1857 से 2017 : ‘आज़ादी’ आज भी एक ख़तरनाक़ शब्द है!

विशेष , , बुधवार , 10-05-2017


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मुकुल सरल

हम क्या मांगें... आज़ादी। हम लेके रहेंगे... आज़ादी। आज़ादी का यह नारा आज भी उतना ही ख़तरनाक़ है जितना शायद 1857 में रहा होगा। आज़ादी की बात आज भी उतनी ही मुश्किल है जितनी शायद सन् 47 तक रही होगी। 

दिल्ली में छात्रों के एक आंदोलन के दौरान ली गई तस्वीर फोटो : मुकुल सरल

आज़ादी शब्द अपने आप में इतना ज़्यादा ख़तरनाक़ है कि इसे बोलने का मतलब है गुनाह, सज़ा, क़ैद, गुलामी, ज़ंजीरे। इसे महसूस करने का मतलब है बगावत। चाहे वह अंग्रेजों के खिलाफ हो या अपने समय-समाज के विरुद्ध। यही सोच, यही डर इंकलाब और क्रांति शब्द को लेकर है।

आज़ादी : कल और आज

हम आज यह सब बात क्यों कर रहे हैं। आज दस मई है। दस मई याद है न हिन्दुस्तान की आज़ादी की पहली लड़ाई। जिसे अंग्रेजों ने गदर या विद्रोह कहा। लेकिन यह न गदर था, न विप्लव, न सैनिक विद्रोह बल्कि यह आम जनता की लड़ाई थी, किसानों का आंदोलन था। लेकिन उस समय भी आज़ादी शब्द बोलना या चाहना गुनाह था, आज भी है।

तभी तो जब छात्र यह नारा लगाते हैं कि हम क्या चाहें आज़ादी...हम लड़के लेंगे आज़ादी तो उन्हें देशद्रोही कहा जाता है। ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेज कहते थे। आज़ादी मतलब अंग्रेज राज से बगावत, राजद्रोह।  

दिल्ली में छात्रों के एक आंदोलन के दौरान ली गई तस्वीर फोटो : मुकुल सरल

हमें चाहिए आज़ादी!

सत्ता और सत्ता समर्थक पूछते हैं कि अब किससे आज़ादी, कैसी आज़ादी, लेकिन वह भूल जाते हैं कि हमारे शहीदे-आज़म भगत सिंह क्या कह गए हैं। उन्होंने कहा है कि आज़ादी का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि गोरे अंग्रेजों चले जाएं और उनकी जगह भूरे अंग्रेज ले लें। इससे कुछ नहीं बदलेगा। आज़ादी का मतलब है....आम आदमी के जीवन में परिवर्तन लाना। उन्हें आज़ादी का एहसास कराना। आज़ादी का मतलब होगा देश की संपत्ति और संसाधनों को आम आदमी के हित में ख़र्च करना। गरीबों और मज़दूरों की चेतना को जगाना होगा और उन्हें देश के विकास में बराबर का  हिस्सेदार बनाना होगा।

साफ है कि आज़ादी का मतलब सिर्फ़ अंग्रेजों से आज़ादी नहीं था, न उस समय, न इस समय। बल्कि इसका मतलब इस जात-पात से, इस ऊंच-नीच से आज़ादी था। गैरबराबरी से आज़ादी था, नाइंसाफी से आज़ादी था।

दिल्ली में छात्रों के एक आंदोलन के दौरान ली गई तस्वीर फोटो : मुकुल सरल

आज़ादी का अर्थ

कश्मीरी, सेना से आज़ादी चाहते हैं, पूर्वोत्तर के राज्य अफस्पा से आज़ादी चाहते हैं, आदिवासी पूंजीपतियों की लूट से आज़ादी चाहते हैं। एक महिला पितृसत्ता से, पुरुषवाद से आज़ादी चाहती है। एक युवा अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी चाहता है, एक छात्र पढ़ाई की आज़ादी चाहता है। एक किसान अपनी ज़मीन पर खेती की आज़ादी चाहता है, एक जवान अपनी बात कहने की आज़ादी चाहता है। तो क्या ग़लत चाहता है। लेकिन इस सबको ग़लत बना दिया गया है और शोर है सिर्फ़ देश...देश का। ऐसे लोग देश या राष्ट्र की बात करते हैं जिन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए कुछ नहीं किया, कभी कोई कुर्बानी नहीं दी। जिन्होंने अंग्रेजों की मुखबिरी की, वही आज दूसरों को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं।

यह तो जायज मांगें हैं, महात्मा गांधी ने तो यहां तक कहा था कि आज़ादी का कोई मतलब नहीं अगर उसमें ग़लती करने की आज़ादी शामिल न हो। लेकिन आज हाल यह है कि एक बयान या राय के लिए एक छात्र या छात्रा तक की सोशल मीडिया पर ट्रॉलिंग की जाती है। उसे गालियां दी जाती हैं, उसका चरित्र हनन किया जाता है, हत्या और बलात्कार तक की धमकियां दी जाती हैं और यह सब देश और देशभक्ति के नाम पर होता है।

दिल्ली में छात्रों के एक आंदोलन के दौरान ली गई तस्वीर फोटो : मुकुल सरल

'आज़ादी' शब्द से ही डर

पिछले दिनों तो एक दिलचस्प बात देखने को मिली। आरएसएस के संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने तो दिल्ली विश्वविद्यालय में आज़ादी शब्द से ही आज़ादी की मांग की। उन्होंने पोस्टर लगाए कि उर्दू से ही आज़ादी मिलनी चाहिए, लेकिन वहां भी उन्होंने आज़ादी शब्द का ही प्रयोग किया, जो इत्तेफाक से उर्दू का ही लफ़्ज़ है। 

10 मई का सबक़

तो आज़ादी शब्द को लेकर हमारे देश में इतनी संकीर्णता, इतना डर होता जा रहा है जो आज से पहले कभी देखने को नहीं मिली। सत्ताधारी इस शब्द को लेकर इस क़दर बौखला रहे हैं कि पूछते हैं कि इन युवाओं को कौन बहका रहा है। लेकिन वह यह समझने को तैयार नहीं कि यह शब्द केवल एक शब्द नहीं बल्कि हमारी विरासत है, हमारी चेतना है जिसकी वजह से यह देश है, जिसकी वजह से वह आज सत्ता में हैं। इसलिए इस शब्द को, इस भावना को बचाना ज़रूरी है, इस एहसास, इस चेतना को आगे बढ़ाना ज़रूरी है और यह काम आज़ादी की तीसरी लड़ाई से कम नहीं है। यही आज 10 मई का सबक़ है। 






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