दूसरे परिसरों में भी बीएचयू जैसे हालात

आंदोलन , , बृहस्पतिवार , 28-09-2017


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जनचौक स्टाफ

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के बनारस हिंदू विश्विद्यालय (बीएचयू) में एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना के बाद इसी सप्ताह गुस्साए प्रदर्शनकारियों के एक समूह- जिसमें ज्यादातर छात्राएं थीं- की पुलिस के साथ भिड़ंत हो गयी।

"यूपी पुलिस शर्म करो", "योगी सरकार शर्म करो", हम अपना अधिकार मांगते, नहीं किसी से भीख मांगते" जैसे कुछ नारे थे जिनकी गूंज सोमवार को नई दिल्ली के यूपी भवन के बाहर सुनाई दी। इस मामले में एक हजार से ज्यादा छात्रों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।

एक तरफ जहां छात्राएं कैंपस के अंदर सुरक्षा के अधिकार की मांग कर रहीं थीं, वहीं कुलपति जीसी त्रिपाठी ने पूरे मामले में पीड़िता को ही दोषी बनाते हुए कहा कि उसे रात को बाहर नहीं घूमना चाहिए था। बीएचयू के हॉस्टल नियमों के मुताबिक रात 10 बजे के बाद मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। एक नियम यह भी है कि महिलाएं ह़ॉस्टेल में मांसाहारी भोजन नहीं कर सकतीं और न ही छोटे कपड़े और स्कर्ट्स पहन सकती हैं। यह भी बताया जा रहा है कि छात्रों से एक एफिडेविट पर हस्ताक्षर कराया जाता है कि वो किसी प्रकार के विरोध-प्रदर्शनों में शामिल नहीं होंगे। महिलाओं के लिए लाइब्रेरी जाने तक का समय निर्धारित किया गया है। वाइस चांसलर का मानना है कि रात में पढ़ने वाली लड़कियां चरित्रहीन होती हैं।

बीएचयू में छात्राओं पर लाठीचार्ज के खिलाफ प्रदर्शन।

हैरानी तो इस बात की है कि लड़कों के लिए ये नियम अलग हैं।

महिलाओं को भी सड़कों पर घूमने की आजादी हो, इसके लिए काम कर रही संस्था पिंजरा तोड़ की अगुवाई में यूपी भवन के बाहर प्रदर्शन किया गया। फेसबुक पर डाले गए उनकी एक पोस्ट के मुताबिक

महिलाओं ने शोषण के खिलाफ बहुत चुप्पी साध ली और बहुत हुआ यह कहना कि उन्हें सुरक्षा केवल पुरुषों के जरिए और चार दीवारी में बंद रह कर मिल सकती है। बीएचयू की छात्राओं ने यह साफ कर दिया है कि पिंजरे में बंद रहना हमारे हक में नहीं है बल्कि महिलाओं को कमजोर करना है। उन्होंने कहा है कि वह अब इन निराधार नियमों को नहीं मानेंगी जो विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक जगहों को उनके लिए अनुकूल बनाने की बजाय उन्हें उनसे अलग और अदृश्य कर दे।

महिलाओं को कमजोर बनाने वाले इस तरह के नियम केवल बीएचयू में ही नहीं हैं। महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर इस तरह के नियम भारत के कई कॉलेजों का एजेंडा रहे हैं। इस तरह के दमघोंटू नियमों को अक्सर सुरक्षा के नाम पर महिलाओँ को दबाने और चुप कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अदृश्यता अक्सर सुरक्षा के लिए एक विधि के रूप में निर्धारित की जाती है।

देश के नामी कॉलेजों के कुछ ऐसे ही नियम आप नीचे पढ़ सकते हैं:

बीएचयू में प्रदर्शन करती छात्राएं

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

अभी पिछले साल ही कॉलेज हॉस्टल के वार्डेन ने महज इसलिए छात्राओं को हॉस्टल में बंद कर दिया था क्योंकि वो शाम 6:30 बजे के कर्फ्यू टाइम के बाद बाहर रहना चाहती थीं।

