लेखक क्या करे?

फुटपाथ , विचार-विश्लेषण, रविवार , 22-07-2018


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अजय सिंह

वही पुराना सवाल, जो बरसों से पूछा जाता रहा है। लेखक क्या करे? उसे क्या करना चाहिए? उसी से जुड़े कुछ सवाल और। क्या दो लेखक एक-दूसरे पर भरोसा करतीं या करते हैं? (यहां स्त्री-पुरुष दोनों लेखक शामिल हैं।) क्या एक लेखक की कही हुई बात दूसरे लेखक को अंतरात्मा की आवाज़ लगती है या नयी कपट चाल लगती है? ख़ासकर हिंदी-उर्दू पट्टी में क्या कोई ऐसा लेखक है, जिसकी नैतिक सत्ता (Moral Authority) हो और जिसके कहे हुए को ध्यान से,  अदब से सुना जाये और फिर उस पर अमल किया जाये? क्या ऐसा कोई नेतृत्वकारी लेखक या लेखक समूह मौजूद है?

 

क्या तीनों वाम लेखक संगठन मिलकर, या अलग-अलग, कोई ऐसी नयी साहित्यिक–वैचारिक बहस, नया आंदोलन, नयी रचनात्मक ऊर्जा पैदा कर पाये हैं, जो लेखक के सृजनकर्म को नयी ऊंचाई पर ले जाये और उसे रेडिकल नैतिक बल से लैस करे? क्यों लेखक संगठनों का असर व प्राधिकार लगातार कम होता जा रहा है और क्यों वे छोटे-छोटे आत्मकेंद्रित मठों में तब्दील हो रहे हैं?

 

इसी तरह के कई सवाल, जो जटिल और उलझे हुए हैं, और जिनका दो-टूक जवाब मुश्किल है। हाल के वर्षों में लेखकों के बीच आपसी निश्छल व्यवहार और दोस्ताना माहौल में बहुत गिरावट आयी है, जेनुइन आलोचना के लिए जगह लगातार कम हुयी है और आत्म प्रचार व आत्म प्रशंसा ने आत्म वंचना का रूप ले लिया है। फिर भी, सवाल तो रह जाता है : लेखक क्या करे?

यहां जब `लेखक’ शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो उसमें कवि-कहानीकार-उपन्यासकार-नाटककार-गद्यकार-आलोचक-संस्मरणलेखक-जीवनीकार-आत्मकथा लेखक-यात्रावृतांत लेखक-डायरी लेखक, आदि शामिल हैं। यानी, वे सब, जो साहित्य की किसी-न-किसी विधा से जुड़े हैं और लिखे व छपे हुए शब्दों (प्रिंट) के माध्यम से अपने विचार व भावनाएं दूसरों तक पहुंचाते हैं। यह नोट करना ज़रूरी है कि हाल के दिनों में साहित्य व साहित्यकार की परिभाषा व दायरे को विस्तृत कर दिया गया है। अब पियानो/गिटार पर अपना लिखा गीत गाने वाले व कोई किताब न छपाने वाले गायक और लोगों से बातचीत या इंटरव्यू के आधार पर आख्यानमूलक रिपोर्ट लिखने वाले पत्रकार को भी साहित्यकार का दरज़ा दे दिया गया है। ऐसे लोगों को साहित्य का नोबल पुरस्कार भी दिया जाने लगा है।

 

कुछ संदर्भों के हवाले से हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि लेखक को क्या करना चाहिए। 1980 के दशक में कवि बल्ली सिंह चीमा का लिखा एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। वह गीत था :

`तय करो किस ओर हो तुम

तय करो किस ओर हो

आदमी के पक्ष में हो

या कि आदमखोर हो।’

वाम-प्रगतिशील लेखकों, कवियों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों की मीटिंगों व जलसों में यह गीत बराबर गाया जाता था। यह गीत सरकार-विरोधी रैलियों व जुलूसों का अनिवार्य हिस्सा बन गया था। इस गीत ने एक प्रकार से घोषणा कर दी थी कि लेखक को क्या करना चाहिए और उसे किसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए।

इसी के आसपास कवि रघुवीर सहाय ने अपनी एक कविता में परेशान करने वाला एक सवाल पूछा था :

`क्या लेखक भी

हत्यारों के साझीदार हुए?’

