मौत के कगार पर बोकारो का चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन

विशेष , बोकारो, सोमवार , 24-07-2017


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विशद कुमार

बोकारो। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में हाल के दिनों में उत्पादन और कार्य क्षमता में गिरावट दिखाकर जिस तरह से उन्हें बंद करने की साजिशें की जा रही हैं। उससे एक बात बिल्कुल साफ है कि केंद्र सरकार निजीकरण के एजेंडे पर कूद पड़ी है। झारखंड के बोकारो में स्थित चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन (सीटीपीएस) इसका सटीक उदाहरण है। इस प्लांट की दो यूनिटें बंद की जा चुकी हैं और अब तीसरी की बारी है। 

दो यूनिटों के बंद होने से प्लांट के कामगारों की बेरोजगारी अब चौतरफा मार कर रही है। उनके सड़क पर आने के चलते आस-पास के व्यवसायिक संस्थानों और छोटे कारोबारियों पर भी उसका बड़ा असर पड़ा है। नतीजतन उनके सहारे चलने वाले परिवारों के लिए रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

1948 में हुई थी डीवीसी की स्थापना 

आजादी के बाद अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी की तर्ज पर 7 जुलाई 1948 को दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) की स्थापना हुई थी। जिसकी मूल अवधारणा थी बाढ़ की त्रासदी से बचाव। साथ ही नदी पर जगह-जगह बांध बनाकर उसके बहाव की गति को कम करके पानी के प्रवाह से विद्युत उत्पादन करना। ये काम शुरू हुआ और उसका नतीजा भी निकला। तमाम बुरे हालातों के बाद भी आज थर्मल और हाइडिल की 30 यूनिटों से 7787 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। मगर डीवीसी प्रबंधन दिन-रात यह रोना रोता रहता है कि उत्पादित बिजली के खरीदार नहीं होने के कारण डीवीसी उत्पादन आधा करने पर मजबूर है। साथ ही उसका कहना है कि वर्षों पुरानी यूनिटों में पुरानी टेक्नालॉजी होने की वजह से उत्पादन लागत भी बहुत ज्यादा हो गयी है। इसलिए उसका कहना है कि कुछ यूनिट बंद की जाएंगी। 

दो यूनिटें बंद, तीसरी की तैयारी

इसी तर्क की बिना पर चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन की दो यूनिटों को बंद कर दिया गया है। जबकि तीसरी यूनिट को बंद करने की योजना पर काम हो रहा है। सूत्रों की मानें तो नवंबर तक उसे भी बंद कर दिया जाएगा। चंद्रपुरा की तीन यूनिट में लगभग 2500 मजदूर हैं, जिसमें स्थायी मजदूर लगभग 1000, सप्लाई मजदूर 380 तथा एआरसी यानी एनुअल रेट कान्ट्रैक्ट पर 700 एंव एएमसी यानी एनुअल मेंटेनेन्स कान्ट्रैक्ट लगभग पर 400 मजदूर हैं। बताते चलें की स्थाई मजदूरों को कंपनी एक्ट के तमाम प्रावधानों के तहत वेतन एंव अन्य सुविधाएं हासिल हैं। जबकि सप्लाई मजदूर का वेतन 7 दिसंबर 2011 को हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत डीवीसी के ग्रुप डी के बेसिक वेतन से 50 रुपये कम है। साथ ही उन्हें महंगाई भत्ता भी नहीं मिलता। 

जबकि उनके अवकाश की आयु सीमा 60 साल है। वैसे सप्लाई मजदूर शुद्ध ठेका मजदूर हैं, मगर उनका वेतन डीवीसी देता है और वे अपने कार्यकाल में कई ठेकेदारों के अंदर काम करते रहते हैं। एआरसी और एएमसी दोनों ठेकेदार के अंदर दैनिक मजदूर होते हैं। एआरसी को मजदूरी ठेकेदार देता है जो एक सामान्य मजदूर को मिलने वाली राशि से भी कम होती है। कंपनी किसी काम का ठेका ठेकेदार को देती है जो काम पर आधारित होता है और उसी पैसे में ठेकेदार द्वारा मजदूरों को मजदूरी को दिया जाता हैं। जबकि एएमसी में कम्पनी ठेकेदार को मजदूरों की संख्या के हिसाब से न्यूनतम मजदूरी की दर पर पैसा देती है।

सभा करते कंपनी कर्मचारी और मजदूर।

सैकड़ों मजदूरों की छटनी 

दो यूनिट बंद होने के बाद 85 मजदूर पिछले छह महीने से पूरी तरह बेरोजगार हो गये हैं और उनके परिवार वालों को रोटी के लाले पड़ गए हैं। 

