आज भी ‘मोर्चे’ पर है भारत छोड़ो आंदोलन का एक सिपाही

अगस्त क्रांति , ख़ास मुलाकात, मुंबई, बुधवार , 09-08-2017


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अंबरीश कुमार

मुंबई। भारत छोड़ो आंदोलन का एक सिपाही आज भी मोर्चे पर डटा हुआ है। ये हैं दिग्गज समाजवादी जीजी पारीख जो वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने की वजह से दस महीने तक वर्ली की अस्थाई जेल में रहे। वे इस समय 93 वर्ष के हैं और समाजवादी आंदोलन का दिया जलाये हुए हैं। वे न कभी चुनाव लड़े और न कोई शासकीय पद लिया।

साभार : गूगल

दिग्गज समाजवादी जीजी पारीख से पनवेल के युसूफ मेहर अली सेंटर में जो बातचीत हुई थी उसके अंश-

सवाल- आप किसी प्रेरणा से भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े?

जीजी पारीख- यह उस समय का देश का माहौल था। लोग आजादी की बात करते थे। जेल जाने की बात करते थे। इन सबका असर मेरे ऊपर भी पड़ा। गांधी और कांग्रेस की हवा बह रही थी जिसका असर मेरे घर पर भी पड़ा।

सवाल- शुरुआत कहां से हुई?

जीजी पारीख- एआईसीसी का मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन का जो सेशन हुआ उसमें एक वालंटियर के रूप में मैं भी शामिल हुआ था। अन्य नेताओं के साथ महात्मा गाँधी मंच पर थे। उनके भाषण से प्रभावित हुआ और फिर इस आंदोलन का हिस्सा बन गया।

सवाल- समाजवादियों की कई बार एकजुटता की कोशिश हुई, कई बार बिखराव हुआ। आप इसे कैसे देखते हैं?

जीजी पारीख- मैं सोशलिस्ट पार्टी में हमेशा विभाजन के खिलाफ रहा। इस मामले में डॉ. राम मनोहर लोहिया से भी सहमत नहीं था। हमें जोड़ना चाहिए तोड़ना नहीं।

सवाल- महाराष्ट्र में लम्बे समय से हैं, यहां की राजनीति में शिवसेना के उदय को किस तरह देखते हैं?

जीजी पारीख- मैं खुद गुजरात से हूँ पर पचास साठ के दशक में मुंबई के कल कारखानों में जिस तरह मराठी लोगों की उपेक्षा हुई उसी से यह सब शुरू हुआ। जो पहल समाजवादियों को करनी चाहिए थी उसे बाल ठाकरे ने किया और वे कामयाब भी हुए। नौकरी में जब स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी नहीं होगी तो यह सब होगा।

सवाल- इस युसूफ मेहर अली सेंटर में अस्पताल है, स्कूल है लड़कियों का छात्रावास है और बड़ी संख्या में स्टाफ है, इसका खर्च कैसे निकलता है?

जीजी पारीख- इन सब जनहित के कामों में काफी पैसा लगता है, कुछ हमारे अपने संसाधनों से मिलता है तो ज्यादा हिस्सा जनता से मांगता हूँ। हर साल करीब दो करोड़ का खर्च आता है जो मांग कर इकठ्ठा करता हूँ।

सवाल- समाजवादियों की नई पहल से क्या उम्मीद है?

जीजी पारीख- जिस तरह लोगों ने यहां आकर अपनी बात रखी और समाजवादी आंदोलन के लिए समय देने का संकल्प लिया है उससे अभी भी बहुत उम्मीद है। हमने कई बदलाव देखे हैं और फिर बदलाव होगा। 

साभार : गूगल

जीजी पारीख का परिचय

गुणवंत राय पारीख यानी डॉ. जीजी पारीख को लोग कई तरह और कई वजह से जानते हैं सन् 42 के भारत छोड़ो आंदोलन में दस महीने तक जेल में रहने वाले जीजी समाजवादी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गांधीवादी और पेशेवर चिकित्सक के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें सबसे ज्यादा यूसुफ मेहरअली सेंटर के संस्थापक के तौर पर जाना जाता है, जिसकी स्थापना उन्होंने 52 साल पहले महाराष्ट्र में रायगढ़ जिले के तारा गांव में की थी, जहां हिंदी, उर्दू तथा मराठी भाषा में चार स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। जिनमें ढाई हजार से भी ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। यहां ग्रामीणों के लिए नि:शुल्क अस्पताल चलाया जाता है। खादी ग्रामाद्योग भी स्थापित है। सेंटर की 11 राज्यों में शाखाएं संचालित की जा रही हैं।

