अन्ना फिर देंगे दिल्ली में दस्तक

आंदोलन , नई दिल्ली , बुधवार , 30-08-2017


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अखिलेश अखिल

नई दिल्ली। समाज सेवी अन्ना हजारे फिर दिल्ली में दस्तक देने को तैयार हैं। लोकपाल के मसले पर सरकार को घरने के लिए हजारे अपने लोगों से बात कर रहे हैं और आंदोलन को सफल बनाने के लिए हर तरह की तैयारी करने में लगे हैं। हजारे को लग रहा है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए जिस लोकपाल की मांग की जा रही थी और जिसको लेकर कानून भी बनकर तैयार है लेकिन सरकार लोकपाल नियुक्त न कर लोकतंत्र के साथ धोखा कर रही है। अन्ना की समझ है कि जब तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं होती, देश के बड़े घोटालाबाज और भ्रष्टाचारी को दण्डित नहीं किया जा सकता। ऐसे में अब लोकपाल को लेकर सड़क पर उतरने की जरुरत है।

अन्ना ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जतायी नाराजगी

खबर मिल रही है कि अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बावत एक  पत्र लिखा है और लोकपाल की नियुक्ति नहीं होने पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि छह साल बाद भी भ्रष्टाचार को रोकने वाले एक भी कानून पर अमल नहीं हो पाया। हजारे का मानना है कि लोकपाल, लोकायुक्त की नियुक्ति करने वाले और संसद में प्रतीक्षित भ्रष्टाचार को रोकने वाले सभी सशक्त विधेयकों पर सरकार सुस्ती दिखा रही है। हजारे ने अपने पत्र में किसानों की समस्या को लेकर भी पीएम से नाराजगी दर्शायी है। उन्होंने कहा है कि किसानों की समस्याओं को लेकर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर भी अमल नहीं किया जा रहा है। प्रधानमन्त्री को लिखे पत्र के जबाब का इन्तजार अभी भी हजारे को है लेकिन जवाब नहीं मिलने से अब वे फिर से आंदोलन का रास्ता अख्तियार करने की तैयारी कर रहे हैं। 

गौरतलब है कि 2011में अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया था और सरकार के सामने कई मांगे रखी थी। उग्र आंदोलन को देखते हुए सत्तासीन कांग्रेस की सरकार भी परेशान हो गयी थी और विपक्ष में बैठी बीजेपी परोक्ष रूप से आंदोलन को हवा भी दे रही थी। इसके बाद 27 अगस्त 2011 के दिन भारतीय संसद में सेन्स ऑफ हाउससे रिज्युलेशन पास किया गया था। जिसमें केंद्र में लोकपाल, हर राज्यों में लोकायुक्त और सिटीजन चार्टर जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर जल्द से जल्द कानून बनाने का निर्णय किया गया था। इस निर्णय के बाद अन्ना का आंदोलन समाप्त हुआ था।

छह साल बाद भी निर्णय पर अमल नहीं

लेकिन 6 साल बीत जाने के बावजूद कोई भी बातें सामने नहीं आयीं और किसी भी निर्णय पर कोई अमल नहीं हो पाया है। अन्ना वर्तमान सरकार के रवैये से बेहद आहत महसूस कर रहे हैं। समाजसेवी हजारे को इस बात को लेकर ज्यादा ही तकलीफ हो रही है कि जिस समय संसद में आंदोलन की मांगों को लेकर कानून बन रहे थे उस समय विपक्ष में बीजेपी थी और सभी मांगों पर संसद में  बीजेपी का समर्थन भी था।  लेकिन जब बीजेपी की सरकार बन गयी और आज साढ़े तीन साल से ज्यादा सरकार चल भी गयी तो उन मांगों को लेकर या कानून को लेकर बीजेपी सरकार चुप्पी साधे बैठी है।

 

