बीटी बैंगन के बाद अब जहरीली सरसों की बारी

आंदोलन , , बुधवार , 17-05-2017


gm-bt-bangan-sarson-movement-report-sc-cic

धीरेश सैनी

नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा गठित जीईएसी (जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी) ने जीएम सरसों (जेनेटिकली मोडीफ़ाइड यानी संशोधित जीन उत्पाद) को हरी झंडी दे दी है। जीएम सरसों को हिंदुस्तान में अनुमति नहीं देने की मांग कर रहे संगठनों को ऐसी ही आशंका थी। कमाल की बात यह है कि आरएसएस जिसकी पॉलिटिकल विंग भारतीय जनता पार्टी की केंद्र व अधिकांश प्रदेशों में सरकारें हैं, जीएम सरसों के विरोध में होने का जेस्चर प्रदर्शित करती रही है। अभी भी स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जीएम सरसों को अनुमति नहीं देने की मांग दोहराई है। आरएसएस का अभी तक चरित्र रहा है कि उसके आनुषांगिक संगठन स्वदेशी का राग अलापते रहते हैं और उसके स्वयंसेवकों की ही सरकार अपने फैसले बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों में लेती जाती है। यही वजह है कि जीएम सरसों के मुद्दे पर भी आरएसएस के जेस्चर से ज्यादा उम्मीदें नहीं की जा रही हैं। सरकारी कमेटी की हरी झंडी मिलने के बाद जीएम सरसों को अनुमति की गेंद सरकार के पाले में है। अंतिम निर्णय के लिए मामला देश के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पास है। भारतीय किसान यूनियन के नेता धर्मेंद्र मलिक व कई किसान एक्टिविस्ट ने  मंत्री दवे के घर के नंबर 011-23011961,24695132 उनके पीएस के मोबाइल नंबर 9868181806 को सोशल साइट्स पर शेयर किया है। देशवासियों से अपील की गई है कि एसएमएस, ह्वाट्सएप आदि के जरिये जीएम सरसों को अनुमति न दिए जाने की मांग की जाए।

कई और उत्पाद कतार में

गौरतलब है कि हाल-फिलहाल तक पांच-छह जीएम उत्पादों के अनुमति की लाइन में होने की बात चर्चे में थी। `संशोधित जीन-मुक्त भारत के लिए गठबंधन ने 13 मई की बिज़नस स्टैंडर्ड की खबर का हवाला देते हुए बताया कि करीब 100 जीएम उत्पाद हिंदुस्तान में अनुमति की पंक्ति में हैं इनमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, बैंगन, आलू, ईख, अरहर आदि शामिल हैं। गठबंधन ने बीटी कॉटन आने से पैदा हुई भयंकर स्थितियों का भी हवाला दिया है। जीएम सरसों को सरकारी कमेटी की हरी झंडी मिलने से चिंतित `संशोधित जीन-मुक्त भारत के लिए गठबंधन ने उपभोक्ताओं और किसानों का सड़क पर आकर विरोध दर्ज़ कराने का आह्वान किया है। इस गठबंधन की ओर से बताया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर कई एक्टिविस्टों और संगठनों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन और विरोध का फैसला लिया है। विरोध की शुरुआत दिल्ली-हरियाणा और उसके आस-पास के इलाकों से होगी।

आंदोलन की राह पर कार्यकर्ता

जीएम सरसों और दूसरे जीएम उत्पादों को अनुमति नहीं देने की मांग को लेकर चल रहे संघर्ष में शामिल डॉ. राजेंद्र चौधरी ने 25 अक्तूबर 2016 को जंतर मंतर पर हुए एक दिन के सरसों सत्याग्रह की समीक्षा के तौर पर जो लेख लिखा था, उसके जरिये जीएम सरसों के विरोध की वजहों को जानने की कोशिश करते हैं। डॉ. चौधरी इस बात पर हैरानी जताते हैं कि इतने महत्वपूर्ण मसले पर इतने संगठनों और इतनी राजनीतिक पार्टियों के समर्थन के बावजूद सत्याग्रह में 1000-1500 लोग ही क्यों जुटते हैं।

