घोषणापत्र में जहर पैदा करने के खिलाफ थी बीजेपी

आंदोलन , , बृहस्पतिवार , 18-05-2017


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डॉ. राजेंद्र चौधरी

नई दिल्ली। इसलिए क्या यह मांग अनुचित है कि जीएम खाद्य पदार्थों को उतनी कड़ी जांच प्रक्रिया से तो निकलना ही चाहिए जितनी कड़ी जांच प्रक्रिया से दवाइयों को निकलना पड़ता है (दवाई तो कोई-कोई और कभी-कभी खाता है और खाद्य पदार्थों का प्रयोग कहीं ज़्यादा व्यापक होता है)? क्या यह मांग अनुचित है कि जीएम बीजों को भी उतनी कड़ी जांच से निकलना चाहिए जितना गैर-जीएम बीजों को निकलना पड़ता है? भले ही यह अविश्वासनीय प्रतीत हो परन्तु ये दो सामान्य बातें भी जीएम बीजों पर लागू नहीं होती। इस लिए, दुनिया भर में जीएम बीजों का विरोध होता है।

पैदावार में बढ़ोतरी का सवाल:

हालांकि बिना जैव सुरक्षा के पैदावार बढ़ोतरी का कोई अर्थ नहीं है लेकिन जीएम बीजों से पैदावार में भी कोई बढ़ोतरी नहीं होती। अमेरिका के `चिंताशील वैज्ञानिकों के संघ (The Union of Concerned Scientists)` ने 13 साल की उपज के आंकड़ों के अध्ययन के बाद 2009 में `पैदावार में नाकामी` (Failure of Yield) शीर्षक से एक रिपोर्ट तैयार की थी। इसके अनुसार अमेरिका की मुख्य जीएम फसलों में शामिल खरपतवार-नाशक सहनशील जीएम सोयाबीन और खरपतवार-नाशक सहनशील जीएम मक्का से उत्पादन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। बीटी मक्काज से पैदावार में कुछ बढ़ोतरी हुई परंतु इसकी भी `अधिकतम संभावित` उपज नहीं बढ़ी है। दूसरी ओर `अमेरिका में जीएम के आने से पहले 1995 में भुखमरी 12 फीसदी थी, जो अब बढ़कर 14 फीसदी हो गई है`। जहां तक जीएम सरसों का सवाल है उत्पादन वृद्धि के तथाकथित आंकड़ों और दावों के बावजूद, उत्पादन से संबंधित सार-संक्षेप का अंतिम निष्कर्ष मात्र इतना है कि यह जीएम संकर बीज अपने जीएम माता-पिता से अधिक पैदावार देता है। (वर्तमान जीएम सरसों का बीज, सरसों की दो क़िस्मों को जीएम बना कर फिर उन के मेल से बनाया गया है यानी इस प्रक्रिया में सरसों के कुल तीन जीएम उत्पाद शामिल हैं।) किसान की (और कृषि नीति निर्धारकों की) इसमें क्या रुचि हो सकती है कि जीएम संकर बीज अपने जीएम माता-पिता से ज़्यादा पैदावार देता है या नहीं; उनकी रुचि तो केवल इस में हो सकती है (अगर अपने को केवल पैदावार तक भी सीमित रखें तो) कि उसको मिलने वाले जीएम संकर बीज की पैदावार वर्तमान में उपलब्ध बीजों से ज़्यादा है या नहीं? इस बारे में हैरानी की बात यह है कि जीएम संकर बीज की वर्तमान में उपलब्ध गैर-जीएम संकर बीजों से तुलना ही नहीं की गई।

आश्चर्यजनक अपितु सच!

सच यह भी है कि हालांकि वर्तमान सुरक्षा जांच में जीएम संकर और गैर-जीएम संकर का तुलनात्मक अध्ययन नहीं हुआ है, अन्यत्र उपलब्ध आवेदक के ही आंकड़े दिखाते हैं कि आवेदक की अन्य गैर-जीएम संकर क़िस्मों, डीएमएच (धारा मस्टर्ड हाइब्रिड) 1 एवं 4, की पैदावार डीएमएच 11, जो जीएम संकर है, से ज़्यादा है।  इसलिए निश्चित तौर पर जीएम संकर सरसों की खासियत इस की पैदावार नहीं है (अन्य कई सरकारी रिपोर्ट भी इस की पुष्टि करती हैं)।

