मतदाताओं के लिए प्रत्याशियों के चयन की कसौटियां

विमर्श , , शुक्रवार , 19-04-2019


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डॉ. राजू पांडेय

सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनाव प्रगति पर हैं। भारतीय मतदाता अपने सहज अंतर्बोध से हमेशा अपना जनप्रतिनिधि चुनता है। वह नेताओं, मीडिया तथा राजनीतिक विश्लेषकों को प्रायः चौंका भी देता है। किंतु यह दौर ऐसा है जब मतदाता के सम्मुख गैर ज़रूरी मुद्दे परोसे जा रहे हैं और उसके चयन को इन मुद्दों पर आधारित करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है, इसलिए यह आवश्यक है कि मतदाता, प्रत्याशी का चयन करते समय उन बुनियादी बातों को ध्यान में रखे जो वैसे तो उसे अच्छी तरह पता हैं किंतु जिन्हें कई बार राजनीतिक दलों और मीडिया द्वारा पैदा किए गए माहौल का शिकार होकर वह विस्मृत कर जाता है।

सबसे पहले बात आती है प्रत्याशी की। मतदाता को इस बात की बारीकी से पड़ताल करनी चाहिए कि जिन प्रत्याशियों में से उसे चयन करना है उनकी शिक्षा-दीक्षा कितनी है, आय कितनी है, वे आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से समाज के किस वर्ग से आते हैं और उनकी पृष्ठभूमि क्या है? क्या उन्हें राजनीति, प्रशासन और समाज सेवा का पूर्व अनुभव है? क्या वे किसी अन्य क्षेत्र  (फ़िल्म, खेल आदि) में सफलता प्राप्त करने वाले सेलिब्रिटी हैं? यदि ऐसा है तो क्या वे राजनीति में लम्बी पारी खेलने के लिए पर्याप्त गंभीर हैं? कहीं वे अपनी लोकप्रियता का लाभ उठाकर चुनावी जीत प्राप्त कर अपना भविष्य संवारने में तो नहीं लगे हैं? मतदाता को यह भी देखना चाहिए कि कोई प्रत्याशी अपने चुनाव क्षेत्र में पूर्व से सक्रिय है या नहीं? यदि वह सक्रिय है तो जन समस्याओं के निपटान में उसकी कैसी भूमिका रही है? यदि वह पैराशूट कैंडिडेट है तो उसे लाने के पीछे की राजनीतिक दलों की मंशा क्या है?

क्या उसे वर्तमान जनप्रतिनिधि की अलोकप्रियता और अकर्मण्यता के कारण बदलाव के रूप में लाया गया है? मतदाता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले प्रत्याशियों को न चुने। किंतु उसे प्रत्याशी के क्रिमिनल रिकॉर्ड की पड़ताल करते समय यह गौर करना होगा कि उस पर आरोपित मुकदमे कहीं राजनीति से प्रेरित तो नहीं हैं या जन सरोकार के मुद्दों पर आंदोलन के दौरान तो नहीं लगाए गए हैं? मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों से यह अवश्य पूछना चाहिए कि क्षेत्र के विकास के लिए उनके पास क्या कार्य योजना है? अपने लोकसभा क्षेत्र की समस्याओं को चिह्नित कर उनके संभावित समाधान प्रस्तुत करने हेतु भी प्रत्याशियों पर दबाव बनाया जाना चाहिए। 

यदि कोई प्रत्याशी आपके क्षेत्र का सांसद है और दुबारा आपसे जनादेश प्राप्त करने आया है तब तो आपको उसके कार्य का मूल्यांकन करने का अवसर उपलब्ध हो जाता है। सांसद का मूल्यांकन करने से पूर्व उसके द्वारा करणीय कार्यों की जानकारी आवश्यक है। कई बार ऐसा होता है कि हम विधायक या महापौर या सरपंच आदि की अकर्मण्यता की सजा सांसद को दे बैठते हैं जबकि सबके कर्तव्य, उत्तरदायित्व और क्षेत्राधिकार बिल्कुल अलग-अलग हैं। हमारी अपेक्षाएं भी केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय के प्रशासन से अलग अलग होनी चाहिए। 

सांसद के कार्यों का कोई स्पष्ट विवरण संविधान में उपलब्ध नहीं है। संविधान के आर्टिकल 105 के सेक्शन 3 के अनुसार संसद के प्रत्येक सदन तथा इन सदनों के सदस्यों एवं कमेटियों की शक्तियों को  संसद द्वारा समय समय पर निर्मित कानूनों के माध्यम से परिभाषित किया जाएगा। सांसद मुख्य रूप से विधायी कार्य करते हैं किंतु इन्हें अनेक प्रशासनिक उत्तरदायित्व भी सौंपे गए हैं। सांसद देश के संचालन के लिए कानूनों का निर्माण करते हैं। वे किसी विधेयक पर बहस में भाग ले सकते हैं। वे किसी सरकारी विधेयक पर संशोधन भी प्रस्तावित कर सकते हैं। वे प्राइवेट मेंबर्स बिल भी ला सकते हैं। इसके अलावा सांसद प्रश्न काल, शून्य काल, स्थगन प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, निंदा प्रस्ताव आदि का उपयोग करते हुए सरकार के काम पर निगरानी रख सकते हैं और जनहित के मुद्दे उठा सकते हैं।

सांसद विभिन्न स्टैंडिंग कमेटियों तथा एडहॉक कमेटियों के सदस्य के रूप में सुपरवाइजरी रोल निभाते हैं। सांसद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में भाग लेते हैं। लोकसभा सांसद स्पीकर तथा डिप्टी स्पीकर के चयन में हिस्सा लेते हैं। सरकार द्वारा कोई भी कर आरोपित करने से पहले या कोई भी व्यय करने से पूर्व संसद से अनुमति लेनी होती है। सांसद बजट पास करने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं और बजट के बाद वित्तीय समितियों के सदस्य के रूप में वित्त व्यवस्था को नियंत्रित करते हैं।