डॉ. राजेंद्र चौधरी

डॉ. राजेंद्र चौधरी लिखते हैं- 

जीएम (जेनेटिकली मोड़ीफ़ाइड यानी संशोधित जीन उत्पाद, यानी वो नया जीव जिसमें एक या एक से अधिक विजातीय जीन डाले गए हों जैसे मछली से निकाल कर कोई जीन टमाटर में डाला जाए) सरसों की संभावित अनुमति के विरोध के कई ठोस कारण हैं। कुछ की ही चर्चा यहां की जा सकती है। लगभग इन्हीं परिस्थितियों में बीटी बैंगन (यह जीएम बैंगन का ब्रांड नाम है; बीटी उस बैक्टीरिया के प्रथमाक्षरों से बना है जिसके जीन बैंगन में डाले गए थे) भी तथाकथित रूप से सुरक्षित घोषित हो कर अनुमति के कगार पर था जब जनदबाव के चलते तत्कालीन सरकार ने 2010 पर इस पर रोक लगा दी थी। यह रोक अब तक जारी है यानी जो बीज 2010 में लगभग सुरक्षित मानकर जारी होने के कगार पर था, वह अब तक सुरक्षित साबित नहीं हुआ है। यह तथ्य ही जीएम सरसों के सुरक्षित होने के दावे पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

कई देशों में प्रतिबंधित हैं जीएम बीज

भारत सहित पूरी दुनिया में वैधानिक तौर पर जैविक खेती में जीएम बीजों का प्रयोग प्रतिबंधित है। इससे स्पष्ट है कि जीएम बीजों, खेती में जीएम तकनीक के प्रयोग में ही कुछ ऐसा जोखिम है कि पूरी दुनिया में जैविक खेती में इसके प्रयोग पर प्रतिबंध है। जीएम बीज न केवल जैविक खेती में प्रतिबंधित है अपितु दुनिया के अधिकांश देशों और अधिकांश तथाकथित तौर पर `विकसित देशों` में (अमरीका, कनाडा आदि चंद देश इसका अपवाद हैं) जीएम बीज प्रतिबंधित हैं।

इस प्रतिबंध के पीछे कुछ ठोस कारण हैं। सैद्धांतिक रूप से निश्चित तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि अपने परिवेश से कट कर, विजातीय परिवेश में एक विशेष जीन का क्या प्रभाव रहेगा। विजातीय जीन को ग्रहण करने वाले जीव का भी वाह्य स्वरूप एक जैसा रहने के बावजूद एक नया जीव/बीज बन जाता है। इस नये जीव/बीज के क्या गुण दोष होंगे, विशेष तौर पर दीर्घ काल में विजातीय जीन का क्या प्रभाव रहेगा, यह लंबे शोध का विषय है। दुर्भाग्य से या तो जीएम बीजों की जैव सुरक्षा जांच संबंधी स्वतंत्र शोध हुआ ही नहीं है और यदि हुआ भी है तो आमतौर पर तात्कालिक या मध्यम अवधि के प्रभावों का ही अध्ययन हुआ है। दीर्घ अवधि के प्रभावों का शोध अध्ययन तो न के बराबर है।

