सरकार को घुटनों के बल खड़ा कर दिए हरियाणा के रोडवेजकर्मी

आंदोलन , , रविवार , 04-11-2018


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उदय राम

पिछले16 अक्तूबर से रोडवेज कर्मचारी हड़ताल पर थे। ये हड़ताल 18 दिन रही जो एक ऐतिहासिक कर्मचारी आंदोलन रहा। 2 नवंबर को माननीय हरियाणा एन्ड पंजाब उच्च न्ययालय के आश्वासन पर कि 12 नवंबर के सरकार और कर्मचारी प्रतिनिधियों को आमने-सामने बैठाकर बातचीत के माध्यम से सही फैसला कोर्ट करेगा। इस आश्वासन पर रोडवेज कर्मचारी यूनियनों ने हड़ताल समाप्त कर दी। ये कर्मचारियों की जीत है या सरकार की जीत है। ये सोचने का विषय है। मुझे तो ये सरकार की जीत लग रही है। जो काम सरकार करना चाहती थी वो कोर्ट ने कर दिया। 

लेकिन बहुमत कर्मचारियों ने जिस एकता और बहादुरी से लड़ने का परिचय दिया, फासीवादी सत्ता का बहादुरी से सामना किया, उसने आम जनता का दिल जीत लिया। इसलिए आंदोलन को देखें तो ये कर्मचारियों की बहुत बड़ी जीत है। जो एकता कर्मचारियों में देखने को मिली शायद ऐसा पहली बार हुआ। ये एकता भविष्य में रंग लाएगी। 

हरियाणा में परिवहन की लाइफ लाइन हरियाणा रोडवेज है। हड़ताल होने के कारण आम जनता जो हजारों की तादाद में रोजाना सफर करती है वो खासी परेशानी में थी। तानाशाही में विश्वास रखने वाली हरियाणा सरकार ने इस हड़ताल को कुचलने के लिए प्रत्येक हथकंडा अपनाया। सरकार और भाजपा द्वारा हड़ताल को तोड़ने के लिए झूठे प्रचार से लेकर दमनात्मक कार्रवाई की गई। हरियाणा सरकार द्वारा न्यूज़ पत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर कर्मचारियों और इस हड़ताल को बदनाम किया गया। हरियाणा सरकार कह रही है कि कर्मचारियों की लड़ाई तनख्वाह को बढ़वाने के लिए है। सरकार ने इनको मिल रही सारी सुविधाएं उस विज्ञापन में छपवाई। लेकिन रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल करने की प्रमुख वजह रोडवेज का निजीकरण है और उसके तहत 720 निजी बसों को सरकारी बेड़े में शामिल करना है।

आंदोलन की दशा

3-4 यूनियनों का साझा गठजोड़ करके कर्मचारी यूनियन मजबूती के साथ खड़े थे। सभी सरकारी विभागों के कर्मचारी भी इनके समर्थन में 2 दिन की सामूहिक हड़ताल करके समर्थन दे चुके थे। अध्यापक 100 बस सरकारी बेड़े में अपनी तनख्वाह से देने की पेशकश सरकार से कर चुके थे। सैकड़ों कर्मचारियों को बर्खास्त किया जा चुका था तो हजारों पर मुकदमे दर्ज हुए थे, गिरफ्तारियां हुई थीं। ये कर्मचारी आंदोलन इतिहास में एक मजबूत आंदोलन के तौर पर याद किया जाएगा।

मैं अपने छात्र जीवन से ही कर्मचारी आंदोलन का समर्थन करता रहा हूं। बहुत बार कर्मचारी आंदोलन में लाठियां भी खाई हैं। मुझे याद है 2006-07 में हरियाणा सरकार हिसार से दिल्ली व चंडीगढ़ के लिए वॉल्वो बस चला रही थी। हम रात 12 बजे ही कर्मचारियों के साथ रोडवेज हिसार में वॉल्वो बस न चले इसके विरोध में रुक गए। सुबह 6 बजे बस चलनी थी। विरोध हुआ। सरकार ने लाठी चार्ज किया। कर्मचारी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। लाठी चार्ज और वॉल्वो बस के खिलाफ पूरे हरियाणा में रोडवेज ने चक्का जाम कर दिया। हड़ताल 2 दिन चली उसके बाद सरकार और कर्मचारी यूनियनों का समझौता हो गया। यूनियन ने ऐलान किया कि सरकार झुक गयी और हमारी सब मांगें मान ली गयी हैं। 

लेकिन वॉल्वो बस उसके बाद भी चलती रही अब सवाल ये पैदा हुआ कि कौन सी मांग मानी ली गयी। क्योंकि विरोध और चक्का जाम तो वॉल्वो बस के खिलाफ था। लेकिन वो तो अब भी चल रही थी। 

