अंधेरे की सियासत के नीचे हो रही है लोकतंत्र का उजियारा खोजने की कोशिश

मुद्दा , , मंगलवार , 21-05-2019


vote-election-evm-politics-issues-unemloyment-development

पुण्य प्रसून वाजपेयी

अंधेरा घना है और अंधेरे की सियासत तले लोकतंत्र का उजियारा खोजने की कोशिश हो रही है। मौजूदा वक्त में  लोकतंत्र का ये ऐसा रास्ता है जिसने आजादी के बाद से ही सत्ता हस्तांतरण के उस मवाद को उभार दिया है जिसमें देश चाह कर भी बार-बार 1947 की उसी परिस्थिति में जा खड़ा होता है जहां न्याय और समानता शब्द गायब रहे । ये कोई आश्चर्यजनक नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र के खतरे में होने का ऐलान कर दे और देश में आह तक ना हो । न्यायपालिका खुद के संकट को उभारे और समाज में कोई हरकत ना हो । चुनाव आयोग की स्वतंत्र पहचान खुले तौर पर गायब लगे और आयोग के भीतर से ही आवाज आये कि सत्तानुकूल ना होने पर बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है या सत्ता के विरोध के स्वर को जगह भी चुनाव आयोग में दर्ज नहीं की जाती और समाज के भीतर कोई हलचल नहीं होती ।

एक तरफ ईवीएम के जरिये तकनीकी लोकतंत्र को जीने का सबब हो तो दूसरी तरफ यही ईवीएम सत्ता के लिये खिलौना सरीखी ही चली हो । पर देश तो लोकतंत्र तले जीने का आदी है तो कोई उफ नहीं निकलता । आश्चर्य तो इस बात का भी नहीं हो पा रहा है कि रिजर्व बैंक जनता के पैसों की लूट के लिये समूची बैंकिंग प्रणाली को भी सत्ता के कदमों में झुकाने को तैयार है और जनता के भीतर से कोई विरोध हो नहीं पाता । खुले तौर पर जनता के बैंकों में जमा रुपयों का कर्ज लूट होती है ।

रईस कानून व्यवस्था को धता बता कर फरार हो जाते हैं लेकिन संसद कानून का राज कहकर लोकतंत्र का चादर ओढ़ लेती है । और तो और  किसी तरह की कोई बहस अपने ही बच्चों की शिक्षा के गिरते स्तर या शिक्षा की तरफ की जा रही अनदेखी को लेकर भी मां-बाप में नहीं जाग रही है । प्रीमियर जांच एजेंसी सीबीआई के भीतर डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर यानी वर्मा-आस्थाना के खुले तौर पर भ्रष्ट होने के आरोपों पर भी समाज में कोई हरकत नहीं हुई और खुले तौर पर पीएमओ की दखलंदाजी को लेकर भी बहुसंख्यक तबका सिर्फ तमाशबीन ही बना रहा है ।

कैसे और किस तरह से पीने लायक पानी, स्वच्छ पर्यावरण, हेल्थ सर्विस सब कुछ बिगाड़ कर सत्ताधारियों ने लोकतंत्र का पाठ चुनाव के एक वोट पर जा टिकाया और बेबस देश सिर्फ देखता रहा । और कैसे बेबसी से मुक्ति के लिये हर पांच बरस बाद होने वाले चुनाव  को ही उपचार मान लिया गया । यानी सत्ता परिवर्तन के जरिये लोकतंत्र के मिजाज को जीना और सत्ता के लिये देश में लूटतंत्र को कानूनी जामा पहना देना, दोनों हालातों को देश के हर वोटर ने जिया है और हर नागरिक ने भोगा है।

इससे इंकार कौन करेगा। 1947 के बाद संसद हर पांच बरस में सजती संवरती रही । जनता की भागीदारी संसद को ही लोकतंत्र का मंदिर मान कर समती गई । और 2014 में जब पहली बार किसी नये नवेले प्रधानमंत्री ने संसद की जमीन को माथे से लगाया तो लोकतंत्र का पावन रुप हर उस आंख में बस गया जिन आंखों ने 1952 से लेकर 2014 तक संसद के भीतर बाढ़-सूखा की तबाही ,मंहगाई तले पिसते मध्यम वर्ग , अनाज की किमत तक ना मिल पाने से कर्ज में डूबे किसान की खुदकुशी, न्यूनतम मजदूरी के ना मिलने पर तिल-तिल मरते परिवार, गांव-गांव में पीने के पानी के लिये भटकते लोग, दो जून की रोटी के लिये गांव से पलायन करते किसानी छोड़ मजदूर बन शहरों की सड़कों पर भटकते परिवार के परिवार। तमाम मुद्दों पर संसद की असंवेदनशीलता भी हर किसी ने हर दौर में देखी । आलम ये भी रहा कि 15 फीसदी सांसदों की मौजूदगी भी इन मुद्दों पर बहस के वक्त नहीं रहती और बिना कोरम पूरा हुये संसद में जिन्दगी से जुड़े मुद्दों को सिर्फ सवाल जवाब में खत्म कर दिया जाता । जिन मुद्दों पर सत्ता को विपक्ष घेरता और उन्हीं मुद्दों पर न्याय दिलाने की आस बनाकर विपक्ष सत्ता पाता और सत्ता पाने के बाद उन्हीं मुद्दों को भूल जाता । 