मुहम्मद अजहरूद्दीन 12 साल से ठेका मजदूरी पर थे लेकिन उन्हें फरवरी 2017 में हटा दिया गया। अशोक राणा भी इन्हीं में से एक हैं जो 2006 से यहां ठेका मजदूर थे और आज बेराजगार हो गए हैं।

संजय कुमार गंझू बताते हैं  कि 2012 से 35 मजदूर केवल गेटपास की सुविधा के तहत कंपनी में काम कर रहे हैं, उन्हें जनवरी 2017 में बैठा दिया गया था। मगर मजदूर संगठन समिति ने मजदूरों को आंदोलित किया तो उन्हें अब 15-15 दिन का काम दिया जा रहा है, इन्हें प्लांट के भीतर कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है, ठेकेदार उनसे मनमानी तरीके से काम करवाता है। आनन्द महतो का कहना है कि “ठेकेदार अंग्रेजों की तरह हमारे श्रम का शोषण करता है, उसके वाईसी नहीं बनवाने के चलते मजदूरों का पीएफ नहीं कट पा रहा है”।

मनमाने तरीके से हो रहा है काम 

वहीं सरफराज आलम बताते हैं कि मजदूरों के वेतन की कोई निर्धारित तिथि नहीं है। मजदूरों की छंटनी का कोई नियम नहीं है। छंटनी का कोई पैनल लिस्ट नहीं है। सब मनमाने तरीके से चल रहा है। वे बताते हैं कि कंपनी ने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तो खोल रखा है मगर चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं है। न तो एम्बुलेन्स की सुविधा है न ही डाक्टर की। दवा तो है ही नहीं। जबकि ईएसआईसी के नाम पर कंपनी द्वारा प्रति मजदूर 6 प्रतिशत की राशि ठेकेदार द्वारा जमा कराई जाती है जिसमें मजदूरों की मजदूरी से 1.75 फीसदी तथा ठेकेदारों से 4.25 फीसदी राशि की कटौती की जाती है।

यूनिट बंद होने के बाद क्षेत्र के कई मजदूर यूनियनों ने मजदूरों को अलग-अलग गुटों में बांट रखा है जिसके कारण यूनियन मजदूरों में एकता के अभाव का लाभ कंपनी को मिल रहा है। इन मजदूर यूनियनों का डीवीसी प्रबंधन से अच्छे रिश्ते भी हैं जिसका हवाला देकर ये यूनियन लीडर मजदूरों को बरगलाने में सफल रहते हैं। जिसमें प्रबंधन से सिफारिश कर उनको फिर से काम पर रखवाने समेत कई फंदे शामिल हैं। 

यूनियन के नाम पर दलाली

जबकि क्षेत्र के मजदूर संगठन समिति ने मजदूरों को सावधान किया है कि वे प्रबंधन के दलालों से सावधान होकर आंदोलन करें तभी उन्हें न्याय मिल सकता है। मसंस के महासचिव बच्चा सिंह कहते हैं कि अधिकार आंदोलन व संघर्ष से ही मिल सकता है प्रबंधन की दलाली से नहीं।

सीटीपीएस के प्रोजेक्ट हेड सह मुख्य अभियंता बीएन साह मानते हैं कि प्लांट बंदी से कन्ट्रैक्टर के अधीन काम करने वाले ठेका मजदूर प्रभावित होंगे। बीएन साह के इस बयान से इतना साफ हो जाता है कि प्लांट के अधिकारी भी मजदूरों की त्रासदी को समझते हैं मगर खुलकर नहीं बोल सकते। क्योंकि कहीं न कहीं शासन तंत्र का उन पर दबाव है। जो सरकार की तरफ से इस बात के निर्देश का संकेत देता है कि सार्वजनिक संस्थानों को किसी भी हाल में बंद कर देना है। और उन्हें औने-पौने दामों पर कारपोरेट जगत की निजी क्षेत्र की कंपनियों के हवाले कर देना है। जिसका प्रमाण यह है कि एक तरफ डीवीसी अपने उत्पादन को खरीदार नहीं मिलने का रोना रो रहा है जबकि निजी क्षेत्र की कंपनियों के उत्पादन के खरीदारों की लंबी कतार है।  

मसंस के महासचिव बच्चा सिंह बताते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को निजी हाथों में देने की साजिश को विफल करने की ताकत केवल मजदूरों में ही है जो लगातार संघर्षों एंव आंदोलन से ही संभव है। उन्होनें मजदूरों को प्रबंधन के दलाल संगठनों से सावधान रहने का भी अह्वान किया है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल बोकारों में रह रहे हैं।)






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Amit Kumar Singh :: - 07-24-2017
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