मैंने अलग-अलग विभागों की दर्जनों हड़तालें देखी है उनमें गया भी हूं यूनियन नेताओं के निजीकरण के खिलाफ जोश भरे भाषण भी सुने हैं लेकिन फिर भी सरकारें निजीकरण करने में कामयाब रही हैं। प्रत्येक आंदोनल के बाद यूनियन बोलती रही है कि सरकार झुक गयी और जीत हमारी हुई है। अगर ऐसा हुआ है तो फिर निजीकरण क्यों हुआ है। जिस जीत का दावा यूनियनें करती रहीं आखिर वो कौन सी जीत थी, किन मुद्दों पर जीत हासिल की गई। 

हरियाणा ही नहीं पूरे देश का प्रगतिशील बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, वामपंथी आज भी इस हड़ताल को मजबूती से समर्थन कर रहा है। 

लेकिन क्या इन कर्मचारी यूनियनों के अवसरवादी, सुधारवादी, समझौतावादी कार्यक्रम के आधार पर निजीकरण को रोका जा सकता है? 

हड़ताल के दौरान सरकार और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों की बातचीत का वीडियो देखा। सरकार जहां निजी बसों के पक्ष में मजबूती से खड़ी दिखी तो वहीं कर्मचारी नेता बातचीत में सरकारी बस लाने की और इसके लिए 1 महीने का वेतन देने की बात करते हुए दिखे लेकिन साथ ही सरकार पर ये आरोप लगाते मिले कि ये बस महंगी है और इनके टेंडर बंटवारे में बहुत बड़ा घोटाला हुआ है। इन बसों के सिर्फ कुछ मालिक हैं।

कर्मचारियों का ये पक्ष क्या साबित करता है? यूनियन पक्ष के अनुसार अगर बस सस्ती और टेंडर बंटवारा सरकार ईमानदारी से करती तो क्या कर्मचारी यूनियन को कोई दिक्कत नहीं है?

इस हड़ताल को इनेलो नेता अभय चौटाला और कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी समर्थन दिया है। लेकिन क्या वो ईमानदारी से समर्थन में हैं। जब इनेलो और कांग्रेस की सरकार सत्ता में थी तो उस समय ये खुद भी निजीकरण कर रहे थे साथ में ही कर्मचारी आंदोलन का दमन भी कर रहे थे। दोनों विपक्षी पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को आंदोलन के पक्ष में उतारने की बजाए सिर्फ बयान देकर ही फसल काटने की फिराक में हैं।

हरियाणा में सर्व कर्मचारी संघ सीपीएम समर्थित और हरियाणा कर्मचारी महासंघ सीपीआई समर्थित यूनियनें हैं जिनका लगभग सभी विभागों में मजबूत प्रभाव है। हरियाणा का कर्मचारी आंदोलन ही नहीं पूरे देश का कर्मचारी आंदोलन जहां सीपीएम या सीपीआई की या दूसरी अवसरवादी यूनियनें हैं। जिनका कोई क्रांतिकारी कार्यक्रम नही है वहां सब जगह बड़ी बुरी दशा है। इन कर्मचारी यूनियनों में व्यक्तिवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और अवसरवाद हावी रहता है। कर्मचारी जो यूनियन का नेता बन गया वो ड्यूटी कभी करता ही नहीं होता। एक रोडवेज डिपो की कर्मचारी यूनियन यूनिट का प्रधान तो ऐसा था जो खुद निजी बस में हिस्सेदार था। क्या ऐसे नेता लड़ेंगे निजी बसों के खिलाफ लड़ाई।

इस पूरी लड़ाई में हरियाणा का नागरिक क्या सोचता है और वो किस तरफ खड़ा है। ये जरूर देखना चाहिए। 

जनता क्यों है खिलाफ

कर्मचारियों की ये लड़ाई रोडवेज को बचाने की लड़ाई है ताकि रोजगार बचाया जा सके। सरकार पूंजीपतियों के फायदे के लिए सरकारी विभागों को निजी हाथों में सौंप कर रोजगार खत्म करना चाहती है। इसलिए कर्मचारी सरकार के खिलाफ व रोजगार के लिए लड़ रहे हैं। 

हरियाणा की जनता कि पहली पसन्द सरकारी नौकरी है। इसके बाद भी क्या कारण है कि जनता रोडवेज के समर्थन में मजबूती से नहीं आई। इसके विपरीत जैसे ही सरकार ने सिर्फ 3 महीने के लिए भर्ती करने के लिए बेरोजगारों को बुलाया हजारों की तादात में 10 वीं से लेकर एमफिल किये हुए नौजवानों ने नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया। दूसरे विभागों के कर्मचारियों ने टिकट काटने व बस चलाने की जिम्मेदारी उठाई। 

