राफेल ही नहीं विजय माल्या के भागने में भी है प्रधानमंत्री का हाथ !

मुद्दा , , शुक्रवार , 14-09-2018


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली। राफेल विमान सौदे और विजय माल्या के देश छोड़ने के मामले में भाजपा सरकार चाहे जो बयान दे, लेकिन दोनों मामलों के तार सत्ता के शीर्ष से जुड़े हैं। दोनों मामलों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका संदेह के घेरे में है। ऐसा न सिर्फ कहा जा रहा है बल्कि घटनाएं यह सिद्ध करती हैं कि दोनों मामलों में जरूर दाल में कुछ काला है। 

शराब कारोबारी विजय माल्या को देश से भागे लगभग ढाई साल हो गए। 2 मार्च, 2016 को विजय माल्या शासन-प्रशासन की नजरों में धूल झोंकते हुए सुरक्षित ब्रिटेन पहुंच गए। केंद्र सरकार दावा करती रही कि शीघ्र ही माल्या को भारत वापस लाया जाएगा लेकिन अभी तक यह संभव नहीं हो सका।

इसी बीच लंदन कोर्ट में विजय माल्या के दावे ने एक बार फिर देश की सियासत को तेज कर दिया है। माल्या ने दावा किया है कि भारत छोड़ने से पहले उन्होंने वित्त मंत्री से मुलाकात की थी और सभी मामलों को निपटने की बात कही थी। लेकिन बैंकों ने उनके सेटलमेंट पर सवाल खड़े कर दिए थे। विजय माल्या के इस दावे के बाद अरुण जेटली पर विपक्ष का हमला बढ़ गया।

 

लंदन के वेस्टमिंस्टर कोर्ट में माल्या

जेटली ने माल्या के बयान को झूठा करार देते हुए कहा कि "उन्होंने 2014 के बाद उसे कभी मिलने का समय नहीं दिया है। हालांकि, वह राज्य सभा सांसद थे तो इस विशेषाधिकार का उन्होंने एक बार गलत इस्तेमाल किया। मैं सदन की कार्रवाई से अपने कमरे में जा रहा था तब वह दौड़ते हुए मेरे पास आए और सेटलमेंट की बात की। मुझे उनके इस तरह के झांसे भरे प्रस्तावों के बारे में पहले बताया गया था इसलिए मैंने उनसे साफ कहा कि मुझसे बात करने का कोई मतलब नहीं। आप अपने ऑफर बैंकर को दें। उनके हाथों में जो कागज थे वे भी मैंने नहीं लिए। सिर्फ इस एक वाक्य के अलावा, जहां उन्होंने अपने विशेषाधिकार का गलत इस्तेमाल किया, उनसे मुलाकात का कोई सवाल ही नहीं उठता।’’ पहले तो वित्त मंत्री माल्या से किसी भी तरह की मुलाकात से इनकार करते रहे लेकिन सबूतों के आने के बाद वे पार्लियमेंट की लाॅबी में बातचीत करने को स्वीकार करते हैं। 

लेकिन विजय माल्या कम मामला इतना सरल नहीं है। 17 बैंकों के 9,000 करोड़ रुपये के कर्जदार विजय माल्या को देश से सुरक्षित भगाने में सिर्फ वित्त मंत्री की ही भूमिका संदिग्ध नहीं दिखती है बल्कि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सीधे तौर पर जुड़े हैं। विजय माल्या लुकआउट नोटिस जारी होने के बावजूद सुरक्षित निकल गया। इसमें वित्त मंत्रालय की कम पीएमओ की भूमिका ज्यादा नजर आती है। यह सीधे-सीधे सीबीआई की असफलता या लापरवाही है। सीबीआई किसी मंत्रालय के नहीं बल्कि सीधे पीएमओ के निर्देश पर काम करती है। विजय माल्या मामले में पहले जो लुकआउट नोटिस जारी हुआ था उसमें यह था कि यदि माल्या देश से बाहर जाते हैं तो उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाए। लेकिन कुछ दिनों बाद ही इस लुकआउट नोटिस में संशोधन किया गया कि गिरफ्तारी नहीं बल्कि सीबीआई को सूचित किया जाए। ऐसे में साफ है कि यह परिवर्तन किसी मंत्रालय या विभाग के अदना अधिकारी के वश का नहीं है बल्कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के आदेश के बाद ही ऐसा संभव है। 

विजय माल्या को सुरक्षित देश से भगाने की कामयाबी के बाद फिर देश की सुरक्षा से संबंधित विमानों की खरीद-फरोख्त मामले को देखें। देश की सुरक्षा का भार सेना को है। सेना की सारी जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय के जिम्मे है। लेकिन राफेल विमान सौदे में रक्षा मंत्रालय और रक्षा मंत्री कहीं नजर नहीं आते हैं। तब चाहे बतौर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर हो या अमेरिका रिटर्न निर्मला सीतारमण।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पहली बार पेरिस में राफेल सौदे की बात करते हैं तो उनके साथ देश के रक्षा मंत्री नहीं बल्कि अनिल अंबानी होते हैं। इस मामले में न तो कैबिनेट की बैठक में कोई अनुमोदन लिया जाता है और न ही रक्षा मत्री को साथ रखा जाता है। क्योंकि यह सौदा सीधे प्रधानमंत्री के दिशा निर्देश के तहत हो रहा है। राफेल विमान सौदे के पहले विजय माल्या का मामला ऐसा ही है जिसमें कदम-कदम पर नरेंद्र मोदी की भूमिका दिखती है। 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने यूपीए की डील को रद्द कर फ्रांस से राफेल विमानों को लेकर जो डील की उसकी वजह से राफेल का दाम 1600 करोड़ हो गया। जब फ्रांस में राफेल डील हो रही थी तो उस समय तत्कालीन रक्षा मंत्री गोवा में मछली पकड़ रहे थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मित्र को फायदा पहुंचाने के लिए देश का खजाना लुटाने में जुटे थे। मोदी सरकार ने एचएएल से यह सौदा छीनकर रिलायंस के अनिल अंबानी को दिया जिन पर 36000 करोड़ रूपए कर्ज हैं और विमान बनाने का कोई भी तजुर्बा नहीं है।  

 


 

 








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