संस्थाओं का गैरजिम्मेदाराना रुख

उदाहरण के लिए जीएम सरसों को ही लें, उच्चतम न्यायालय और केंद्रीय सूचना आयोग के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जैव सुरक्षा संबंधी पूर्ण दस्तावेज़ सहज सार्वजनिक पड़ताल के लिए उपलब्ध नहीं कराये गए हैं। जो संक्षिप्त सारांश उपलब्ध है, उसमें स्पष्ट लिखा है पर्यावरणीय सुरक्षा से सम्बन्धित आलेख आवेदक द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित है। क्या आवेदक द्वारा उपलब्ध करायी गई जानकारी को पर्यावरणीय सुरक्षा की स्वतंत्र जांच माना जा सकता है? केवल इतना ही नहीं। दावा यह है कि जीएम सरसों की पड़ताल स्वतंत्र कृषि शोध संस्थानों में और इनके मार्गदर्शन में हुई है, लेकिन दस्तावेज़ दिखाते हैं कि वास्तविकता कुछ और है। सरसों के लिए उच्चतम सरकारी संस्था सरसों और रेपसीड शोध निदेशालय, भरतपुर है। लिखित दावा यह है कि इस निदेशालय के दिशानिर्देशन में ये अध्ययन हुए हैं जब कि सूचना का अधिकार कानून के तहत दी गई जानकारी में इस निदेशालय ने बताया है कि इन्होंने केवल आवेदक द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी को प्रेषित किया है। इसके अलावा तथाकथित तौर पर `जैव सुरक्षा` साबित करने वाले दस्तावेज दिखाते हैं कि हर बार स्वतंत्र मूल्यांकन/ निरीक्षण दल फरवरी/मार्च में गठित किए गए। अक्तूबर में बोई जा चुकी फसल के लिए क्या स्वतंत्र मूल्यांकन दल का गठन फरवरी/मार्च में उपयुक्त माना जा सकता है? सरकारी दस्तावेज़ दिखाते हैं कि इन दलों ने हर बार परीक्षण स्थलों का केवल एक दिवसीय दौरा किया। स्वतंत्र पड़ताल के नाम पर यह दिखावा केवल भारत में किया जाता हो, ऐसा नहीं है। अमरीका/कनाडा में तो आवेदक और नियामक के बीच कुर्सी अदल-बदल की व्यवस्था जगप्रसिद्ध है।

खतरनाक हैं नतीजे

स्वतंत्र और दीर्घकालीन प्रभावों के अध्ययन की कमी का मुख्य कारण है कि दुनिया के अधिकांश देशों में जीएम बीजों के प्रयोग की अनुमति नहीं है। दूसरी ओर, इस तरह के कई अनुभव सामने आए हैं कि जीएम फसलों और इन के साथ जुड़े अतिरिक्त रसायनों के प्रयोग के साथ ही कई तरह की बीमारियां जैसे कैंसर, जन्मजात विकृतियां बढ़ी हैं। अमरीका जहां जीएम फसलों का सब से ज़्यादा प्रयोग होता है, वहां के नागरिकों का स्वास्थ्य विकसित देशों में सब से खराब पाया जाता है। भले ही इसके लिए केवल जीएम बीजों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, भले ही जीएम फसलों के अनुमोदन के बाद बीमारियों के बढ़ने मात्र के आधार पर वैज्ञानिक मापदण्डों के आधार पर जीएम बीजों को कारण नहीं माना जा सकता, परन्तु वैज्ञानिक मापदण्डों के अनुसार भी ये `संयोग`/संगतिजीएम बीजों पर अध्ययन की ज़रूरत का आधार बनते ही हैं। खास तौर पर जब एक बार बड़े पैमाने पर पर्यावरण में जारी हो जाने के बाद इन बीजों को वापस करना नामुमकिन हो। अगर किसी रसायन के जारी होने के बाद उस के हानिकारक प्रभावों का पता चलता है, तो उस का उत्पादन रोका जा सकता है और यह आशा कि जा सकती है कि थोड़े, या ज़्यादा, समय के बाद उस का प्रभाव खत्म हो जाएगा। परन्तु जीएम बीज एक जीवित प्राणी है, जारी होने के बाद इस का प्रजनन रोका नहीं जा सकता (नियंत्रित परिस्थितियों में प्रयोगशाला में जीएम उत्पादों को पैदा कर के उन से दवाई बना कर प्रयोग करना, एक बात है जैसा की इंसुलिन बनाने में होता है, पर जीएम उत्पादों का अनियंत्रित खुले परिवेश में प्रवेश जैसा जीएम बीजों से खेती में होता है, अलग बात है)। बड़े पैमाने पर खेतों में जाने के बाद इस का स्वतंत्र अस्तित्व हो जाएगा, जो बेलगाम होगा।

डॉ. राजेंद्र चौधरी के इस लेख की अगली किस्त बृहस्पतिवार यानी कल.......

 






Leave your comment