एक कर्मचारी दूसरे कर्मचारी के खिलाफ क्यों, नौजवानों द्वारा ये गद्दारी क्यों -

इसका सीधा कारण जनता व कर्मचारियों में वर्गीय चेतना का न होना है। कुछ साल पहले कर्मचारियों की हड़ताल का समर्थन कर रहे किसान सभा वालों पर एक गांव में हमला तक कर दिया गया था। इसके लिए सबसे पहले कर्मचारी खुद जिम्मेदार है या कर्मचारियों की अवसरवादी यूनियनें हैं। सरकारी कर्मचारी चाहे किसी भी विभाग से और किसी भी पोस्ट से सम्बंध रखता हो। उसका व्यवहार आम जनता के प्रति बहुत ही घटिया स्तर का हो गया है। वो अपने आपको जनता का नौकर नहीं मालिक समझने लगता है उसी समझ के अनुसार वो जनता से घटिया व्यवहार करता है।

कर्मचारियों की तनख्वाह 30 हजार से लाख रुपये तक है लेकिन फिर भी बहुमत कर्मचारी की नजर जनता की जेब पर रहती है। किसी भी विभाग में बिना रुपये लिए कोई काम नहीं होता है। अच्छी तनख्वाह और अच्छी सुविधाएं लेने के बावजूद कर्मचारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी नहीं निभाता है। सफाई कर्मचारी सफाई नहीं करता, बिजली कर्मचारी बिना रुपये लिए तार भी नहीं जोड़ता, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों के जो हालात हैं वो सबके सामने ही हैं। बाकी विभागों के हालात भी बहुत बुरे हैं। अगर कर्मचारी यूनियनों का कार्यक्रम क्रांतिकारी कार्यक्रम होता तो उनके मार्फ़त सभी विभागों के कर्मचारियों को सत्ता की जन विरोधी नीतियों, उदारीकरण, भूमंडलीकरण व निजीकरण के खिलाफ वर्गीय राजनीतिक चेतना से लैस किया जा सकता था। अगर कर्मचारियों में ये चेतना आती तो जनता में भी आती और उनके व्यवहार में ये सब दिखता और जनता कभी खिलाफ नहीं जाती।

वर्गीय राजनीतिक चेतना न होने के कारण अवसरवाद 

वर्तमान में वर्गीय राजनीतिक चेतना न होने के कारण कर्मचारी कितना अवसरवादी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरियाणा में कर्मचारी यूनियनों का गठन सीपीएम और सीपीआई की बदौलत हुआ। आज तक जितने भी कर्मचारी आंदोलन हुए उनमें लाठी खाने से लेकर जेल जाने तक इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता शामिल रहे। लेकिन ये भी सच्चाई है कि कभी भी कर्मचारियों ने सीपीएम और सीपीआई को वोट नहीं दिया। वोट देने के समय उन्हीं पार्टियों को चुना जो निजीकरण करना चाहती थीं। कर्मचारियों ने कभी भी अपने गांव या कालोनियों में नौजवानों, मजदूरों, किसानों और महिलाओं के जन संगठन बनाने में कभी भी साथ नहीं दिया। विरोध जरूर किया। 

आंदोलन की दिशा क्या हो 

1. अगर ईमादारी से निजीकरण रोकना है तो सबसे पहले कर्मचारियों में क्रांतिकारी विचार से लैस कर्मचारी यूनियन बनाने की जरूरत है। जो साम्राज्यवादी नीतियों को पहचान ले और सुधारवाद, अवसरवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद और करप्शन के खिलाफ मजबूती से लड़ सके। 

2. कर्मचारियों को यूनियन के मार्फ़त मेहनतकश आवाम के पक्ष में वर्गीय राजनीतिक चेतना से लैस किया जाना सबसे पहली जरूरत है।

3. कर्मचारी जिस भी जगह रहता है उस जगह अपने आस-पास जनवादी संगठनों का निर्माण करने में मदद करे। ताकि सरकार की जनविरोधी और निजीकरण विरोधी नीतियों के खिलाफ जनता का एक मजबूत मोर्चा बनाया जा सके। 

4. जनता के साथ कर्मचारियों का व्यवहार सुधारा जाए। क्योंकि कर्मचारी की तनख्वाह जनता की जेब से ही आती है। 

5. कर्मचारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाये ताकि जनता को विश्वास हो सके कि कर्मचारी कामचोर नहीं है। 

6. दुश्मन और दोस्त को पहचाना जाए।

ये लड़ाई सिर्फ निजीकरण के खिलाफ नहीं है, सिर्फ लड़ाई रोजगार के लिए नहीं है। ये लड़ाई साम्रज्यवाद की उदारीकरण,निजीकरण और भूमंडलीकरण (LPG) की नीतियों के खिलाफ है जो मेहनतकश आवाम को गुलाम बनाती है। अगर आने वाले समय में आंदोलन सही दिशा नहीं पकड़ा तो सरकार को निजीकरण करने से रोकना नामुमकिन हो जाएगा। 

(उदय राम स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल हरियाणा के हिसार में रहते हैं।)  








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