क्रांति के तीर्थस्थल पंचनदा पर महापंचायत

विरासत , , मंगलवार , 16-05-2017


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शाह आलम

1857 की क्रांति की शुरुआत भले ही मेरठ से हुई थी। लेकिन उत्तर भारत का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा हो जहां इसकी गूंज न सुनाई दी हो। चंबल तो वैसे भी अपनी बहादुरी के कारनामों और साहस के लिए जाना जाता है। ऐसे में भला ये क्षेत्र कैसे अछूता रह सकता था। देश के इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हजारों-हजार लोग शहीद हुए थे। उनमें से एक हिस्सा इस चंबल क्षेत्र से भी था। इन्हीं ज्ञात-अज्ञात शहीदों की याद में यहां 25 मई को एक कार्यक्रम आयोजित होने जा रहा है। चंबल संसद के नाम से रखे गए इस कार्यक्रम की अगुवाई सिनेकर्मी, यायावर और कभी न थकने वाले शाह आलम कर रहे हैं। इस मौके पर पेश होने वाले पर्चे को आप यहां पढ़ सकते हैं......

25 मई का दिन चंबल के इतिहास में बहुत अहम है। 1857 की जनक्रांति का हृदयस्थल पचनदा सामरिक और छापामार जंग की दृष्टि से सबसे अहम इलाका माना जाता रहा है। उसी दिन हजारों क्रांतिकारियों ने पचनदा पर इकट्ठा होकर इसे क्रांति का सबसे बड़ा केन्द्र बनाया और आज़ादी की पहली जंग का आगाज़ किया था। राष्ट्रीय स्तर का नेतृत्‍व इसी केन्द्र से 1872 तक लगातार अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ शंखनाद कर अंग्रेजों की नाक में दम करता रहा। यही वह जगह है जहां अंग्रेजों को क्रांतिवीरों की लाशों के ऊपर से गुजरना पड़ा। क्रांति की जितनी अच्छी तैयारी चंबल में थी, उतनी अच्छी देश में कहीं और दिखाई नहीं देती है। यहां की लड़ाका ताकतों के संयुक्त मोर्चा की ललकार के सामने अंग्रेजी सेना टिक ही नहीं पाती थी। खाली और आधा पेट लड़ रहे चंबल के बहादुर रणबांकुरों को न तो वेतन मिलता था और न ही पेंशन। आजादी की यह लड़ाई केवल जनता के सक्रिय सहयोग से चलती थी।

चंबल को नर्सरी ऑफ सोल्जर्स माना जाात है

चंबल को 'नर्सरी आफ सोल्जर्स' यानी सिपाहियों की नर्सरी कहा जाता है। 1857 के आजादी के पहले आंदोलन में जब पूरे देश में क्रांति के केन्द्र ध्‍वस्‍त कर दिये गये, हजारों शहादतें हुईं, हजारों महानायकों को कालापानी भेज दिया गया, उस वक्‍त देश भर के क्रांतिकारी चंबल की आगोश में खिंचे चले आये। इसीलिए यह धरती महान स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों का ट्रेनिंग सेंटर बन पायी। जननायक गंगा सिंह, रूप सिंह सेंगर, निरंजन सिंह चौहान, जंगली-मंगली बाल्मीकि, प्रीतम सिंह, बंकट सिंह कुशवाहा, चौधरी रामप्रसाद पाठक, गंधर्व सिंह, भैरवी, मुराद अली खां, काशीबाई, शेर अंदाज अली, चिमना जी, तेजाबाई, शेर अली नूरानी, चुन्नी लोधी, ताज खां, शिवप्रसाद, हर प्रसाद, मुक्खा, गेंदालाल दीक्षित, बागी सरदार लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी, राम प्रसाद बिस्मिल, भारतवीर मुकंदीलाल गुप्ता जैसे तमाम करिश्माई योद्धाओं के लिए चंबल की घाटी शरणस्थली बनी रही। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की फौज में सबसे ज्यादा सैनिक चम्बल घाटी से ही थे। यह घाटी फौज में आज भी अपने नौनिहालों को देश की रक्षा के लिए भेजती है।

जारी है शहादत का सिलसिला

1857 के बाद भी लगातार चंबल से इंकलाब का बिगुल बजता रहा। 1916 में बने उत्तर भारत के गुप्त क्रांतिकारी दल मातृवेदीकी सेन्ट्रल कमेटी में 40 क्रांतिकारी सदस्यों में से 30 चंबल के बागी ही शामिल थे। इस इलाके से देश में आजादी का बसंत लाने के लिए अनोखे प्रयोग निरंतर चलते रहे। दुनिया भर में सबसे ज्यादा लंबा चलने वाले आंदोलन में करीब सात लाख नौजवान अपना लहू देकर देश की मिट्टी को सुर्खरु कर गए। यहां के वीर रणबांकुरों ने चीनी मुक्ति संग्राम में भी अपनी आहुति दी, जो आज भी यहां के लोगों के स्मृतियों में कैद है।

उथल-पुथल भरी है बीहड़ों की जिंदगी

पचनदा में बहता पानी भले ही शांत, ठहरा और साफ-सुथरा दिखता हो लेकिन हकीकत यह है कि बीहड़ों में जिंदगी उतनी ही उथल-पुथल भरी है। एक साजिश के तहत हमेशा से चंबल क्षेत्र को डार्कजोन बना कर उपेक्षित रखा गया जबकि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान तक फैला यह विशाल बीहड़ क्रांतिकारियों की शरणस्थली के रूप में मशहूर रहा है। आज आजादी के 70 साल बाद भी क्रांतिकारियों के वारिसों को सत्‍ता के हाथों अपमान के अलावा और कुछ भी हाथ नहीं लगा है। आज सबसे बड़ा सवाल मुंह बाये खड़ा है कि सबसे ज्यादा कुर्बानी देने वाली यह सरजमीं इतनी उपेक्षित क्यों है? बात केवल सत्‍ता की नहीं है, जनता भी इसके लिए उतनी ही जिम्‍मेदार है। आज लोग चंबल के जननायकों के नाम तक नहीं जानते। जो लोग जाति और धर्म की दीवारों को तोड़ कर कंधे से कंधा मिलाकर अपनी जान की बाजी लगा रहे थे, खुद उनके वारिस उन्‍हें भुला चुके हैं।

25 मई के दिन 160 साल पहले हमारे लड़ाका पुरखों ने जो आवाज बुलंद की थी, आज हमें उसी रवायत को जिन्दा रखते हुए समाज की बेहतरी के लिए अपने मजबूत हाथों से मशाल थामनी होगी। आज फिर उन दस्तावेजों पर पड़े जालों को साफ करके साझी विरासत के प्रतीकों को आत्मसात करने की जरूरत आन पड़ी है। अपने लड़ाका पुरखों को याद करने का इससे बेहतर मौका और नहीं हो सकता। 






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