प्रत्येक सांसद का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह अपने लोकसभा क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाओं और समस्याओं को मुखर होकर प्रखरता के साथ रखे। सांसद अपने लोकसभा क्षेत्र में चल रही विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को सही दिशा एवं अपेक्षित गति प्रदान कर सकते हैं। वह जिले के कलेक्टर, राज्य शासन और केंद्र सरकार के निरंतर संपर्क में रह कर समन्वय का कार्य कर सकते हैं और जनकल्याण की योजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं को दूर कर सकते हैं। 1993 से लोकसभा सांसदों को अपने क्षेत्र में विभिन्न परियोजनाओं के लिए जिला कलेक्टर को सिफारिश करने का अधिकार भी प्राप्त है। सांसदों को पार्लियामेंट लोकल एरिया डेवलपमेंट स्कीम के तहत 5 करोड़ रूपए प्रति सांसद प्रति वर्ष उपलब्ध कराए जाते हैं। सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत सभी सांसद चयनित ग्रामों को आदर्श ग्राम के रूप में विकसित कर सकते हैं यद्यपि इस हेतु उन्हें अलग से कोई फण्ड उपलब्ध नहीं कराया जाता है बल्कि उन्हें चल रही योजनाओं और इनके लिए उपलब्ध फण्ड की ही सहायता लेनी पड़ती है।

मतदाता को यह देखना होगा कि उसके सांसद ने अपने लोकसभा क्षेत्र में पेयजल, सिंचाई, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, पोषण, परिवहन, पर्यावरण आदि के विषय में क्या कार्य किया है? क्या वह कृषि, उद्योग और व्यापार से जुड़ी समस्याओं को हल करने में कामयाब हुआ है? क्या उसके प्रयासों से नया रोजगार उत्पन्न हुआ है? क्या उसके प्रयासों से अधोसंरचना के विकास में सहायता मिली है? क्या वह अपने लोकसभा क्षेत्र में रेल सुविधा के विस्तार में कामयाब हुआ है? क्या वह नई सड़कें, पुल, बांध और नहर आदि बनवाने में सफल रहा है? केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में उसकी क्या भूमिका रही है? संसद में उसकी उपस्थिति कितने दिन रही है? उसकी लोकसभा में सक्रियता कैसी रही है? उसने क्षेत्र की समस्याओं और विकास को लेकर कितने प्रश्न पूछे हैं? वह विभिन्न बहसों में भाग लेता है अथवा नहीं? क्या वह असंसदीय भाषा के प्रयोग और संसद की कार्रवाई को बाधित करने हेतु दोषी ठहराया गया है? क्या वह श्रेष्ठ सांसद के रूप में पुरस्कृत हुआ है? क्या उस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं? क्या वह जनता के लिए सहज उपलब्ध रहा है? लोकसभा क्षेत्र बहुत बड़ा होता है।

अपने क्षेत्र के हर हिस्से में क्या उसकी उपस्थिति बराबर रही है? स्वयं से जनता आसानी से संपर्क कर सके इसलिए उसने क्या व्यवस्था बनाई है? क्या वह हर वर्ग, हर धर्म, हर जाति और हर लिंग के लोगों के प्रति समान भाव रखता है? क्या वह केवल उन्हीं लोगों का काम करता है जिन्होंने चुनाव में उसे जिताया था? क्या वह अपने विरोधियों को शत्रु समझता है? क्या वह प्रतिशोधी स्वभाव का है? क्या वह पिछले चुनाव के दौरान किए अपने वादों पर खरा उतरा है? पिछले चुनाव के बाद से उसकी संपत्ति में कितना इज़ाफ़ा हुआ है? क्या सांसद जिस राजनैतिक दल का है वह केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता में है? यदि हां तो क्या सांसद इसका लाभ उठाकर विकास को गति देने में कामयाब हुआ है? यदि नहीं तो क्या सांसद ने केंद्र या राज्य की प्रतिद्वंद्वी दल की सरकार के साथ समन्वय का रास्ता अपनाया है या संघर्ष का?  यदि उसने टकराव का रास्ता चुना है तो क्या यह न्यायोचित है?

मतदाता को यह भी देखना होगा कि क्या चुनाव प्रचार के दौरान धनबल और बाहुबल का प्रयोग प्रत्याशी द्वारा किया गया है? क्या वह अमर्यादित और अश्लील टिप्पणियां करने का आदी है? क्या वह तनाव फैलाने हेतु हेट स्पीच देकर जनता के किसी खास तबके को अपने पक्ष में करना चाहता है? क्या वह जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर वोट मांग रहा है? वह अपने राजनीतिक हितों को क्षेत्र के विकास पर तरजीह तो नहीं देगा?

मतदाता के लिए प्रत्याशी का आकलन करना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही जरूरी उस दल की पड़ताल करना है जिस दल से वह चुनाव लड़ रहा है। प्रायः राष्ट्रीय दल पूरे देश के हर क्षेत्र में लोकसभा चुनावों में अपनी किस्मत आजमाते हैं किंतु अनेक प्रदेश ऐसे हैं जहां पर उस प्रदेश तक सीमित क्षेत्रीय दल चुनाव लड़ते और जीतते हैं। यदि मतदाता राष्ट्रीय दल का चयन कर रहा है तो उसे उस राष्ट्रीय दल के इतिहास और विचारधारा का ज्ञान होना चाहिए। वैसे तो निर्वाचन आयोग के अनुसार कोई भी दल कम से कम तीन राज्यों से न्यूनतम दो फीसदी लोकसभा सीट जीत कर राष्ट्रीय दल का दर्जा पा सकता है। किसी दल को लोकसभा या विधानसभा के चुनावों में कम से कम 4 राज्यों में यदि 6 प्रतिशत वोट मिले हों और इसके अलावा उसके 4 लोकसभा सदस्य चुन कर आए हों तब भी वह राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता अर्जित कर सकता है।

यदि कोई दल 4 राज्यों में स्टेट पार्टी का दर्जा प्राप्त कर लेता है तब भी वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने का हकदार बन जाता है। मतदाता को यह समझना होगा कि केवल देश भर में कार्यकर्ताओं, शाखाओं और भव्य कार्यालयों की मौजूदगी ही किसी दल को सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय पार्टी नहीं बना देती। मतदाता को यह देखना होगा कि उस राष्ट्रीय दल में क्या देश के हर धर्म, जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्र के लोगों को साथ लेकर चलने की क्षमता है?

