चंद्रशेखर की रिहाई के लिए निकली यात्रा पहुंची दौराला, लोगों का मिल रहा भरपूर समर्थन

आंदोलन , , रविवार , 11-03-2018


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हिमांशु कुमार

दौराला, यूपी। दिल्ली से 6 तारीख को पदयात्रा शुरू करके साहिबाबाद, गाजियाबाद, मुरादनगर, मोदीनगर, मेरठ होते हुए दौराला तक आ पहुंचे हैं। 

रोज नए घर में ठहरना, नए लोगों से मिलना, देश-समाज-जाति-सांप्रदायिकता-राजनीति पर खूब लंबी चौड़ी चर्चाएं हो रही हैं। 

महिलाएं, युवा, वरिष्ठ नागरिक सभी तरह के लोग बात कर रहे हैं। यह यात्रा जेल में बंद भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं   चंद्रशेखर, शिवकुमार और सोनू की रिहाई की मांग को लेकर है। 

इन लोगों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। लेकिन सरकार ने न्यायालय के आदेश को नहीं माना। हमने इसे न्यायपालिका पर और संविधान पर हमला माना। हमारे मन में बेचैनी थी कि इतने बड़े मुद्दे पर इस देश में बेचैनी क्यों नहीं है। लोग संविधान और न्यायपालिका पर हमले के प्रश्न को उठा क्यों नहीं रहे हैं। 

इसलिए अपने स्तर पर विरोध करने के लिए पैदल चल पड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं सूझा तो अंततः 6 तारीख को हम निकल पड़े।

Facebook पर मेरे लिखने के बाद दिल्ली से कृष्णा चौधरी जो वकील हैं वह अपना बैग लेकर साथ चलने के लिए आ गए। छत्तीसगढ़ के शिक्षक संजीत वर्मा ने अपना बैग पैक किया और यात्रा में शामिल हो गए। जेएनयू में पढ़े राजस्थान के क्रांतिकारी गायक हरकेश बैरवा ने भी अपना बैग कंधे पर टांगा और मेरे साथ आ गए। शुरुआत में काफिला काफी बड़ा था। पत्रकार प्रशांत टंडन, हैदर रजा, हरियाणा से धर्मेश प्रेम, दिल्ली से गांधीवादी रमेश शर्मा, उत्तराखंड से मनोज पांडे और रंजन, दिल्ली से सौरभ सिंह, आशुतोष कुमार, मोहर भाई और उनका परिवार, छत्तीसगढ़ से जज प्रभाकर ग्वाल और उनकी पत्नी प्रतिभा ग्वाल शामिल थे। बाकी के साथी धीरे-धीरे विदा हुए और हम 5 लोग यात्रा करते रहे। 

हिमांशु कुमार लोगों के साथ बातचीत करते हुए।

उत्तर प्रदेश का यह बहुजन समाज पार्टी के प्रभाव वाला इलाका है। शुरू में मेरे मन में डर था कि बहुजन समाज पार्टी और चंद्रशेखर के बीच जो मतभेद हैं शायद उसका असर हमें मिलने वाले समर्थन और हमारी मीटिंग में संख्या पर पड़ सकता है। लेकिन मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि दलित समुदाय ने चंद्रशेखर के मामले को राजनीति से परे रखकर इसे अपने समुदाय की अस्मिता और उस पर होने वाले हमले से जोड़कर देखा है और मायावती जी के वोटर होने के बावजूद दलित समुदाय चंद्रशेखर का भी समर्थन कर रहा है।

मोदीनगर में महिलाओं ने गीत गाया की बहन जी ने कॉलेज बनवाया जिसमें बहुत सारी टीचर और बहुत सारे बच्चे हैं। अंबेडकर साहब का गीत गाया और चंद्रशेखर के समर्थन में भी नारे लगाए।

इसी तरह मेरठ जिले के गांव पबरसा में भी लोगों ने कहा कि हम मायावती बहन जी और चंद्रशेखर के विवाद में नहीं पड़ना चाहते। हम भीम आर्मी का समर्थन करते हैं और मायावती बहन जी को वोट देते हैं।

मेरठ में मेरे पास एक फोन आया जो एक अनजान व्यक्ति का था। मैंने उनसे नाम पूछा उनका सरनेम राजपूत वाला था। मुझे थोड़ा डर लगा, क्योंकि भीम आर्मी और राजपूतों के बीच झगड़ा हुआ था। लेकिन जब वह युवा मिले तो पता चला कि वह तो प्रगतिशील विचारधारा से बहुत प्रभावित हैं। उनके पास बहुत सारे प्रगतिशील उपन्यास और पुस्तकें हैं। उनसे बात करके मैं बहुत प्रभावित हुआ। उनकी समझदारी और समाज को बदलने की उनकी तड़प,  दलितों के साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध उनकी समझ और उसे बदलने का जज्बा देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। 

मुझे हमेशा से लगता है कि भारत में सामाजिक न्याय की लड़ाई सिर्फ दलितों की लड़ाई नहीं है। जब तक इस लड़ाई में और सभी जातियों के लोग नहीं शामिल होंगे यह लड़ाई मुकम्मल नहीं हो सकती।

इसी तरह से संविधान और कानून को बचाने की लड़ाई भी सिर्फ दलितों को नहीं लड़नी है। यह देश के हर वर्ग, हर जाति, हर संप्रदाय की लड़ाई है। अन्याय के मुद्दे को व्यापक मुद्दा बनाने के लिए की जा रही यह पदयात्रा 17 मार्च को सहारनपुर पहुंचेगी।

(हिमांशु कुमार गांधीवादी कार्यकर्ता हैं और आजकल दिल्ली से सहारनपुर तक पैदल यात्रा पर निकले हैं।)










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