देश का ‘बैरोमीटर’ जंतर-मंतर

आंदोलन , , बृहस्पतिवार , 16-03-2017


Jantar Mantar

उपेंद्र चौधरी

यंत्र का अपभ्रंश यानी जंतर और मंत्र का अपभ्रंश अर्थात मंतर। यंत्र और मंत्र या जंतर तथा मंतर दोनों ही भारतीय परिवेश के बेहद आम शब्द हैं। इन शब्दों के इस्तेमाल की सीमा रूढ़ नहीं है। ये आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और यहां तक कि राजनीतिक क्षेत्रों की संकल्पनाओं,घटनाओं और उसकी व्याख्या में धड़ल्ले से उपयोग किये जाते हैं। जंतर को सिस्टम की तरह देखा जाता है और मंतर को सॉफ्टवेयर की तरह। यही कारण है कि मध्यकाल के आख़िरी दौर में जब दुनियाभर में तो वैज्ञानिकवाद आधुनिकता की करवट ले रहा था, लेकिन भारत की गति इस वैज्ञानिकवाद से पीछा छुड़ाने वाली थी। चकित करने वाली बात है कि इसी दौर में भारत में ही एक राजा ऐसा हुआ,जो न सिर्फ़ अपनी रियासत को एक व्यवस्था दे रहा था,बल्कि उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी तर्कवाद के लिए एक नई उम्मीद जगा रहा था। राजा थे,सवाई जय सिंह द्वितीय और उनका वैज्ञानिक निर्माण था; वेधशालाएं। जय सिंह ने देशभर में ऐसी पांच वेधशालाएं बनवायी थीं; जयपुर, उज्जैन, मथुरा, वाराणसी और दिल्ली। ध्यान देने वाली बात है कि इन पांचों जगहों में से चार जगह तो धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाली हैं, लेकिन एक जगह ऐसी थी जो शुद्ध रूप से राष्ट्रीय राजनीतिक का केन्द्र थी। दिल्ली में जो वेधशाला है, उसका निर्माण सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में करवाया था। ख़ास बात यह है कि इतिहासकार इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि दिल्ली स्थित जंतर मंतर की वेधशाला समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है। भारत के चार धार्मिक और सांस्कृतिक नगरों में वेधशाला का महत्व इसलिए समझ में आता है कि इन वेधशालाओं से तिथि, समय और मुहूर्त के निर्धारण में सहायता मिलती थी और जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में आने वाले तीर्थयात्रियों को अपने अनुष्ठानों को शुरू करने और उन्हें पूरा करने में मदद मिलती थी। लेकिन दिल्ली में इस वेधशाला की ज़रूरत क्यों पड़ गयी। बताया जाता है कि बेहद कमज़ोर शासक मोहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल में ग्रहों की स्थिति को लेकर हिन्दू और मुसलमान खगोलशास्त्रियों के बीच लम्बी बहस छिड़ गयी। इस बहस का कोई अंत नज़र नहीं आ रहा था, ऐसे में इसका एक ही हल हो सकता था कि प्रकृति की गुत्थी को कोई व्यक्ति नहीं बल्कि वैज्ञानिक संरचना सुलझाये ताकि हिन्दू-मुसलमान के नज़रिये से नहीं प्राकृतिक और वैज्ञानिक नज़रियों से खगोल की घटना को देखा-परखा जा सके और उसी दृष्टिकोण से निष्कर्ष भी निकाला जा सके। इसी शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम था,दिल्ली की वेधशाला। यह वेधशाला इतनी महत्वपूर्ण हो गयी कि जिस इलाक़े में यह स्थित है,उस इलाक़े का नाम ही जंतर-मतर पड़ गया। जंतर मंतर स्थित वेधशाला में ग्रहों की गति को मापने के लिये अनेक तरह के उपकरण लगाये गये हैं, इन यंत्रों में जो सबसे बड़ा यंत्र है, वह सम्राट के नाम से जाना जाता है। इसी सम्राट नामक यंत्र से समय तथा ग्रहों की सटीक जानकारियां उपलब्ध होती हैं। साल का सबसे छोटा दिन और सबसे बड़ा दिन को नापने के लिये यहां जो यंत्र लगा हुआ है,वह मिस्र कहलाता है और खगोलीय पिंडों की गति किस समय क्या है,इस बात की जानकारियां रामयंत्र और जयप्रकाश यंत्र देते हैं।

