आधे से ज्यादा आस्ट्रेलिया अडानी और उनके प्रोजेक्ट के खिलाफ

आंदोलन , , रविवार , 08-10-2017


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गिरीश मालवीय

भारत के कारोबारी अडानी समूह के ख़िलाफ़ ऑस्ट्रेलिया में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। अडानी समूह ऑस्ट्रेलिया में कोयला खदान शुरू करना चाहता है, ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरणविदों को अपने देश के पर्यावरण की चिंता है उनका मानना है कि कोल के उत्पादन से पूरे विश्व मे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी और कोल माइनिंग के चलते ग्रेट बेरियर रीफ के पास करीब 11 लाख घन मीटर कटाई होगी। 60 साल तक वहां से हर वर्ष 6 करोड़ टन कोयले का एक्सपोर्ट होगा। ढुलाई के लिए जहाज उस इलाके में आते-जाते रहेंगे। इससे रीफ और समुद्री जीवों को नुकसान होगा 2,300 किमी लंबे इस ईको-सिस्टम में हजारों रीफ (चट्‌टानें) और सैकड़ों आईलैंड हैं। यहां 600 तरह के सख्त और मुलायम कोरल (मूंगा) पाए जाते हैं। यहां रंगीन मछलियों, सीप, स्टारफिश, कछुओं, डॉल्फिन और शार्क की हजारों किस्में भी पाई जाती हैं ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय मीडिया ने दावा किया है कि आधे से ज़्यादा ऑस्ट्रेलियाई नागरिक इस खदान के विरोध में आ गए हैं। 

ऐसे ही प्रश्न भारत मे भी उठे थे जब मुंदरा पोर्ट के लिए सैकड़ों किलोमीटर की समुद्र तट की जमीन गुजरात सरकार ने अडानी समूह को कौड़ियों के भाव दे दी थी लेकिन भारत में पर्यावरण की चिंता करने को विकास का विरोध माना जाता है। मोदी जी ने अडानी समूह को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से करीब 6 हजार करोड़ रुपये का लोन भी इसी परियोजना के लिये दिलवाया है।

अडानी के खिलाफ आस्ट्रेलिया में प्रदर्शन।

लेकिन आस्ट्रेलिया का मीडिया भारत की तरह बिका हुआ नहीं है, ऑस्ट्रेलियाई समाचार संस्था एबीसी न्यूज के विशेष कार्यक्रम फोर कॉर्नर्स के तहत की गई पड़ताल के बाद ये दावा किया गया है कि ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में कई अहम परिसंपत्तियां दरअसल अडानी समूह की ही हैं। 

कुछ दिन पहले ब्रिटिश अखबार द गॉर्डियन  ने भी यह दावा किया था कि भारतीय कस्टम विभाग के डॉयरेक्टरेट ऑफ रेवन्यू इंटेलिजेंस (डीआरआई) ने अडानी समूह पर फर्जी बिल बनाकर करीब 1500 करोड़ रुपये टैक्स हैवेन देश में भेज दिया है। 

भारत की ईपीडब्ल्यू मैगजीन ने मात्र इतना ही कहा था कि  सरकार ने स्पेशल इकनोमिक जोन (एसईजेड) अधिनियम में बदलाव करके अडानी ग्रुप को 500 करोड़ रूपए का फायदा पहुँचाया है।  इस विवाद में अडानी ने ऐसा दबाव बनाया कि ईपीडब्ल्यू के संपादक को नौकरी से हाथ धोना पड़ा यानी साफ है कि भारत मे खोजी पत्रकारिता अपनी अंतिम सांसे गिन रही है और विदेशी पत्रकारों को भी ठीक से काम नहीं करने दिया जा रहा है।  

मोदी और अडानी।

एबीसी न्यूज के फोर कॉर्नर्स के पत्रकार स्टीफन लॉन्ग ने दावा किया था कि जब वो इस खोजी रिपोर्ट के दौरान पड़ताल के लिए गुजरात गये थे तो अगले ही दिन पुलिस उनके होटल पहुंच गयी थी इस घटना का वीडियो भी भारत के सोशल मीडिया में काफी वायरल हुआ था जिसमें स्टीफन ने बताया, “ हमसे क़रीब पांच घंटे तक पूछताछ की गई। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इस दौरान बार-बार मोबाइल पर बात करने के लिए कमरे से बाहर जाता था और लौटने पर उसका रुख और कड़ा हो जाता था। वे लोग अच्छी तरह जानते थे कि हम वहां क्यों आए हैं, लेकिन कोई भी ए (अडानी) शब्द मुंह से नहीं निकाल रहा था।

पत्रकार जोसी जोसेफ़ ने एक किताब लिखी है 'अ फीस्ट ऑफ वल्चर्स’ इस किताब में बिजनेस घराने किस तरह से भारत के लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं, उसका ब्योरा है। जोसेफ़ ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट की बनाई एसआईटी के सामने भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मामला अडानी ग्रुप का आया है। लेखक को प्रत्यर्पण निदेशालय के सूत्रों ने बताया है कि अगर सही जांच हो जाए तो अडानी समूह को 15 हज़ार करोड़ रुपये का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

लेकिन यहाँ किसी की हिम्मत नहीं है कि अडानी से सम्बंधित कोई जांच कर सके जबकि विनोद अडानी का नाम पनामा पेपर्स में भी आ चुका है।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)






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