क्या वह राष्ट्रीय दल हमारे देश की विविधता में एकता को स्वीकारता है और उसका आदर करता है? धर्म और राजनीति के पारस्परिक संबंधों को लेकर उस दल का क्या नजरिया है? अल्पसंख्यकों, वंचित समाजों तथा आदिवासियों के प्रति उसकी नीति क्या है? सामाजिक न्याय और आरक्षण को लेकर उस दल की नीति क्या है? क्या उस दल की दृष्टि में आर्थिक आधार पर आरक्षण देकर सामाजिक समानता का लक्ष्य पाया जा सकता है? महिलाओं का उस दल में क्या स्थान है और कितना प्रतिनिधित्व है? महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को लेकर उस दल की क्या प्रतिक्रिया रही है? उस राष्ट्रीय दल की संवैधानिक मूल्यों के प्रति आस्था को लेकर कभी कोई प्रश्न चिह्न तो नहीं लगा है? उस राष्ट्रीय दल के शासन के दौरान देश की संवैधानिक संस्थाएं कमजोर तो नहीं हुई हैं? न्यायपालिका और सेना के फैसलों एवं कार्यकलापों को सार्वजनिक विमर्श में लाने और इन पर सार्वजनिक टीका टिप्पणी को वह दल उचित मानता है या अनुचित? चुनावी खर्च, चुनावी चंदे और चुनाव सुधारों को लेकर उस दल का दृष्टिकोण क्या है? उस दल के द्वारा कितने प्रतिशत अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को टिकट दिया गया है?

उस दल के चुनावी घोषणापत्र में किन बिंदुओं को मुख्य स्थान दिया गया है? वह दल अपने घोषणापत्र में किए गए वादों को निभाने के लिए गंभीर है या नहीं? क्या उस दल ने अपने 5 साल के शासन का रिपोर्ट कार्ड जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया है? यदि वह राष्ट्रीय दल  विपक्ष में है तो क्या उसकी भूमिका महज आलोचना तक सीमित रही है? क्या विपक्ष के रूप में वह सकारात्मक विकल्प देने में कामयाब रहा है? वह दल विकास के नाम पर वोट मांग रहा है या जाति और धर्म के नाम पर? भ्रष्टाचार को लेकर उसका रवैया कैसा है? क्या वह भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई करने के लिए आवश्यक दृढ़ता दिखा रहा है? उस राष्ट्रीय पार्टी की अर्थ नीति क्या है? कृषि और कृषक उसकी प्राथमिकताओं में किस क्रम पर हैं? श्रमिकों के प्रति उस दल में कितना सम्मान है? पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स के प्रति उसका रवैया कैसा रहा है? पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को लेकर उस दल के विचार क्या हैं? वित्तीय समावेशन के लिए उसकी रणनीति क्या है? उस दल की दृष्टि में विकास की परिभाषा क्या है? उस दल के शासन काल में मानव विकास सूचकांकों पर हमारा प्रदर्शन कैसा रहा है?

उदारीकरण और वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के बारे में उसका विज़न क्या है? वह दल वेलफेयर स्टेट की अवधारणा को प्रासंगिक मानता है या पूर्ण निजीकृत सरकार का पक्षधर है? लोन और सब्सिडी को लेकर उस दल का दृष्टिकोण क्या है? ब्यूरोक्रेसी के चरित्र में बदलाव लाना उस दल को आवश्यक लगता है या नहीं या वह वर्तमान परिदृश्य से संतुष्ट है? पुलिस सुधारों को लेकर उस दल के क्या विचार हैं? शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास,बेरोजगारी, कुपोषण, निर्धनता, भुखमरी आदि विषयों पर उस दल की क्या कार्यनीति है? पर्यावरण, प्रदूषण और स्वच्छता पर उस दल की क्या नीति है? शोध, अनुसंधान और जनता में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास तथा अंधविश्वासों के उन्मूलन  को वह दल कितनी प्राथमिकता देता है? आतंकवाद, नक्सलवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उस दल का नजरिया क्या है? वह राष्ट्रीय दल नक्सलवाद और आतंकवाद को महज कानून व्यवस्था की समस्या मानता है या वह इनका सामाजिक आर्थिक समाधान निकालने का पक्षधर है? उस दल का मानवाधिकारों के प्रति क्या नजरिया है? उस दल के शासन काल में मानवाधिकारों की स्थिति क्या है? प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उस दल का क्या स्टैंड है? क्या उसके शासनकाल में प्रेस दबाव और भय से मुक्त रहा है?

धार्मिक और जातीय हिंसा से निपटने में क्या वह दल कारगर रहा है? सेकुलरिज्म और राष्ट्रवाद को लेकर उसका नजरिया क्या है? क्या वह भारत की गुट निरपेक्ष विदेश नीति का समर्थक है? मतदाता को यह भी देखना होगा कि परिवारवाद और अधिनायकवाद का उस दल पर कितना प्रभाव है? इन चुनावों में उस दल ने परिवारवाद के आधार पर कितने टिकट बांटे हैं? उस दल में आंतरिक लोकतंत्र की क्या स्थिति है? क्या वह दल किसी एक व्यक्ति के इर्दगिर्द सिमट कर रह गया है? उस दल का क्षेत्रीय दलों के साथ संबंध कैसा रहा है? क्या वह क्षेत्रीय दलों की राज्य सरकारों के साथ सहयोग करता है? गठबंधन सरकार क्या उस दल के लिए कमजोरी और अनिर्णय का पर्याय है? क्या वह अपने दल के भीतर ताकतवर क्षेत्रीय नेताओं को सम्मान देता है?

