो बहुत पुरानी है। प्रधानमंत्री के खिलाफ आरोपों का क्या हुआ?

यहां अलग-अलग अखबारों में सीबीआई निदेशक को हटाने की कार्रवाई पर आई प्रतिक्रियाओं को पढ़िए और जानिए कि आपके अखबार ने क्या बताया और क्या छुपाया। नवोदय टाइम्स ने इस पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया छापी है, “श्री मोदी के दिमाग में अब डर समा गया है। वह सो नहीं सकते। उन्होंने वायुसेना से 30,000 करोड़ रुपए चुराकर अनिल अंबानी को दे दिए हैं। सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को लगातार दो बार हटाया जाना स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वह अपने ही झूठ में फंस गए हैं। सत्यमेव जयते।” जहां तक आलोक वर्मा पर आरोपों की बात है, सीवीसी ने उनकी जांच की और 11 में से चार को सही माना था। हालांकि ये आरोप परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर सही माने गए हैं, कोई गवाह नहीं है और यह पैसे के लेन देन का मामला नहीं है। हालांकि, दैनिक भास्कर ने लीड के शीर्षक में लिखा है कि सीवीसी ने 10 में से चार को सही माने। वैसे तो यह पुरानी खबर है और जो चार सही माने गए हैं उनमें कोई सबूत या गवाह नहीं है। और पैसे लेने का मामला भी नहीं है।

दैनिक भास्कर ने वर्मा का फोन रॉ द्वारा इंटरसेप्ट किए जाने पर पैसे लेने की बात सामने आई – शीर्षक से एक छोटी खबर छापी है। लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता है कि पैसे लेने का आरोप आलोक वर्मा पर है या राकेश अस्थाना पर। दूसरी तरफ, दैनिक जागरण ने इस मामले में प्रेस ट्रस्ट की खबर छापी है जिसमें सीबीआई में नंबर वन को पैसे देने की बात है। इस हिसाब से पैसे देने की बात आलोक वर्मा के लिए हो सकती है पर यह सबूत नहीं है। और अंतिम या ठोस आरोप भी नहीं। अगर वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप पहले से थे तो उनकी नियुक्ति इस पद के लिए नहीं होनी चाहिए थी और अगर ये आरोप सीबीआई डायरेक्टर बनने के बाद लगे हैं तो भी दो साल का उनका कार्यकाल खत्म होने तक इनका मतलब नहीं है। कार्रवाई तो बाद में भी की जा सकती है। फिर भी रिटायर होने से 20 दिन पहले उन्हें हटाया जाना निश्चित रूप से चौंकाता है।

नवभारत टाइम्स का शीर्षक है, “चंद घंटों में ही छिन गई वर्मा की कुर्सी” उपशीर्षक है, “पीएम की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सीबीआई डायरेक्टर को हटाया”। अमर उजाला ने शीर्षक लगाया है, “बहाली के दो दिन बाद ही सीबीआई निदेशक पद से हटाए गए वर्मा”। दो उपशीर्षक हैं, “प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने 2-1 से लिया फैसला”। दूसरा उपशीर्षक है, “पीएम और जस्टिस सीकरी हटाने के पक्ष में, खड़गे ने किया विरोध”। दैनिक हिन्दुस्तान में फ्लैग शीर्षक है, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार समिति का फैसला” - मुख्य शीर्षक है, “कार्रवाई : सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पद से हटाए गए”।

दैनिक जागरण ने सीबीआई से वर्मा की छुट्टी - शीर्षक से खबर ऐसे दी है जैसे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है और उन पर आरोप साबित हैं। राजस्थान पत्रिका में फ्लैग शीर्षक है, “सीबीआई विवाद : “जांच एजेंसी के इतिहास में पहली बार” शीर्षक है, “आलोक वर्मा की फिर छुट्टी”। अखबार ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की प्रतिक्रिया छापी है। उन्होंने कहा है, “वर्मा के खिलाफ बिना उनको सुने निराशा में लिया गया फैसला है। इस डर से कि वे रफाल मामले में मोदी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सकते हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि सीबीआई प्रमुख को हटाने के केंद्र सरकार और सीवीसी के आदेश क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर दिए गए थे और इसीलिए रद्द कर दिए गए। अब वही आदेश फिर लागू हो गया है। इस पूरी प्रक्रिया में दिलचस्प यह रहा कि आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को कथित आपसी लड़ाई के कारण आधी रात की कार्रवाई में हटाए जाने के बाद जिस अधिकारी, नागेश्वर राव को सशर्त अंतरिम निदेशक बनाया गया था अब वही निदेशक हैं, बगैर किसी शर्त के (या यह स्पष्ट नहीं है)। अंग्रेजी अखबारों में यह खबर रूटीन खबरों की ही तरह है। ना शीर्षक में कुछ खास है ना डिसप्ले में।

कोलकाता के अंग्रेजी अखबार, द टेलीग्राफ ने इस खबर को लीड बनाया है और शीर्षक दिया है - क्या हम गधे हैं?" अखबार ने इस खबर के साथ हटाए जाने के बाद आलोक वर्मा द्वारा कल रात जारी उनके बयान को छापा है और उन आरोपों को भी जो उन पर लगाए गए थे। अखबार ने लिखा है कि उन पर लगाए गए 11 आरोपों (किसी ने 10 किसी ने आठ लिखा है) में से छह की पुष्टि की जानी है या आगे की जांच जरूरी है। चार को प्राथमिक नजर में पुष्ट पाया गया है जो मुख्य रूप से पारिस्थितिजन्य सबूत हैं। अखबार के मुताबिक आलोक वर्मा को हटाने का विरोध करने वाले कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सीवीसी ने इन चार मामलों में भी बगैर किसी गवाह या पुष्टि करने वाले किसी दूसरे आधार के बिना निर्णय कर लिया है। वह भी तब जब इनमें उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ है। खड़गे ने माना कि इन आरोपों की आगे जांच होनी चाहिए और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ आरोप से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता है।

यही नहीं, खड़गे ने यह भी कहा कि समिति को वर्मा को सुने बगैर या इस पर सीवीसी को उनका जवाब, अगर कोई हो को देखे बगैर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए और न्याय के सामान्य सिद्धांत का पालन होना चाहिए। यही नहीं, अखबार ने आधी रात की कार्रवाई में आलोक वर्मा को हटाए जाने की कार्रवाई की भी स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई है। अखबार ने इसके कई कारण बताए हैं। अखबार ने इसके अलावा अंदर के पन्ने पर भी आधे पन्ने से ज्यादा की सामग्री दी है।

मैं सिर्फ मुख्य शीर्षक हिन्दी में लिख रहा हूं। पहला है, "सीबीआई डायरेक्टर को बगैर सुनवाई हटा दिया गया"। उपशीर्षक है, "प्रधानमंत्री नहीं चाहते थे की पोल खुले-कांग्रेस"। एक कॉलम की खबर है, "वर्मा को हटाया जाना चौंकने वाला : (सुब्रमण्यम) स्वामी", "सीबीआई अधिकारी (एमके सिन्हा) ने राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच से खुद को अलग कर लिया है", "कांग्रेस ने सीवीसी को हटाने की मांग की" और छत्तीसगढ़ सरकार ने सीबीआई को दी गयी आम सहमति वापस ली। आपके अखबार ने आपको कितनी जानकारी दी यह आप खुद देखिए।

(वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह का ये अखबारनामा उनकी फेसबुक वाल से लिया गया है।)








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