जिनका अधिकार महज वोट देने तक सीमित है!

मुद्दा , , बुधवार , 24-04-2019


vote-gumla-jharkhand-electricity-ranchi-adivasi

विशद कुमार

झारखंड का बोकारो जिला। जिला मुख्यालय से मात्र आधा किमी दूर बसा है गुमला नगर। लगभग साढ़े तीन सौ घरों वाले इस गुमला नगर को न तो गांव कहा जा सकता है न ही बस्ती, क्योंकि इस पर हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास की किरण इसके जन्म के लगभग 40 वर्षों बाद भी नहीं पहुंच पाई है। जबकि यहां बसने वाली जनसंख्या राज्य व देश की सरकार बनाने में अपनी भारतीयता का बखूबी निर्वहन करती रही है।

क्योंकि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की संसदीय प्रणाली के तहत यहां के लोग वोट देने के अधिकारी हैं। वे राज्य व देश के सदन में जनप्रतिनिधि भेजते आ रहे हैं। मगर जिस व्यवस्था के तहत वे सदन में जनप्रतिनिधि भेजते हैं, वही व्यवस्था इनको इनका बुनियादी अधिकार विकास देने में अक्षम है, क्योंकि यहां बसने वालों ने 40 साल पहले यहां की खाली पड़ी सरकारी जमीन पर अपना बसेरा बना लिया था। मजे की बात तो यह है कि इनके पास वोटर कार्ड है, आधार कार्ड है, कुछ लोगों के पास राशन कार्ड भी है, जो इनके भारतीय होने के पुख्ता सबूत हैं।

बुनियादी सुविधाओं से महरूम गुमला।

बावजूद इसके न तो यहां मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान का शौचालय है, न प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिलने वाले आवास हैं, और राशन कार्ड होने के बावजूद किसी महिला को उज्जवला योजना का गैस तक नसीब नहीं हो पाया है। आवागमन की सुविधा के लिए सरकारी स्तर से पीसीसी या किसी अन्य तरह की सड़क की सुविधा से महरूम इस इलाके को आजादी के 70 सालों बाद बिजली भी मयस्सर नहीं हो पायी है। अलबत्ता यहां एक सरकारी स्कूल जरूर है, जहां दोपहर के भोजन की व्यवस्था यानी मिड डे मील है। 

बता दें कि यह स्कूल सेक्टर 12 गुमला नगर, चास-3 के नाम के तहत है। चास, प्रखंड मुख्यालय है और चास-3 इस प्रखंड के तहत आने वाला इस स्कूल का कोड है। मतलब स्पष्ट है कि इसी प्रखंड के तहत यह गांव आता है, मगर इसे पंचायत में शामिल नहीं किया गया है। चास नगर पलिका भी है, मगर इसे नगर पालिका में भी शामिल नहीं किया गया है। यह बड़ा ही पेचीदा मामला है कि यहां के वोटर सांसद और विधायक तो चुनते हैं मगर मुखिया या मेयर नहीं चुन सकते। जो आज भी काफी पेचीदगी लिए हुए है। झारखंड की नदियों में तीसरा दर्जा हासिल गरगा नदी के किनारे बसा यह कुनबा, जिसके दूसरी छोर पर चास शहर बसा है।

वोटर कार्ड है लेकिन अधिकार नहीं। 

बताते चलें कि जब बोकारो इस्पात संयंत्र की नींव पड़ी थी तब यहां रोजगार की संभावना की तलाश में राज्य के कोने-कोने से लोग आने लगे थे। कुछ आज के बिहार के थे, तो कुछ आज के झारखंड के और उसकी राजधानी रांची की ओर के आदिवासी थे। यह गुमला नगर रांची से लगभग 100 किमी दूर गुमला जिला से आए आदिवासियों द्वारा बसाया गया है। यहां केवल आदिवासी, ओबीसी और कुछ ईसाई समुदाय के लोग बसे हुए हैं। यहां की कुल जनसंख्या 1800 के आस-पास है।

इलाके के लोगों का पेट दैनिक मजदूरी से चलता है। आजकल कुछ लोग फुटपाथों पर ठेला वगैरह लगाकर परिवार का जीवनयापन कर रहे हैं, तो कुछ चास में छोटी-बड़ी दुकानों में मजदूरी करते हैं।

जब मैंने बिजली के खंभे और उस पर से गुजरते बिजली के तार को देखकर पूछा कि बिजली के पोल हैं तो बिजली क्यों नहीं है? इस पर झारखंड क्रांतिकारी मजदूर यूनियन से जुड़े 64 वर्षीय विष्णु बेसरा ने बताया कि क्रांतिकारी मजदूर यूनियन के महासचिव डीसी गोहांई के काफी प्रयास के बाद बिजली विभाग द्वारा पोल व तार ला दिए गए हैं, मगर बिजली के कनेक्शन लेने के लिए विभाग द्वारा 5,200 रुपये मांगे जा रहे हैं और साथ में तार व मीटर भी। यानी एक घर में कनेक्शन लेने के लिए 6,000 रुपये से ज्यादा खर्च आएगा, जो हम मजदूरों के वश की बात नहीं है।

इलाके में स्थित स्कूल।

53 वर्षीय रतन बड़ाइक कहते हैं कि एक तरफ मोदी सरकार गरीबों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने की बात करती है और दूसरी तरफ बिजली विभाग बिना पैसा लिए कनेक्शन देने को तैयार नहीं है। यह कैसा मजाक है।

50 वर्षीय शान्ति देवी भी दैनिक मजदूरी करती हैं। वह कहती हैं कि वोट लेने के वक्त नेता लोग बहुत बड़ा-बड़ा वादा करता है, लेकिन जीत जाने के बाद पांच साल तक कोई झांकने भी नहीं आता है।

पीने के पानी के सवाल पर इंदा विश्वकर्मा और सत्यनारायण विश्वकर्मा कहते हैं कि बस एक ही चापांकल है जिससे सबका काम चलता है, बाकी काम नहाना और कपड़ा वगैरह धोना, बगल में गरगा नदी से हो जाता है।

 कहना न होगा कि आजादी के बाद से आज तक ऐसी कौन सी मजबूरी रही है कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी सिर छिपाने के लिए सरकार की खाली जमीनों पर एक छत बनाकर रहने को मजबूर है और सरकार उस पर सरकारी जमीन का अतिक्रमण करने का आरोप लगाकर उसे वहां से खदेड़ने का हर संभव प्रयास कर रही है। यह आबादी फुटपाथों पर ठेला वगैरह लगाकर अपना पेट पालती है तो सरकार उस पर भी अतिक्रमण करने का आरोप मढ़ती है। जबकि यही आबादी सरकार बनाने की प्रक्रिया की पहली कड़ी है। यह सवाल, कब तक सवाल बना रहेगा?

(विशद कुमार पत्रकार हैं और आजकल बोकारो में रहते हैं।)








Tagvoter gumla jharkhand electricity ranchi

Leave your comment