ये सब कैसे कोई भूल सकता है । शायद इसीलिये अंधेरा धीरे-धीरे गहराता रहा और समूचे समाज ने आंखें मूंद रखी थी । क्योंकि लोकतंत्र के आदी हो चले भारत में आवाज उठाने कर असर डालने का हक उसी राजनीति, उसी सियासत के मत्थे थोप दिया गया जिसने अंधेरे को फैलाया और धीरे-धीरे गहराया । 1947 में बहस थी हाशिये पर जी रहीं जातियां या समुदायों को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने के लिये आरक्षण के जरिये रियायत दी जाये । आर्थिक तौर पर विपन्न तबकों को सत्ता रुपये बांट कर राहत दे । मुफ्त या सस्ते आनाज को बांटे । पर धीरे-धीरे आरक्षण राजनीतिक हथियार बन गया और हाशिये पर रहने वाली जातियों को मुख्यधारा से जोड़ने के बदले उन्हें ही मुख्यधारा बनाने की कोशिश शुरु हो गई । दलित-आदिवासी-मुस्लिमों की बस्तियों मे स्कूल, हेल्थ सेंटर या जीने की जरुरतों की व्यवस्था नहीं की गई बल्कि हाशिये पर के लोगों को सियासी दान-दक्षिणा या सब्सिडी या राजनीतिक रुपयों की राहत तले ही लाया गया ।

हर राज्य ने दो से पांच रुपये में सस्ता खाना मुहैया कराने के लिय दुकानें खोल दी । और लूट उसमें भी होने लगी । रईसों को मुफ्त आनाज बांटने का ठेका भी चाहिये और मिड डे मील का टेंडर भी चाहिये । क्योंकि देश बड़ा है करोड़ों लोग हैं तो लूट का एक कौर भी करोड़ों के वारे न्यारे कर देता है ।
 ऐसे में कोई क्या कहे क्या सोचे कि 70 बरस की उम्र युवा लोकतंत्र के नारे तले छोटी लग सकती है लेकिन 70 बरस का मतलब पांच पीढ़ियों का खपना है और 31 करोड़ की जनसंक्या से 130 करोड़ तक पहुंचना भी है । और साथ ही 1947 के वक्त के भारत के बराबर तीन भारत को गरीबी मुफलिसी, हाशिये पर धकेल कर संसदीय लोकतंत्र के रहमोकरम पर टिकाना भी है । और जो पीड़ा इस अंधेरे में समाये भारत के भीतर है उससे अनभिज्ञ या फिर उस तरह आंख मूंद कर कौन से भारत को विकसित बनाया ज सकता है ये सवाल मुंबई की झोपड़-पट्टियों में से निकले एंटीला इमरत को देख कर कुछ हद तक तो समझा जा सकता है । लेकिन समूचा सच 2014 के बाद जिस तरह खुले तौर पर उभरा उसने पहली बार साफ-साफ संकेत दे दिया कि अंधेरों की रजामंदी से उजियारे में रहने वालों को खत्म किया जा सकता है या फिर उनके लोकतंत्र को धराशायी कर हशिये पर लड़े तबकों में इस उल्लास को भरा जा सकता है कि सत्ता ने उनके लोकतंत्र को जिन्दा कर दिया है।

क्योंकि देश में अब सिर्फ अंधेरा होगा । और सड़क पर बिलबिलाते समाज को ये रोशनी दिखायी देगी कि उनके हिस्से का अंधेरा हर जगह छाने लगा है । लोकतंत्र के इस मवाद को कोई सत्ता के लिये भी हथियार बना सकता है ये इससे पहले कभी किसी ने सोचा नहीं या फिर इससे पहले संसदीय लोकतंत्र की उम्र बची हुई थी इसलिये किसी ने ध्यान ही नहीं दिया । हो जो भी लेकिन अंधेरे की सत्ता लोकतंत्र के उजियारे को कैसे अपनी मुट्ठी में कैद कर सकती है और कैसे ढहढहाकर लोकतंत्र सत्ता के आगे नतमस्तक हो सकता है उसकी लाइव कमेन्ट्री देश देख भी रहा है और भोग भी रहा है । संसदीय लोकतंत्र में अब ये इतिहास के पल हो चुके हैं कि जनता के मुद्दे होने चाहिये । उम्मीदवारों की पहचान होनी चाहिये । मुद्दों के जरिये संसद की जरूरत होनी चाहिये और उम्मीदवारों के जरिये समाज के अलग-अलग तबके से सरोकार होने चाहिये । यानी ये महसूस होना चाहिये कि संसद में जनता के प्रतिनिधित्व करने वाले पहुंचे हैं। और भारत की विविधता को संसद समेटे  हुए है। पर अब तो ना मुद्दे मायने रखते हैं ना ही उम्मीदवार । और ना ही संसद की वह गरिमा बची है जिसके आसरे जनता में भावनात्मक लगाव जागे कि संसद चल रही है तो उनकी जिन्दगी से जुड़े मुद्दों पर बात होगी ।