एएमयू के हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों को केवल एक ही दिन कैंपस से बाहर रहने की इजाजत है- रविवार। यदि उन्हें बीच सप्ताह में छुट्टी चाहिए तो अभिभावकों द्वारा हस्ताक्षर किया गया फैक्स छुट्टी से पहले जमा करवाना अनिवार्य है।

महिलाओं के लिए तो कर्फ्यू टाइम शाम 6:30 बजे है, जबकि लड़कों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।

जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी

दिल्ली की मशहूर जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में महिलाओं के लिए यह डेडलाइन शाम 7:45 बजे है। जबकि पुरुष छात्र रात 10 बजे तक बाहर रह सकते हैं। जामिया के महिला हॉस्टलों में पीएचडी की छात्राओं तक को फील्ड वर्क के अलावा अनुपस्थित रहने की अनुमति नहीं है।

नियमों के मुताबिक फील्ड वर्क के लिए भी रिसर्च सुपरवाइजर की सिफारिश के जरिए छुट्टी की अर्जी देनी होगी और उस पर हेड और डिपार्टमेंट के डीन के हस्ताक्षर होने चाहिए। छुट्टियों के दौरान हॉस्टल से बाहर रहने या हॉस्टल से छुट्टी के लिए इसी प्रकार का आवेदन पत्र देना होगा।

फर्गुसन कॉलेज

पुणे के फर्गुसन कॉलेज में महिलाओं को अपने हॉस्टल में रात 8 बजे तक रिपोर्ट करना होता है और पुरुषों को रात 10 बजे तक। महिलाओं को रात 10 बजे के बाद मोबाइल फोन का इस्तेमाल वर्जित है।

कॉलेज के नियम "बहुत सभ्य" व्यवहार का आचरण करने को कहते हैं जिनमें वस्त्र भी शामिल हैं। असभ्य, अस्वाभाविक और अनुचित व्यवहार पर भी प्रतिबंध है। हालांकि, इन दस्तावेजों में नियम तोड़ने की सजा का जिक्र नहीं है और जब सजा की बात आती है तो छात्र वार्डन या अध्यक्ष की दया पर ही निर्भर करते हैं। यहां तक कि महिलाओं को हॉस्टल मेस में ही खाना अनिवार्य है, जबकि पुरुषों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।

एसआरसीसी

यहां भी महिलाओं के लिए रात 8 बजे और पुरुषों के लिए रात 10 बजे वाला नियम लागू होता है- इस मान्यता के आधार पर कि महिलाओं को सुरक्षा की जरूरत है जबकि पुरुषों को नहीं।

जहां लड़कियों के लिए "शिष्टाचार बनाए रखने" और स्टाफ के साथ "उचित व्यवहार" करने का पूरा खेल रचा गया है, वहीं लड़कों के अनुशासन और आचार संहिता में इस प्रकार के कोई निर्देश नहीं हैं।

मिरांडा हाउस

दिल्ली के मिरांडा हाउस में कोई 'लीव बुक' नाम की चीज रखी गई है। जब भी छात्राओं को रातभर रहना होता है, उन्हें अपने लोकल गार्जियन से उस लीव बुक पर हस्ताक्षर करवाने पड़ते हैं। अभिभावकों द्वारा फोन करवाना काफी नहीं है।

जबकि, अभिभावक ही अपनी बेटियों को बाहर जाने देने के लिए अधिकृत हैं। रात की छुट्टी महीने में केवल 6 दिन ही मिलती है। चाहे जामिया हो या फिर एसआरसीसी, रात की यह छुट्टियां अभिभावकों की अनुमति के बाद वीकेंड्स तक ही प्रतिबंधित हैं।

बीएचयू में प्रदर्शन करती छात्राएं

हिंदू कॉलेज

बीए इंग्लिश ऑनर्स की सेकेंड ईयर की छात्रा शीतल एनसी के मुताबिक, कागजों में दिल्ली के हिंदू कॉलेज में लड़के और लड़कियों के लिए नियम बराबर हैं, लड़कियों के हॉस्टल में रात 8 बजे की डेडलाइन का कड़ाई से पालन किया जाता है।