डॉ. पारीख ने अपना अधिकतर समय रचनात्मक कार्यों में तथा प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों के पुनर्वास में लगाया है। लातूर, कश्मीर हो या गुजरात के कच्छ का भूकंप, दक्षिण भारत में सुनामी आई हो या उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा, जीजी के नेतृत्व में यूसुफ मेहरअली सेंटर द्वारा बढ़चढ़ कर पुनर्वास का कार्य किया गया।

1924 में गुजरात में जन्म

गुजरात में सौराष्ट्र के सुरेंद्रनगर (बधवान कैंप) में गुणवंत राय पारीख का जन्म 30 दिसंबर 1924 को हुआ था। पिता स्व. श्री गणपत लाल पारीख जयपुर स्टेट के डॉक्टर थे, जो बाद में राजस्थान चिकित्सा सेवाओं के डायरेक्टर बने। जीजी की माता का नाम श्रीमती विजया पारीख था, जिनके छह बच्चों में से एक जीजी थे। जीजी की सुरेंद्रनगर के विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई हुई।

छात्र आंदोलन से जुड़े

स्कूल के दिनों में ही वे छात्र आंदोलन से जुड़ गए तथा 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने हिस्सेदारी की, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार कर 10 महीने वर्ली की अस्थाई जेल में रखा गया तथा एक महीने ठाणे की जिला जेल में रहे। जीजी के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव महात्मा गांधी, अच्युत पटवर्धन, यूसुफ मेहरअली, जयप्रकाश नारायण तथा ब्रिटेन के समाजवादियों का पड़ा।

सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बने

1946 में वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए तथा श्रमिक आंदोलन और सहकारिता आंदोलन से जुड़ गए। वे छात्र कांग्रेस की मुंबई शाखा के अध्यक्ष हुए।

पत्नी संग जीजी पारीख। फोटो साभार : गूगल

1949 में उनका विवाह सुश्री मंगला से हुआ, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं। उन्होंने मृणाल गोरे, प्रमिला दंडवते के साथ मिलकर समाजवादी महिला आंदोलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। जीजी सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। वे अशोक मेहता, नाना साहेब गोरे, मधु दंडवते के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में सक्रिय रहे।

बेटी सोनल शाह के साथ जीजी पारिख। फोटो साभार : गूगल

आपातकाल में भी जेल में रहे 

25 जून 1975 को इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू किए जाने के बाद 23 अक्टूबर को सोशलिस्ट पार्टी की मुंबई शाखा के अध्यक्ष होने के नाते उन्हें जॉर्ज फर्नांडीज के साथ बड़ौदा डायनामाइट कांड में गिरफ्तार किया गया। जिसके परिणामस्वरूप वे 20 महीने पुणे की यरवदा जेल में रहे। बाद में उनका तबादला दिल्ली की तिहाड़ जेल में किया किया गया। चुनाव की घोषणा के बाद जीजी रिहा हुए। श्रीमती मंगला पारीख जी प्रमिला दंडवते के साथ 18 महीने यरवदा तथा धुले जेल में रहीं। उनकी बेटी सोनल ने 19 वर्ष की आयु में आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह किया, जिसके चलते उन्हें चार सप्ताह मंबई की आर्थर रोड जेल में रखा गया। 1940 में ही राजनीति में प्रवेश करने साथ ही जीजी ने तय कर लिया था कि वे ना तो कभी चुनाव लड़ेंगे, न ही कोई शासकीय पद लेंगे। इस कारण उन्होंने जीवनभर तमाम बार पार्टी टिकट का प्रस्ताव मिलने के बावजूद कभी चुनाव नहीं लड़ा, न ही कोई शासकीय पद लिया।

(अंबरीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ शुक्रवार के संपादक हैं। इंडियन एक्सप्रेस समूह से तकरीबन 26 सालों तक जुड़े रहे कुमार आजकल लखनऊ में रहते हैं।)






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