 

संदर्भ आपातकाल के दिनों (1975-77) का था, जब कई लेखक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही व निरंकुशता के समर्थक बन गये थे। कवि श्रीकांत वर्मा तो खुल्लमखुल्ला इंदिरा गांधी के सिपहसलाहकार ही बन गये थे। यह कविता एक प्रकार से चेतावनी है कि लेखक भी हत्यारे के साथ, जाने-अनजाने, खड़ा हो सकता है। सिर्फ लेखक होना काफ़ी नहीं है। यह जानना कहीं ज़्यादा जरूरी है कि लेखक ने जो राह चुनी है, वह कहां और किसके पक्ष में जा रही है। एक लेखक की दृष्टि व विचारधारा क्या है, इससे उसके जीवन और रचना संसार की दिशा तय होती है।

जब आज के दौर की महत्वपूर्ण कहानीकार किरन सिंह अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बात करते हुये कहती हैं कि `मेरी कहानियां, सामंती सोच वाले समाज से, मेरा रचनात्मक प्रतिशोध है’, तब लेखक की भूमिका निस्पृह या तटस्थ नहीं रह जाती। हो भी नहीं सकती। वर्गों में बंटे और अथाह पाखंड व अथाह बर्बरता में रचे-बसे समाज में लेखक तटस्थ कैसे रह सकता है ! उसे तो आमूलचूल परिवर्तनकारी ताक़तों का पक्षपोक्षक बनना होगा। किरन सिंह यह भी कहती हैं कि मेरी कहानियों की नायिकाएं विकटतम परिस्थितियों में भी न हारेंगी, न मरेंगी, वे डरेंगी पर वे लड़ेंगी। यह लेखक की तरफ से एक तरह से खुली लड़ाई का उद्घोष है। लेकिन रचना व लेखन के स्तर पर, और बीच-बीच में सड़क पर उतरकर भी। जब कवि नागार्जुन अपनी एक कविता में कहते हैं, `प्रतिहिंसा ही मेरे कवि का स्थायी भाव है’, तब वे भी शायद इसी `रचनात्मक प्रतिशोध ’ की बात करते हैं।  

 

इस साल फ़रवरी में जब दिल्ली में साहित्य अकादमी पुरस्कार वितरण समारोह हो रहा था, तब साहित्य अकादमी पुरस्कार-2017 से नवाज़े गये मलयाली लेखक केपी रामाउमन्नी ने पुरस्कार में मिली एक लाख रुपये की राशि सायरा बेगम को दे दी। उन्होंने इस मौक़े पर हरियाणा से खासतौर से सायरा बेगम को दिल्ली बुलवाया और कार्यक्रम स्थल पर ही उनके नाम एक लाख रुपये का चेक दे दिया। सायरा बेगम जुनैद की मां हैं। 14-15 साल के प्यारे बच्चे जुनैद को पिछले साल गाय आतंकवादियों और नफ़रत की संस्कृति का कारोबार चलाने वालों ने रेलगाड़ी में मार डाला था, जब वह ईद की ख़रीदारी कर दिल्ली से हरियाणा अपने गांव लौट रहा था। उसकी हत्या सिर्फ़ इस आधार पर कर दी गयी कि वह मुसलमान था।

 

इस मौक़े पर केपी रामाउमन्नी ने कहा कि ऐसा करके मैं नरेंद्र मोदी-अमित शाह की नीतियों के प्रति, जिन्होंने देश पर कहर बरपा कर रखा है, अपना कड़ा प्रतिवाद दर्ज़ कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व फ़ासीवादी ताकतों ने देश में जो तबाही मचा रखी है, उसका मैं पूरी ताक़त से अपनी कलम से प्रतिरोध करता रहूंगा। सायरा बेगम को सम्मानित करना उसी प्रतिरोध का हिस्सा है।

केपी रामाउमन्नी साहब, बहुत सही कहा आपने ! बस यहां यह जोड़ दिया जाये, और शायद आप भी कहना चाह रहे होंगे, कि लेखक को सड़क पर भी उतरकर अपना प्रतिरोध जताना होगा। क्योंकि वास्तविक लड़ाई तो सड़क पर ही लड़ी जानी है। लेकिन कलम पर लेखक की पकड़ मज़बूत बनी रहनी चाहिए, क्योंकि उसका असली हथियार यही है। तभी कल्पनाशीलता और रचनाशीलता प्रतिरोध के नये, बहुरंगी आख्यान रच पायेगी। हिंदुत्व फ़ासीवादी बहुसंख्यक सांस्कृतिक आतंकवाद का मुक़ाबला करना बहुत ज़रूरी है।

(लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। आप लखनऊ में रहते हैं।)

 




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Anjali Deshpande :: - 07-23-2018
बहुत ही महत्वपूर्ण लेख। सचमुच अपने संकीर्ण हितों को किनारे रख कर लेखक संगठनों के सामूहिक रूप से जनहित में सक्रियता की सलहत ज़रुरत है। और केवल कलाम की नहीं, सड़क पर संघर्षग्रत आम लोगों के साथ कदम से कदम मिलाने की ज़रुरत है। अंततः साहित्य वाही होता है जो व्यवस्था की ज़्यादतियों के खिलाफ उत्पीड़ितों के हक़ में हो और हक़ की हिफाज़त शब्द से भी होनी चाहिए, कर्म से भी।