माना जा रहा है कि पिछले तीन सालों में कई बार अन्ना हजारे ने प्रधानमन्त्री को पत्र लिखा है। अपने हालिया पत्र में हजारे ने कहा है कि चूंकि बीजेपी की सरकार 2014 में भ्रष्टाचार विरोधी नारों के दम पर ही बनी। सरकार को कोई भी कानून बनाने के लिए वक्त की जरुरत होती है इसलिए सरकार को काफी समय भी दिया गया लेकिन सरकार की तरफ से लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर कोई पहल अब तक नहीं की गयी। पीएम ने अपने कार्यक्रम मन की बातमें इस मसले पर कभी कोई चर्चा की। उन्होंने पीएम को लिखा है कि सत्ता में आने से पहले आपने देश की जनता को भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के लिए प्राथमिकता देंगे, ऐसा आश्वासन दिया था। हैरानी की बात है कि, कानून में स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी आप 3 साल से लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं कर सके।  जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी आपकी सरकार को बार-बार फटकार लगाई है। जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां भी नये कानून के तहत लोकायुक्त नियुक्त नहीं किए गये हैं। इससे ये साफ है कि आप लोकपाल, लोकायुक्त कानून पर अमल करने के लिए इच्छा शक्ति नहीं दिखा रहे हैं।

परेशान किसान

स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट पर नहीं हुई कार्रवाई

अन्ना हजारे ने देश में लगातार किसानों की आत्म हत्या का भी जिक्र किया है। मौजूदा वक्त में खेती पैदावारी में किसानों को लागत पर आधारित दाम मिले इसलिए मैंने कई बार पत्र लिखा था, लेकिन आपकी तरफ से ना कोई जबाब आया ना स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट पर कार्रवाई हुई। पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगना, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में किसान संगठित होकर आंदोलन कर रहें हैं। देश के किसानों के दुख के प्रति आपके दिल में तीन साल में कोई संवेदना नहीं दिखायी दी ? जितनी चिन्ता कम्पनी मालिक और उद्योगपतियों के बारे में करते दिख रहे हैं उतनी चिन्ता किसानों के बारे में नही करते हैं। जबकि देश में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को पूरी तरह से अमल में लाना चाहिए था। हजारे ने अपने पत्र के माध्यम से कई बातों पर प्रधानमन्त्री का ध्यान खींचने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार ने वित्त विधेयक 2017 को धन विधेयक के रुप में राजनैतिक दलों को उद्योगपतियों द्वारा दिए जानेवाले चंदे की 7.5 प्रतिशत सीमा हटाई हैं। कम्पनी जितना चाहे उतना दान राजनीतिक दल को दे सकती है, ऐसा प्रावधान किया है।  जिससे लोकतंत्र नहीं बल्कि पार्टी तंत्र मजबूत होगा। राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की मांग जनता की ओर से कई सालों से हो रही है।  सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को इस बारे में स्पष्ट निर्देश दिए थे। अगर आप वास्तव में पारदर्शिता की अपेक्षा करते हैं तो राजनैतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने का संशोधन करना भी जरुरी है।   

  राइट टू रिजेक्ट, राइट टू रिकॉल

राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकॉल की मांग

अपने पत्र में अन्ना ने कहा है कि भ्रष्टाचार को रोकने तथा सही लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सत्ता का विकेंद्रीकरण जरुरी हैं। इसके लिए जल, जंगल और जमीन को लेकर ग्रामसभा को अधिकार देने वाला कानून बनाना जरुरी हैं। उसके साथ राइट टू रिजेक्ट, राइट टू रिकॉल और महिलाओं को हर स्तर पर कानून के तहत सम्मानजनक अधिकार देनेवाले कानून भी आवश्यक हैं। लोगों के हाथ में अधिकार देने से जनसंसद मजबूत होगी।

और अंत में हजारे ने साफ-साफ कह दिया है कि पिछले तीन साल से आपने हमारे किसी पत्र का जवाब नहीं दिया है इसलिए अब हमारे पास आंदोलन के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं रह जाता। अब दिल्ली में मैंने आंदोलन करने का निर्णय लिया है। जब तक उपरोक्त मुद्दों पर जनहित में सही निर्णय और अमल नहीं होता तब तक मेरा आंदोलन दिल्ली में जारी रहेगा। आंदोलन की तारीख जल्द ही घोषित कर दी जायेगी।

 

 






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