मगर ऐसा नहीं कि दिल्ली स्थित जंतर मंतर अपनी वेधशाला के माध्यम से सिर्फ़ ग्रहों तथा खगोलीय पिंडों की नब्ज़ के बारे में ही जानकारियां उपलब्ध कराता है। सच तो यह है कि जंतर मंतर देश के हालात, संकटों तथा राजनीतिक उथल-पुथल और मुद्दों की नब्ज़ के साथ भी दिन-रात धड़कता रहता है। देशभर से आये परेशान,असंतुष्ट और  संकटों से घिरे नागरिक, धर्म और राजनीति से जुड़े लोग एवं संगठन तथा संस्थाएं अपनी-अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिये यहां सालोंभर इकट्ठा होते रहते हैं। यहां धरना-प्रदर्शन और जुलूसों का सिलसिला अनवरत रहता है। कई लोग और संगठन तो यहां अपना बसेरा सालों से बनाये हुए हैं, क्योंकि अभी तक किसी सरकार ने न तो उनकी मांगों पर ग़ौर किया है या फिर आश्वासन दिये जाने के बावजूद उनकी मांगें नहीं मानी गई हैं। सही अर्थों में जंतर मंतर एक ऐसी जगह है,जिसे देश का बैरोमीटर कहा जा सकता है। यही कारण है कि ख़बरों की ताक में रहने वाले मीडिया या पत्रकारों के लिये जंतर मंतर देश की धड़कनों का एक बैरोमीटर माना जाता है। इस बैरोमीटर से यह पता चलता है कि देश के किस कोने में कौन सी समस्या है।यही कारण है कि हर मीडिया हाउस से कम से कम एक पत्रकार इस जंतर-मंतर को कवर करने के लिये लगा दिया जाता है। पत्रकारों की एक फ़ौज यहां हर रोज़ आती है,खबरें बनाती हैं और लगभग हर रोज़ जंतर मंतर से जुड़ी ख़बरें अख़वारों,टीवी,रेडियो या वेब पोर्टल में अपनी जगह बनाती हैं।

जंतर मंतर देश की राजधानी में है,इसके आस-पास संसद है,राष्ट्रपति भवन है और प्रधानमंत्री कार्यालय है। लिहाज़ा उनकी आवाज़ को उन लोगों तक पहुंचने का भरोसा होता है, जो देश की व्यवस्था के नीति नियंता हैं। उन्हें लगता है कि उनकी समस्या को जंतर मंतर एक स्वर देता है,गति देता है और ऐसी जुंबिश देता है,जिसे नीति नियंता सुन सके, महसूस कर सके। जंतर-मंतर पर आने वाला हर कोई अपना ज्ञापन प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंप देता है और वहां से एक औपचारिक आश्वासन दे दिया जाता है। लेकिन आम तौर पर यह आश्वासन सिर्फ़ आश्वासन ही रह जाता है।बहुत कम ऐसा होता है कि इन आश्वासनों पर कोई कार्रवाई भी होती है।

कई बार तो सुदूर इलाक़ों या प्रदेशों में संघर्ष कर रहे लोग या संगठन अपनी बातों को कहते-कहते जब थक जाते हैं,तो एक नयी उम्मीद के साथ वो जंतर मंतर का रूख़ करते हैं। यहां वो अपनी बातों को मीडिया द्वारा पूरे देश तक पहुंचाने में कई बार सफल होते हैं, तो अनेक बार असफल भी होते हैं। चूंकि यहां अख़वार,रेडियो,टेलीविज़न और वेब पोर्टल की तरफ़ से आने वाले पत्रकारों की संख्या बड़ी होती है और प्रदर्शनकारियों को ये लगता है कि वो  सीधे-सीधे अपनी बात मीडिया के ज़रिये पूरे देश तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं, तो अपनी गंभीरता को दिखाने के लिये कई बार वो ऐसी चीज़ों या प्रतीकों के साथ भी प्रदर्शन करते हैं,जो संवेदना को झकझोरने वाली होती हैं।


जंतर-मंतर पर होने वाले ऐसे ही प्रदर्शनों में आजकल तमिलनाडु के त्रिची से आने वाले परेशान-ख़स्ताहाल उन किसानों का प्रदर्शन हैं, जो जंतर मंतर सिर्फ़ इस ख़्याल से आये हैं कि सरकार उन्हें मरने से बचा लें। उनके पास ज़मीन तो हैं,लेकिन वो पानी की घोर कमी के कारण खेतीबाड़ी के लायक नहीं हैं। उन्होंने पशु,फ़सल तथा खेतीबाड़ी में इस्तेमाल होने वाले मशीनों पर विभिन्न तरह के ऋण लिये हैं,लेकिन आजीविका का एकमात्र साधन खेतीबाड़ी के तबाह हो जाने के कारण उनके सामने खाने पीने के लाले पड़े हैं, ऐसे में वह उन ऋणों को चुकाने के लिए सोच भी नहीं पाते हैं। ऐसे में वो अपने 253 किसान साथियों के साथ उघड़े बदन धरना दे रहे हैं। उनके साथ कुछ महिला किसान हैं, जिनके बदन पर उतने ही कपड़े हैं,जिससे उनकी लाज बच सके।उनके बीच एक ऐसा बूढ़ा किसान भी है,जिसकी गले में नरमुंडों की माला है। इस नरमुंड माला में उनके कुछ ऐसे किसान साथियों के नरमुंड भी हैं, जो कभी इनके साथ खेतीबाड़ी में हाथ बंटाया करते थे। ये वो किसान थे,जो अपने ऊपर के ऋण और ऋण वसूली के लिये आते बैंककर्मियों की घुड़क और उस घुड़क से रोज़-रोज़ होती बेचैनी को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बेबसी में आख़िरकार आत्महत्या कर ली। धरना-प्रदर्शन कर रहे इन किसानों के बीच से आगे आकर उनका एक साथी कहता है-हर जगह गुहार लगा-लगाकर थक चुके हैं,अब और बर्दाश्त नहीं होता,अगर ऋण नहीं छूटा तो जान छोड़ देंगे,लेकिन जंतर-मंतर से वापस नहीं जायेंगे






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?????? ?? :: - 03-29-2017
बढिया शुरुआत। शुभकामनाएं।

????????? ????? ???? ??? :: - 03-20-2017
काफी मेहनत की है लेखक ने....सूचनाये काफी हैं..