रास्ता निकलेगा । अब ना तो हमारे पास संसद की गरिमा है । ना ही हमारे पास संविधान की व्याख्या करने वाला सु्रीम कोर्ट है । ना ही कोई संवैधानिक संस्थान है जो सत्ताधारियों पर लगते आरोपों की जांच तो दूर सत्ता की मर्जी के बिना अपने ही काम को कर सके । ना ही हर पांच बरस बाद लोकंतत्र को जीने की स्वतंत्रता का एहसास कराने वाला चुनाव आयोग है । ना ही मानवाधिकार आयोग है जो जनता के हक की रक्षा का भरोसा जगाये। ना ही किसान-गरीब-मजदूरों के हक के सवालों के लिये संघर्ष करने वाले समाजसेवी संगठन हैं । ना ही ऐसे शिक्षा संस्थान हैं जो दुनिया की दौड़ में भारतीय बच्चों को खड़ा कर सके, शिक्षित कर सके । और ना ही हमारे पास राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का वो एहसास है जो राजनीति को सहकार-सरोकार और बहुसंख्यक जनता से जोड़ने की दिशा में ले जाये।

अब हमारे पास मजदूरों की ऐसी फौज है जिसके लिये कोई काम है ही नहीं । किसानों की बदहाली है जिनके लिये सिवाय खुदकुशी के कुछ देने की स्थिति में सत्ता नहीं है । अब हमारे पास अरबपतियों की ऐसी कतार है जो देश में लूट मचाकर दुनिया के बाजार में अपन धमक बनाये हुये है । अब हमारे पास बेरोजगारों की ऐसी फौज  है  जो राजनीतिक पार्टियों में नौकरी कर रही है या कैरियर बनाने के लिये नेताओं की चाकरी में जुटी है । अब हमारे पास अपराधी और भ्रष्ट सांसदों-विधायकों की ऐसी फौज है जो जनता के प्रतिनिधि बनकर संविधान को खत्म कर संविधान से मिले विशेषाधिकार का भी लुत्फ उठा रही है और अपराध भी खुले तौर पर कर रही है । अब हमारे पास कानून-व्यवस्था नहीं है बल्कि सड़क पर लिंचिंग कर न्याय देने का जंगल कानून है । अब हमारे पास ऐसी फौज है जो बिना वर्दी फौज से ज्यादा ताकत रखती है ।

फिर हमारे पास अब नये चेहरे के साथ नाथूराम गोडसे भी है । और इस आधुनिक पूंजी पर अंगुली उठाने वाले या सवाल करने वाले या तो लुटियन्स के बौद्धिक करार दिए जा चुके हैं या फिर शहरी नक्सलवादी या फिर खान मार्केट के ग्रुप या फिर देशद्रोही या पाकिस्तान के हिमायती । तो संविधान के नाम पर ही जब सत्ता लोकतंत्र को हड़प कर अंधेरे को ही देश का सच बताने निकल पड़ी हो तो फिर सवाल ये नहीं है कि चुनाव के जरिये देश के नागरिकों ने लोकतंत्र को  जीया या नहीं । बल्कि सवाल तो ये है कि एक वोट का लोकतंत्र भी गायब हो गया । क्योंकि नागरिक भी ईवीएम के सामने बौना हो गया और ईवीएम में समाये लोकतंत्र में सत्ता को ना तो बीजपी की जरुरत है और ना ही संघ परिवार की । तो लोकतंत्र को जीते देश में जनता के प्रतिनिधि हों या नौकरशाही या फिर न्यायपालिका हो या मीडिया ।

जो जितनी जल्दी मान ले कि उसकी भागीदारी बंटी ही नहीं उसके लिये उतनी ही जल्दी ठीक हालात होंगे । क्योंकि लोकतंत्र की नई परिभाषा में सत्ता के लिये काम करते लोकतंत्र के स्तम्भ ही असल स्तम्भ हैं । इसीलिये जो सोच रहे हैं कि आने वाले वक्त में चुनाव की जरूरत ही नहीं होगी । उसका पहला एहसास तो 2019 में ही हो गया कि जितना लोकतंत्र (ईवीएम़) वोटिंग बूथों के भीतर थे उससे ज्यादा लोकतंत्र बूथों के बाहर था। आप बूथों के बाहर कतारों में खड़े थे और बाहर बिना कतार ज्यादा अनुशासनात्मक तरीके से लोकतंत्र का ठप्पा लग रहा था। तो एक वक्त इंदिरा ने लोकतंत्र खत्म कर  इमरजेन्सी को अनुशासनात्मक कार्रवाई कहा था और अब सत्तानुकूल अनुशासानात्मक ठप्पे को ही लोकतंत्र कहा जा रहा है । देश बहुत आगे निकल चुका है । आप कहीं पिछड़ तो नहीं गये ?
(पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं यह लेख उनके ब्लॉग से साभार लिया गया है।)








Tagelection evm politics issues unemployment

Leave your comment