वह कहती हैं कि नियम एकपक्षीय हैं, क्योंकि लड़कों के हॉस्टल्स कई सालों से हैं जबकि लड़कियों के लिए हॉस्टल नए हैं और उनकी हॉस्टल कमेटी भी नहीं हैं जैसा कि डीयू और यूजीसी की गाइडलाइंस लड़कियों के हॉस्टल के नियम बनाने को कहती हैं।

हिंदू कॉलेज के इंग्लिश डिपार्टमेंट के प्रोफेसर, प्रेम विजयन कहते हैं कि ज्यादतर प्रशासनों का ऐसा करना मैं समझ सकता हूं, क्योंकि उन्हें छात्रों के मुकाबले अभिभावकों का सामना ज्यादा करना होता है।

विजयन कहते हैं, पीजी के छात्र भी अपनी जगह सही हैं जब वह कहते हैं उन्हें उनकी जिंदगी चलाने के लिए दूसरों की जरूरत नहीं है। कहानी के हमेशा दो पहलू होते हैं।

वह कहते हैं सबसे उचित होगा कि महिलाओं को हॉस्टल से बाहर रहने की इजाजत हो, लेकिन कैंपस के अंदर।

"छात्रों को सुरक्षित वातावरण दिया जाए, ज्यादातर छात्र खुश होंगे।"

लेडी श्रीराम कॉलेज

यहां हॉस्टल नियम बेहद साधारण हैं। हॉस्टल वार्डन और जर्नलिज्म की थर्ड ईयर की छात्रा सयनतनि मुस्तफी कहती हैं, हमारे यहां डीयू के बाकी कॉलेजों के मुकाबले, बेहतर स्थिति है। हमें हफ्ते में कई बार देर रात और रातभर बाहर रहने की अनुमति है।

हालांकि डेडलाइन शाम 7:30 बजे तक है लेकिन छात्राएं रात 10 बजे तक बाहर रह सकती हैं। मुस्तफी कहती हैं एक हॉस्टल कार्ड होता है जिस पर वार्डन के हस्ताक्षर चाहिए होते हैं, पर यह केवल रिकॉर्ड रखने के लिए है।

नाइट आउट के लिए केवल पहले साल छात्रों को लोकल गार्जियन की अनुमति जरूरी होती है, लेकिन दूसरे और तीसरे साल छात्रों को केवल वार्डन को बताकर जाना होता है। किसी अनुमति की जरूरत नहीं होती।

एलएसआर कहीं ज्यादा उदार है यहां तक कि ड्रेस कोड के मामले में भी। मुस्तफी बताती हैं, मैं हॉस्टल में रहती हूं और मुझे कहीं भी और कुछ भी पहनने की अनुमति है। हमें कभी हमारे कपड़ों के लिए नहीं टोका गया। मैं डीयू के दूसरे कॉलेजों में भी गई हूं, और मैंने अंतर देखा है।

बीएचयू में प्रदर्शन करती छात्राएं

आईआईएमसी- धेनकनाल

बीएचयू मामले की निंदा करते हुए आईआईएमसी- धेनकनाल की प्रोफेसर मृणाल चटर्जी कहते हैं कि हमारे यहां लड़के और लड़कियों के लिए एक ही टाइम निर्धारित है- 9:30 PM

वह कहते हैं कि कैंपसों को लड़के और लड़कियों दोनों के लिए सुरक्षित बनाया जाना चाहिए। हर वह कदम उठाने चाहिए जो छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हों। पूरी सुरक्षा और रोशनी होनी चाहिए।

महिलाओं की आजादी खत्म करने के बजाय स्वस्थ समाधान के लिए संभवत: कॉलेज प्रशासनों को पुरुष छात्रों को संवेदनशील बनाने का प्रयास करने पर विचार करना होगा और कैंपस की सुरक्षा बेहतर करनी होगी।

                                       साभार: हफिंगटन पोस्ट 

                                           अनुवाद: प्रीति चौहान प्रीति चौहान।

 






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