सत्ता पक्ष और विपक्ष में रहकर उस दल की क्या भूमिका रही है? कहीं सत्ता पक्ष में रहने पर वह आत्ममुग्धता का शिकार तो नहीं हो जाता और कहीं विपक्ष में रहने पर वह नकारात्मकता से ग्रस्त तो नहीं हो जाता? कमोबेश इन्हीं आधारों पर क्षेत्रीय दलों का भी आकलन किया जा सकता है। केवल यह अतिरिक्त ध्यान मतदाता को रखना होगा कि जिस क्षेत्रीय दल का वह समर्थन कर रहा है वह क्षेत्रीय हितों की बात करते करते कहीं पृथकतावाद को तो बढ़ावा देने की कोशिश नहीं कर रहा है। 

मतदाता के लिए योग्य प्रत्याशी और दल का चयन अत्यंत सरल है क्योंकि सच्चे व्यक्ति और सच्चाई पर आधारित विचारधारा को पहचानना और उसका साथ देना हमेशा बहुत आसान और सुकून देने वाला होता है। यदि मतदाता, प्रत्याशी और दल के गुण दोषों पर विचार करते करते थक जाएं तो हास्यपूर्ण (फूहड़ हास्य ही सही) मनोरंजन के लिए टीवी पर चल रहे चुनावी कार्यक्रमों का आनंद ले सकते हैं। इन कार्यक्रमों में चल रही निरर्थक, नाटकीय और नकारात्मक बहसों का यही सर्वश्रेष्ठ उपयोग होगा।

(डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।) 








