भाजपा समर्थक की छवि बनने से बेअसर हुए अन्ना हजारे

आंदोलन , , सोमवार , 04-02-2019


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चरण सिंह राजपूत

नई दिल्ली। 2011 में अन्ना आंदोलन की तुलना जेपी आंदोलन से की गई थी। देश के सारे सामाजसेवी-कार्यकर्ता एक मंच पर आ गए थे। लोग अपने खर्च पर रामलीला मैदान पहुंच रहे थे। देश में एक बदलाव का माहौल था। यह आंदोलन लोकपाल बनाने को लेकर था। 2019 में फिर से लोकपाल की नियुक्ति को लेकर अन्ना हजारे एक बार फिर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनके अनशन को चार दिन बीत चुके हैं। 2011 के आंदोलन और इस आंदोलन में धरती आसमान का अंतर है। उसमें हजारों लोग बिना स्वार्थ जुटे थे। तब देश ही नहीं विदेशों की मीडिया ने भी जबरदस्त कवरेज दी थी। तत्कालीन यूपीए सरकार हिल गई थी। लोकसभा में चर्चा होने लगी थी। हर कहीं अन्ना आंदोलन की चर्चा थी।

लेकिन इस बार अन्ना के साथ न तो जनता है और न ही मीडिया। सरकार का तो विचलित होने का मतलब ही नहीं बनता। ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों अन्ना का अनशन लोगों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहा है। इन सब बातों की वजह साफ है। अन्ना आंदोलन से लोगों ने बदलाव की उम्मीद की थी। लेकिन व्यवस्था का बदलाव हुआ नहीं। हां सत्ता का बदलाव जरूर हो गया। खुद उनके प्रिय शिष्य अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन को भुनाकर दिल्ली की सत्ता कब्जा ली। इतना ही नहीं इन्होंने भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं की।

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अरविंद केजरीवाल ने अन्ना के कई मंच शेयर किए पर अन्ना कुछ न कर पाए। यहां तक कि एक किसान धरने में आयोजकों के अरविंद केजरीवाल को मंच से उतारने के बावजूद उन्हें आगे से मंच पर चढ़ा लिया गया। 20 मिनट में केजरीवाल आयोजकों की मेहनत को लूट ले गए।यही हाल केंद्र में बनी मोदी सरकार का भी रहा। बाबा राम देव, सेनाध्यक्ष रहे वीके सिंह, और किरण बेदी जैसे लोग अन्ना आंदोलन में मुख्य भूमिका निभा रहे थे। अब किसी ने लोकपाल के गठन की बात नहीं की।

अन्ना हजारे के अनशन की तस्वीर

मोदी सरकार में मॉब लिंचिंग, दलित, किसान मजदूर उत्पीड़न के कितने मामले हुए। नोटबन्दी और जीएसटी में लोगों को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा। अन्ना हजारे केजरीवाल के खिलाफ तो कई बार बोले पर मोदी सरकार के खिलाफ उनका बोल नहीं निकला। ऐसा नहीं है कि लोग व्यवस्था परिवर्तन नहीं चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि लोग लोकपाल का गठन नहीं चाहते हैं। सब चाहते हैं पर अब लोगों को अन्ना हजारे पर विश्वास नहीं है। कोई दूसरा नायक चाहिए जो लोगों के उम्मीदों पर खरा उतरे। लोगों को लगता है कि अन्ना आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि सत्ता परिवर्तन के लिए हुआ था।

भाजपा ने बाबा राम देव को आगे कर यूपीए सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे का इस्तेमाल किया था। हां वह बात दूसरी है कि अरविंद केजरीवाल भी अपनी दूरदर्शिता के चलते इस आंदोलन का फायदा उठा ले गए। अब लोगों और मीडिया को ऐसा लगता है कि 2019 में मोदी सरकार की नाकामियों के चलते सत्ता परिवर्तन होते देख भाजपा के समर्थक संगठन फिर से अन्ना हजारे को ले आये हैं। क्योंकि अन्ना हजारे का चेहरा कांग्रेस विरोधी है। इसलिए इन लोगों को लगता है कि आंदोलन के बड़ा स्वरूप लेने के बाद भाजपा नहीं बल्कि कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनेगा। ये लोग भूल रहे हैं कि अब समय बदल चुका है। अन्ना की इमेज भाजपा एजेंट की बन गई है। यही वजह है कि उनका अनशन प्रभावशाली नहीं हो पा रहा है।

यह होती है जनता की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की दुर्गति। जो जनता आसमान पर पहुंचाती है वही जमीन पर भी ला पटकती है। दिल्ली जंतर मंतर पर अन्ना समर्थक एक दिन धरना करके रह गए। करते भी क्या। कोई आया ही नहीं। ये वही अन्ना हजारे हैं जो जब दिल्लीी में अनशन पर बैठे थे तो जनता के साथ ही मीडिया ने हाथोंहाथ लिया था।

उस समय अन्ना आंदोलन की तुलना जयप्रकाश आंदोलन से की गई थी। पर हुआ क्या। जयप्रकाश नारायण सत्ता परिवर्तन के लिए सड़कों पर उतरे थे और उन्होंने जनता पार्टी की सरकार बनवाकर अपना संकल्प पूरा कर दिखया। अन्ना हजारे व्यवस्था परिवर्तन के लिये सड़कों पर उतरे थे। क्या हुआ? देश में मोदी सरकार बनने के बाद चुप बैठ गए। ऐसा लग रहा था कि जैसे मोदी सरकार ने उन्हें पुरस्कृत कर घर बैठा दिया था। कितने युवा इस आंदोलन से कुछ अच्छा होने की उम्मीद पालकर नोकरी छोड़कर आंदोलन से जुड़ गए थे। सबको निराशा ही लगी। आंदोलन का फायदा अरविंद केजरीवाल टीम और भाजपा ने उठा लिया।

नरेंद्र मोदी ने न तो गुजरात का मुख्यमंत्री रहते वहां लोकायुक्त नियुक्त किया था और न ही प्रधानमंत्री बनने के बाद कोई इस तरह का प्रयास केंद्र में किया। अन्ना हजारे चुप्पी साधे बैठे रहे। अब जब जल्द ही लोकसभा चुनाव होने वाले हैं तो फिर से लोकपाल याद आने लगा है। मतलव आंदोलन अगली सरकार के लिए है। सोशल मीडिया पर भी 2011 और 2019 के अन्नाल के आंदोलन की तुलनाएं हो रही हैं। लोग अखबारों की कटिंग लगा लगाकर कार्यक्रमों की तुलना कर रहे हैं। जिन अखबारों के पन्ने अन्ना आंदोलन से भरे रहते थे वे अखबार अब कहीं सिंगल कालम में अन्ना हजारे को जगह दे रहे हैं। चैनलों का भी यही हाल है। मतलब समय बदल चुका है।










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