जीएम सरसों की असली खासियत इस का खरपतवारनाशी सहनशील होना है। (प्रचलित बीजों में खरपतवारनाशी के प्रयोग से फसल की पैदावार भी प्रभावी होती है; खरपतवारनाशी सहनशील होने का अर्थ है इसकी पैदावार पर खरपतवारनाशी रसायन के प्रयोग का दुष्प्रभाव नहीं होगा।)। अगर इस बात को नज़रअंदाज़ भी कर दें कि कई सरकारी कमेटियों ने भारत में खरपतवारनाशी सहनशील फसलों पर रोक लगाने की सिफ़ारिश की है, यह बात गले नहीं उतरती कि इस खरपतवारनाशी सहनशील फसल का इस दृष्टि से परीक्षण क्यों नहीं हुआ। आश्चर्यजनक अपितु सत्य यह भी है कि इस खरपतवारनाशी सहनशील बीज पर खरपतवारनाशी रसायनों का प्रयोग न किया जाये, यह सुनिश्चित करने की सिफ़ारिश की गई है। (अगर विश्वास न हो तो सरकारी तौर पर जारी किए गए सार-संक्षेप के पृष्ठ 112 को देख कर पुष्टि कर सकते हैं।) खरपतवारनाशी सहनशील बीज और खरपतवारनाशी को बाज़ार में उपलब्ध करा कर कौन यह सुनिश्चित कर सकता है कि दोनों का परस्पर मेल न हो? खरपतवारनाशी सहनशील बीज बना कर यह कहना कि इस पर खरपतवारनाशी का प्रयोग न किया जाए, यह एक अच्छा चुटकुला हो सकता था अगर यह हमारी खेती, हमारे स्वास्थ्य, हमारे शहद (और इस के निर्यात) के लिए घातक न होता।  

बीजेपी के घोषणापत्र में नहीं था शामिल

जीएम फसलों और जीएम सरसों का विरोध करने के बहुत से और कारण भी हैं। सब की चर्चा यहां करना संभव नहीं है पर दो-तीन और बातें करनी ज़रूरी है। एक तो यह कि इन परिस्थितियों में जीएम सरसों को अनुमति देना भाजपा का अपने चुनावी घोषणा पत्र से पीछे हटना है। भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा चुनाव 2014 के घोषणा पत्र के पृष्ठ 45 पर यह वायदा किया गया था कि `आनुवांशिक रूप से संवर्धित (जीएम) खाद्य को बिना वैज्ञानिक जांच पड़ताल के अनुमति नहीं दी जाएगी`। वैज्ञानिक जांच का आवश्यक मूलभूत तत्व है कि वह सार्वजनिक हो। जीएम की ऐसी कोई सार्वजनिक जांच मोदी सरकार ने नहीं कराई। यह भी कहा जा रहा है कि जब देश में पहले से ही जीएम तेल आ रहा है तो इसकी अपने यहां खेती क्यों न करें। एक तो आयातित जीएम सरसों तेल हमारे कुल खाद्य तेल खपत का 2% से भी कम है और यह भी बिना लेबलिंग के आ रहा है जो कि गैर-कानूनी है। इसे रोका जाना चाहिए न कि इसको कानूनी जामा पहनाया जाए। दूसरा, आयातित जीएम तेल का नुकसान केवल मानव स्वास्थ्य पर होगा, परंतु अगर जीएम सरसों की खेती यहां की जाती है तो मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव के साथ साथ, इसके बहुत से दूसरे दुष्प्रभाव भी होंगे: सरसों की अन्य किस्में प्रदूषित होंगी, उन का उत्पादन घटेगा, खरपतवारनाशी के बढ़े हुए प्रयोग से मिट्टी, पानी और पर्यावरण का प्रदूषण, अन्य जीवों जैसे मधुमक्खी पर दुष्प्रभाव जिस के चलते शहद उत्पादन प्रभावित होगा इत्यादि। यानी जीएम पदार्थों की खेती के दुष्प्रभाव केवल जीएम तेल के आयात और खपत के दुष्प्रभावों से कहीं ज़्यादा हैं। दूसरा सवाल जीएम सरसों के स्वदेशी होने का है। एक तो आवेदक भले ही स्वदेशी हो परन्तु इस में प्रयोग किए गए कम से कम एक जीन के पेटेंट तो उसी विदेशी कम्पनी के पास हैं जिसके खरपतवारनाशी के प्रति इस बीज को सहनशील बनाया गया है। यानी उस विदेशी कम्पनी को दोहरा फायदा होने जा रहा है। और फिर हर स्वदेशी चीज़ अच्छी नहीं होती; न तो स्वदेशी जहर और न स्वदेशी कंपनियों का बीजों पर कब्जा अच्छा।

इन सब और ऐसे अन्य कई कारणों (जैसे जवाबदेही की कोई व्यवस्था न होना) के बावजूद, सरकार जीएम सरसों को अनुमति देने की ओर अग्रसर है। मुद्दा न केवल सरसों तक सीमित है (जीएम धान, मक्का, अरहर, भिंडी और तुलसी सरीखी अनेकों अन्य फसलें अनुमति की कतार में है) और न केवल किसानों तक;  उपभोक्ता के तौर पर हर कोई इस से प्रभावित है। 

(लेखक डॉ. राजेंद्र चौधरी, एमडीयू, रोहतक में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। सोशल एक्टिविस्ट चौधरी ऑरगेनिक फार्मिंग के पक्षधर हैं और कुदरती खेती अभियान, रोहतक के सलाहकार हैं।)






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