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Umesh Chandola :: - 04-19-2019
enagrik.com ( ताजा अंक 16 से 30 अप्रैल 2019, पेज 10, सभी लोक सभा प्रत्याशियो के नाम खुला पत्र ) आपमें से कोई भाजपा का प्रत्याशी है तो कोई कांग्रेस का, कोई सपा-बसपा, इनेलो अथवा आम आदमी पार्टी के टिकट पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा है तो कोई निर्दलीय ही अपनी ताल ठोंक रहा है। हमारे सवाल चुनावी समर में मौजूद आप सभी लोकसभा प्रत्याशियों से है- -स्थाई प्रकृति के कामों पर ठेका प्रथा गैर कानूनी है। इसके बावजूद देशी-विदेशी, छोटी-बड़ी सभी फैक्टरियों में यह धड़ल्ले से जारी है। सभी जगह ठेका प्रथा के तहत बहुत कम वेतन पर मजदूरों को खटाया जा रहा है। क्या आपने कभी ठेका प्रथा को खत्म किये जाने की मांग की है? क्या आपने कभी समान काम का समान वेतन दिये जाने की मांग की? -पूंजीपति श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करते हैं। इस कारण औद्योगिक दुर्घटनायें बढ़ती जा रही हैं। इनमें बड़ी संख्या में मजदूरों की मौतें हो रही हैं। सरकार भी मान रही है कि औद्योगिक दुर्घटनाओं में प्रतिदिन 3 मजदूरों की मौत एवं 47 अपाहिज हो रहे हैं, हालांकि वास्तविक स्थिति कहीं ज्यादा भयावह है। क्या आपने कभी पूंजीपतियों की मुनाफे की हवस के कारण होने वाली मजदूरों की इन मौतों पर पूंजीपतियों पर हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की? -मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में श्रम कानूनों में एक के बाद एक कई मजदूर विरोधी बदलाव किये हैं। आज नीम परियोजना के तहत ट्रेनिंग के नाम पर बेहद सस्ते और अधिकारविहीन मजदूर पूंजीपतियों को उपलब्ध करवाये जा रहे हैं। साथ ही फिक्स टर्म एम्प्लॉयमेण्ट (थ्ज्म्) का कानून बनाकर स्थाई रोजगार पर सीधे-सीधे हमला बोल दिया गया है। क्या आपने श्रम कानूनों में किये जा रहे इन मजदूर विरोधी बदलावों का कभी कोई विरोध किया है।  -एक बार सांसद-विधायक बनने पर आपको ताउम्र मोटी पेंशन मिलती है। इसके बरक्स व्यापक मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए बुढ़ापे की सामाजिक सुरक्षा की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। 2004 से सरकार ने पुरानी पेंशन स्कीम से भी कर्मचारियों एवं अर्द्धसैन्यबलों को वंचित कर दिया। क्या आपने कभी सभी मजदूरों-कर्मचारियों एवं अर्द्ध सैन्यबलों हेतु समुचित पेंशन की व्यवस्था की जाने की मांग की ताकि हम अपना बुढ़ापा सम्मान से जी सकें? -यूनियन बनाना मजदूरों का कानूनी-संवैधानिक अधिकार है। लेकिन मजदूर जैसे ही अपने अधिकार को हासिल करने की कोशिश करते हैं, उनके साथ अपराधियों सरीखा व्यवहार किया जाता है। पूंजीपति उन्हें नौकरी से निकाल देते हैं, पुलिस लाठियां भांजती है, गुण्डे हमला करते हैं और अंततः मजदूरों पर ही गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेलों में ठूंस दिया जाता है। प्रिकॉल (कोयम्बटूर) से लेकर मारुति-सुजुकी (मानेसर) और डाइकिन (नीमराणा) तक मजदूर दमन के ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं। क्या आपने कभी यूनियन बनाने के अपराध की सजा भुगत रहे इन मजदूरों को अविलंब जेल से रिहा करने की मांग की है? -हमारे देश में महिला मजदूरों के काम के हालात बेहद बुरे हैं। उन्हें पुरुष मजदूरों की तुलना में बहुत कम वेतन दिया जाता है। अक्सर कार्यस्थल पर प्रबंधकों के अभद्र व्यवहार यहां तक कि यौन उत्पीड़न का भी उन्हें सामना करना पड़ता है। क्या आपने कभी महिला मजदूरों को पुरुष मजदूरों के बराबर वेतन दिये जाने एवं उनके मान-सम्मान और सुरक्षा को सुनिश्चित किये जाने की मांग की? -उदारीकरण के पिछले करीब तीस सालों में शिक्षा-चिकित्सा जैसी बुनियादी सेवाओं को भी बाजार के हवाले किया जा चुका है। पांच सितारा स्कूल एवं अस्पताल उदारीकृत भारत के नए लूट के अड्डे हैं। निजीकरण की नीतियों ने शिक्षा चिकित्सा की सरकारी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। क्या आपने कभी शिक्षा चिकित्सा के निजीकरण पर रोक लगा सभी को एक समान और निःशुल्क शिक्षा एवं चिकित्सकीय सुविधा दिये जाने की मांग की? -उदारीकरण के पिछले करीब 30 वर्षों में सभी सरकारें देश की अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के दरवाजे विदेशी साम्राज्यवादी पूंजी हेतु खोलती चली गयी हैं। देश में अंधराष्ट्रवादी उन्माद फैलाने वाली वर्तमान मोदी सरकार इसमें सबसे आगे रही है। क्या आपने कभी सरकारों को उनके इन देश विरोधी कृत्यों पर कटघरे में खड़ा किया? -उदारीकरण के पिछले लगभग तीस सालों में देश में कई लाख किसान कर्ज जाल में फंस कर आत्महत्या कर चुके हैं। जो सबका पेट पालता है आज वही राजधानी में सड़कों पर प्रदर्शन कर अपने लिए रोटी मांग रहा है। सरकार किसानों के प्रदर्शनों-आंदोलनों का निर्ममतापूर्वक दमन कर रही है। उदारीकरण की नीतियों के परिणामस्वरूप गरीब किसान तबाह-बर्बाद हो रहे हैं, जबकि पूंजीवादी फार्मर मालामाल हो रहे हैं। क्या आपने कभी उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की इन पूंजीपरस्त नीतियों को रद्द करने की मांग की।  -साम्प्रदायिक फासिस्ट ताकतें पूरे समाज में जहर घोल रही हैं। इजारेदार पूंजीपति वर्ग और उसके द्वारा संचालित मीडिया इनका भरपूर सहयोग कर रहा है। क्या आपने कभी राजनीति में धर्म के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की मांग की? क्या आपने कभी मीडिया के कारपोरेट चरित्र पर सवाल खड़ा किया,     हमारे सवालों की सूची इतनी लम्बी है कि कागज कम पड़ जायेंगे। देश को आजाद हुए 70 साल से अधिक हो चुके हैं। लेकिन हम मजदूर मेहनतकश जनता के जीवन के हालात आज भी गुलामी के बने हुए हैं। हमें भरमाने के लिए देश के संविधान में दर्ज कर दिया गया कि भारत एक समाजवादी गणतंत्र है। लेकिन असयिलत में पूंजीवादी शोषण की चक्की में पीस दिया। सरकारें इस पूंजीवादी निजाम को चलाने का यंत्र बन गयीं।      देशी-विदेशी पूंजी के गठजोड़ के परिणाम स्वरूप लागू हुयी उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के तहत तो मजदूर-मेहनतकश जनता पर पूंजीपति वर्ग के हमले कहीं अधिक बढ़ गये हैं। इन जनविरोधी नीतियो में अमीर और गरीब के बीच की खाई को भयानक रूप से बढ़ा दिया है। पिछले 30-40 सालों में आज सबसे अधिक बेरोजगारी है। एक तरफ सरकार हमें राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रही है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हमारा खून-पसीना निचोड़ रही हैं।      कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ही इजारेदार पूंजीपतियों की पार्टियां हैं। भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता अरुण शौरी के शब्दों में ‘‘कांग्रेस और भाजपा में फर्क सिर्फ गाय का है।’’ बाकी राजनीतिक पार्टियां सपा, बसपा, इनेलो, आम आदमी पार्टी इत्यादि कांग्रेस-भाजपा के ही छोटे भाई बंधु हैं। ये सभी वोट लेने हम मजदूर मेहनतकश जनता के पास आते हैं, लेकिन शासन अंबानी-अदानी का चलाते हैं। लेकिन इस धोखाधड़ी को हम अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे। जो कोई लोक सभा प्रत्याशी हमारे बीच वोट मांगने आयेगा उसे हमारे सवालों का जवाब देना होगा। हम सभी मजदूर मेहनतकशों का आह्वान करते हैं कि चाहे किसी भी पार्टी का प्रत्याशी आपके बीच आये उससे उक्त सवाल अवश्य करें। इन टोपी वाले बगुलों के जनविरोधी चरित्र को बेनकाब कर दें।      हम मजदूर हैं और हम भली-भांति जानते हैं कि प्रकृति के बाद उत्पादक श्रम ही सभी तरह की संपदा का स्रोत हैं। उत्पादक श्रम हम मजदूर मेहनतकश करते हैं, लेकिन हम ही गरीबी-कंगाली, भूख-बीमारी आदि अधिकारविहीनता का जीवन जीने को मजबूर हैं। इन हालातों को अब हम चुपचाप नहीं सहेंगे। हम इस शोषणकारी पूंजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर समाजवादी व्यवस्था कायम करने के क्रांतिकारी संघर्ष को पुरजोर तरीके से आगे बढ़ायेंगे। मजदूर वर्ग की मुक्ति स्वयं मजदूर वर्ग का कार्य है। -बेलसोनिका ऑटो कम्पोनेंट इण्डिया इम्प्लॉयज यूनियन (रजि. 1983) प्रधान अतुल कुमार Labels:enagrik.com ( ताजा अंक 16 से 30 अप्रैल 2019, पेज 10, सभी लोक सभा प्रत्याशियो के नाम खुला पत्र ) आपमें से कोई भाजपा का प्रत्याशी है तो कोई कांग्रेस का, कोई सपा-बसपा, इनेलो अथवा आम आदमी पार्टी के टिकट पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा है तो कोई निर्दलीय ही अपनी ताल ठोंक रहा है। हमारे सवाल चुनावी समर में मौजूद आप सभी लोकसभा प्रत्याशियों से है- -स्थाई प्रकृति के कामों पर ठेका प्रथा गैर कानूनी है। इसके बावजूद देशी-विदेशी, छोटी-बड़ी सभी फैक्टरियों में यह धड़ल्ले से जारी है। सभी जगह ठेका प्रथा के तहत बहुत कम वेतन पर मजदूरों को खटाया जा रहा है। क्या आपने कभी ठेका प्रथा को खत्म किये जाने की मांग की है? क्या आपने कभी समान काम का समान वेतन दिये जाने की मांग की? -पूंजीपति श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करते हैं। इस कारण औद्योगिक दुर्घटनायें बढ़ती जा रही हैं। इनमें बड़ी संख्या में मजदूरों की मौतें हो रही हैं। सरकार भी मान रही है कि औद्योगिक दुर्घटनाओं में प्रतिदिन 3 मजदूरों की मौत एवं 47 अपाहिज हो रहे हैं, हालांकि वास्तविक स्थिति कहीं ज्यादा भयावह है। क्या आपने कभी पूंजीपतियों की मुनाफे की हवस के कारण होने वाली मजदूरों की इन मौतों पर पूंजीपतियों पर हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की? -मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में श्रम कानूनों में एक के बाद एक कई मजदूर विरोधी बदलाव किये हैं। आज नीम परियोजना के तहत ट्रेनिंग के नाम पर बेहद सस्ते और अधिकारविहीन मजदूर पूंजीपतियों को उपलब्ध करवाये जा रहे हैं। साथ ही फिक्स टर्म एम्प्लॉयमेण्ट (थ्ज्म्) का कानून बनाकर स्थाई रोजगार पर सीधे-सीधे हमला बोल दिया गया है। क्या आपने श्रम कानूनों में किये जा रहे इन मजदूर विरोधी बदलावों का कभी कोई विरोध किया है।  -एक बार सांसद-विधायक बनने पर आपको ताउम्र मोटी पेंशन मिलती है। इसके बरक्स व्यापक मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए बुढ़ापे की सामाजिक सुरक्षा की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। 2004 से सरकार ने पुरानी पेंशन स्कीम से भी कर्मचारियों एवं अर्द्धसैन्यबलों को वंचित कर दिया। क्या आपने कभी सभी मजदूरों-कर्मचारियों एवं अर्द्ध सैन्यबलों हेतु समुचित पेंशन की व्यवस्था की जाने की मांग की ताकि हम अपना बुढ़ापा सम्मान से जी सकें? -यूनियन बनाना मजदूरों का कानूनी-संवैधानिक अधिकार है। लेकिन मजदूर जैसे ही अपने अधिकार को हासिल करने की कोशिश करते हैं, उनके साथ अपराधियों सरीखा व्यवहार किया जाता है। पूंजीपति उन्हें नौकरी से निकाल देते हैं, पुलिस लाठियां भांजती है, गुण्डे हमला करते हैं और अंततः मजदूरों पर ही गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेलों में ठूंस दिया जाता है। प्रिकॉल (कोयम्बटूर) से लेकर मारुति-सुजुकी (मानेसर) और डाइकिन (नीमराणा) तक मजदूर दमन के ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं। क्या आपने कभी यूनियन बनाने के अपराध की सजा भुगत रहे इन मजदूरों को अविलंब जेल से रिहा करने की मांग की है? -हमारे देश में महिला मजदूरों के काम के हालात बेहद बुरे हैं। उन्हें पुरुष मजदूरों की तुलना में बहुत कम वेतन दिया जाता है। अक्सर कार्यस्थल पर प्रबंधकों के अभद्र व्यवहार यहां तक कि यौन उत्पीड़न का भी उन्हें सामना करना पड़ता है। क्या आपने कभी महिला मजदूरों को पुरुष मजदूरों के बराबर वेतन दिये जाने एवं उनके मान-सम्मान और सुरक्षा को सुनिश्चित किये जाने की मांग की? -उदारीकरण के पिछले करीब तीस सालों में शिक्षा-चिकित्सा जैसी बुनियादी सेवाओं को भी बाजार के हवाले किया जा चुका है। पांच सितारा स्कूल एवं अस्पताल उदारीकृत भारत के नए लूट के अड्डे हैं। निजीकरण की नीतियों ने शिक्षा चिकित्सा की सरकारी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। क्या आपने कभी शिक्षा चिकित्सा के निजीकरण पर रोक लगा सभी को एक समान और निःशुल्क शिक्षा एवं चिकित्सकीय सुविधा दिये जाने की मांग की? -उदारीकरण के पिछले करीब 30 वर्षों में सभी सरकारें देश की अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के दरवाजे विदेशी साम्राज्यवादी पूंजी हेतु खोलती चली गयी हैं। देश में अंधराष्ट्रवादी उन्माद फैलाने वाली वर्तमान मोदी सरकार इसमें सबसे आगे रही है। क्या आपने कभी सरकारों को उनके इन देश विरोधी कृत्यों पर कटघरे में खड़ा किया? -उदारीकरण के पिछले लगभग तीस सालों में देश में कई लाख किसान कर्ज जाल में फंस कर आत्महत्या कर चुके हैं। जो सबका पेट पालता है आज वही राजधानी में सड़कों पर प्रदर्शन कर अपने लिए रोटी मांग रहा है। सरकार किसानों के प्रदर्शनों-आंदोलनों का निर्ममतापूर्वक दमन कर रही है। उदारीकरण की नीतियों के परिणामस्वरूप गरीब किसान तबाह-बर्बाद हो रहे हैं, जबकि पूंजीवादी फार्मर मालामाल हो रहे हैं। क्या आपने कभी उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की इन पूंजीपरस्त नीतियों को रद्द करने की मांग की।  -साम्प्रदायिक फासिस्ट ताकतें पूरे समाज में जहर घोल रही हैं। इजारेदार पूंजीपति वर्ग और उसके द्वारा संचालित मीडिया इनका भरपूर सहयोग कर रहा है। क्या आपने कभी राजनीति में धर्म के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की मांग की? क्या आपने कभी मीडिया के कारपोरेट चरित्र पर सवाल खड़ा किया,     हमारे सवालों की सूची इतनी लम्बी है कि कागज कम पड़ जायेंगे। देश को आजाद हुए 70 साल से अधिक हो चुके हैं। लेकिन हम मजदूर मेहनतकश जनता के जीवन के हालात आज भी गुलामी के बने हुए हैं। हमें भरमाने के लिए देश के संविधान में दर्ज कर दिया गया कि भारत एक समाजवादी गणतंत्र है। लेकिन असयिलत में पूंजीवादी शोषण की चक्की में पीस दिया। सरकारें इस पूंजीवादी निजाम को चलाने का यंत्र बन गयीं।      देशी-विदेशी पूंजी के गठजोड़ के परिणाम स्वरूप लागू हुयी उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के तहत तो मजदूर-मेहनतकश जनता पर पूंजीपति वर्ग के हमले कहीं अधिक बढ़ गये हैं। इन जनविरोधी नीतियो में अमीर और गरीब के बीच की खाई को भयानक रूप से बढ़ा दिया है। पिछले 30-40 सालों में आज सबसे अधिक बेरोजगारी है। एक तरफ सरकार हमें राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ा रही है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हमारा खून-पसीना निचोड़ रही हैं।      कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ही इजारेदार पूंजीपतियों की पार्टियां हैं। भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता अरुण शौरी के शब्दों में ‘‘कांग्रेस और भाजपा में फर्क सिर्फ गाय का है।’’ बाकी राजनीतिक पार्टियां सपा, बसपा, इनेलो, आम आदमी पार्टी इत्यादि कांग्रेस-भाजपा के ही छोटे भाई बंधु हैं। ये सभी वोट लेने हम मजदूर मेहनतकश जनता के पास आते हैं, लेकिन शासन अंबानी-अदानी का चलाते हैं। लेकिन इस धोखाधड़ी को हम अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे। जो कोई लोक सभा प्रत्याशी हमारे बीच वोट मांगने आयेगा उसे हमारे सवालों का जवाब देना होगा। हम सभी मजदूर मेहनतकशों का आह्वान करते हैं कि चाहे किसी भी पार्टी का प्रत्याशी आपके बीच आये उससे उक्त सवाल अवश्य करें। इन टोपी वाले बगुलों के जनविरोधी चरित्र को बेनकाब कर दें।      हम मजदूर हैं और हम भली-भांति जानते हैं कि प्रकृति के बाद उत्पादक श्रम ही सभी तरह की संपदा का स्रोत हैं। उत्पादक श्रम हम मजदूर मेहनतकश करते हैं, लेकिन हम ही गरीबी-कंगाली, भूख-बीमारी आदि अधिकारविहीनता का जीवन जीने को मजबूर हैं। इन हालातों को अब हम चुपचाप नहीं सहेंगे। हम इस शोषणकारी पूंजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर समाजवादी व्यवस्था कायम करने के क्रांतिकारी संघर्ष को पुरजोर तरीके से आगे बढ़ायेंगे। मजदूर वर्ग की मुक्ति स्वयं मजदूर वर्ग का कार्य है। -बेलसोनिका ऑटो कम्पोनेंट इण्डिया इम्प्लॉयज यूनियन (रजि. 1983) प्रधान अतुल कुमार Labels:

Umesh Chandola :: - 04-19-2019
कामरेड कन्हैया से प्रार्थना है कि यहाँ दिये सवालों को सारे भारत के प्रत्याशियों के सामने रखें। खुद भी ये शपथ लें । शर्तिया सारी वामपंथी पार्टिया जीतेगी। भाजपा हारेगी । ठेका प्रथा हटाने की बात ही काफी है। enagrik.com , अंक 16 से 30 अप्रैल 2019, पेज 10, लोक सभा के प्रत्याशियों के नाम खुला पत्र ( कई सवालों के साथ)

Umesh Chandola :: - 04-19-2019
(आदर्श चुनावी माग पत्र हेतु देखें प्र. लो. का घोषणा पत्र )....pachhas1998.blogspot.com/साहित्य / प्रगतिशील लोकमंच का घोषणा पत्र, आ.चु. और राजनीतिक दल, आम चुनाव और साम्प्रदायिकता , पूंजीवादी लोक. बनाम समाजवादी लो.तंत्र

Umesh Chandola :: - 04-19-2019
2019 का खास चुनाव और जेएनयू....देश में दशकों से अन्याय के खिलाफ कोई सशक्ततम स्वर किसी विवि का रहा है तो वह जेएनयू है।बात चाहे मजदूरों किसानों छात्रों आदिवासियों की हो या महिलाओ ,दलितों, अल्पसंख्यकों की हो। या अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में अमेरिकी साम्राज्यवाद के समक्ष नतमस्तक होने की जो 1947 से आज तक बदस्तूर जारी है। इसी कारण जेएनयू के ऊपर हमले की नागपुर में योजना बनी जिस का सबूत आर्गनाइजर एवं पांचजन्य मे तीन महीने पहले छपा लेख है।अन्यथा तो 9 फरवरी 2016 जैसे कार्यक्रम तो जेएनयू मे आम हैं। यूँ समझ सकते हैं कि संविधान के मौलिक अधिकारों के वास्तविक परीक्षण की प्रयोगशाला ! आखिर आक्सफोर्ड विवि की नौकरी में लात मारकर जेएनयू में प्रोफेसरी करने वाले शिक्षाविदों और शहीद भगत सिंह के भानजे और HSRA के शोधकर्ता जगमोहन सिंह जैसे लोगों का छात्रों के साथ आना क्या दिखा रहा था ? मूर्खता और दुष्टता की साक्षात मूर्ति , घोर प्रतिक्रियावादी आर एस एस ,भाजपा ने आखिर अनजान लडके कन्हैया को रातोंरात स्टार बना दिया । इसी कारण आज बेगूसराय देश की हाट सीट बन गई है। गुजरात से जिग्नेश मेवाणी , तीस्ता सीतलवाड़ ,कश्मीर से जेएनयू छात्रसंघ की शैहला राशिद ,पंजाब की मशहूर युद्ध विरोधी छात्रा गुरुमेहर कौर और तमाम बुद्धिजीवियों ने बेगुसराय मे डेरा डाल दिया है ।इसके साथ ही जेएनयू भी कहीं न कहीं मशहूर हो गया है।लेकिन तस्वीर का एक और पहल भी है। हजारों करोड़ रुपयों के सरकारी खर्च पर मीडिया को 4 साल से मोदीमय कर दिया गया है। इसी क्रम में जेएनयू की " टुकड़े टुकड़े गैंग " के रूप में ब्रान्डिग मे बडी मेहनत की गई है। आज इसी बात को एक मौके मे बदला जा सकता है। क्यों न जेएनयू के छात्रों व प्रोफेसर जयति घोष , उत्सा पटनायक जैसे मशहूर अर्थशास्त्रीयो , अन्य समाजशास्त्रीयो द्वारा एक जनकल्याणकारी चुनाव का घोषणा पत्र लिखा जाये ? कार्यक्रम मे अवैध ठेका प्रथा के खिलाफ और समान कार्य के समान वेतन देने, 1990 से लागू नई आर्थिक नीतियों के उलटे जाने, स्वास्थ्य शिक्षा के निजीकरण पर रोक जैसी मांग की जा सकती हैं। विधायिका, कार्यपालिका ( PCS ,IAS ,IPS ,IFS अधिकारीगण यानि असली सरकार ) नहीं न्यायपालिका मे भी सोवियत रूस के समान चुनाव और वापस लाने की व्यवस्था हो । उपरोक्त कदमों से जेएनयू भारत का सबसे मजबूत, सबसे विश्वसनीय, सबसे ज्यादा देशभक्त समाज, प्रतिपक्ष बनेगा । बेशक तब पूरे कार्पोरेट मीडिया को सांप सूंघ जाने वाला है। कोई बात नहीं सोशल मीडिया, यू ट्यूब तो है ही। 2019 का खास चुनाव और जेएनयू....देश में दशकों से अन्याय के खिलाफ कोई सशक्ततम स्वर किसी विवि का रहा है तो वह जेएनयू है।बात चाहे मजदूरों किसानों छात्रों आदिवासियों की हो या महिलाओ ,दलितों, अल्पसंख्यकों की हो। या अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में अमेरिकी साम्राज्यवाद के समक्ष नतमस्तक होने की जो 1947 से आज तक बदस्तूर जारी है। इसी कारण जेएनयू के ऊपर हमले की नागपुर में योजना बनी जिस का सबूत आर्गनाइजर एवं पांचजन्य मे तीन महीने पहले छपा लेख है।अन्यथा तो 9 फरवरी 2016 जैसे कार्यक्रम तो जेएनयू मे आम हैं। यूँ समझ सकते हैं कि संविधान के मौलिक अधिकारों के वास्तविक परीक्षण की प्रयोगशाला ! आखिर आक्सफोर्ड विवि की नौकरी में लात मारकर जेएनयू में प्रोफेसरी करने वाले शिक्षाविदों और शहीद भगत सिंह के भानजे और HSRA के शोधकर्ता जगमोहन सिंह जैसे लोगों का छात्रों के साथ आना क्या दिखा रहा था ? मूर्खता और दुष्टता की साक्षात मूर्ति , घोर प्रतिक्रियावादी आर एस एस ,भाजपा ने आखिर अनजान लडके कन्हैया को रातोंरात स्टार बना दिया । इसी कारण आज बेगूसराय देश की हाट सीट बन गई है। गुजरात से जिग्नेश मेवाणी , तीस्ता सीतलवाड़ ,कश्मीर से जेएनयू छात्रसंघ की शैहला राशिद ,पंजाब की मशहूर युद्ध विरोधी छात्रा गुरुमेहर कौर और तमाम बुद्धिजीवियों ने बेगुसराय मे डेरा डाल दिया है ।इसके साथ ही जेएनयू भी कहीं न कहीं मशहूर हो गया है।लेकिन तस्वीर का एक और पहल भी है। हजारों करोड़ रुपयों के सरकारी खर्च पर मीडिया को 4 साल से मोदीमय कर दिया गया है। इसी क्रम में जेएनयू की " टुकड़े टुकड़े गैंग " के रूप में ब्रान्डिग मे बडी मेहनत की गई है। आज इसी बात को एक मौके मे बदला जा सकता है। क्यों न जेएनयू के छात्रों व प्रोफेसर जयति घोष , उत्सा पटनायक जैसे मशहूर अर्थशास्त्रीयो , अन्य समाजशास्त्रीयो द्वारा एक जनकल्याणकारी चुनाव का घोषणा पत्र लिखा जाये ? कार्यक्रम मे अवैध ठेका प्रथा के खिलाफ और समान कार्य के समान वेतन देने, 1990 से लागू नई आर्थिक नीतियों के उलटे जाने, स्वास्थ्य शिक्षा के निजीकरण पर रोक जैसी मांग की जा सकती हैं। विधायिका, कार्यपालिका ( PCS ,IAS ,IPS ,IFS अधिकारीगण यानि असली सरकार ) नहीं न्यायपालिका मे भी सोवियत रूस के समान चुनाव और वापस लाने की व्यवस्था हो । उपरोक्त कदमों से जेएनयू भारत का सबसे मजबूत, सबसे विश्वसनीय, सबसे ज्यादा देशभक्त समाज, प्रतिपक्ष बनेगा । बेशक तब पूरे कार्पोरेट मीडिया को सांप सूंघ जाने वाला है। कोई बात नहीं सोशल मीडिया, यू ट्यूब तो है ही।

Umesh Chandola :: - 04-19-2019
कन्हैया की माता एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय के 1990 के निर्णय के अनुसार न्यूनतम मजदूरी 26 हजार होती हैं। क्या बेगूसराय का बेटा, जैसा कन्हैया खुद को कहते हैं भारत की सारी आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को भी अपनी माता मानते हुए आंगनबाडी कार्यकत्रियों को 26000 दिलाने की शपथ लेने को तैयार हैं? या फिर सभी ठेका मजदूरों को ? या सरकारी एवं निजी क्षेत्र में जारी अवैध ठेका प्रथा की समाप्ति का एकसूत्री वादा ।अगर कन्हैया इसे आधार बनाकर 15 अगस्त 2019 का अल्टीमेटम दें और पूरे देश में आन्दोलन छेड़ दें तो अन्ना आन्दोलन भी बेहद बौना रह जायेगा । फिर चाहे वो सांसद बनें या नहीं कोई फर्क नही पड़ेगा । चाहते हैं तो आठ दस मुद्दे और जोडें । कन्हैया को कौन सत्ता का लालच है।