आईटी कर्मचारियों ने भी उठाया हाथों में झंडा

आंदोलन , , शनिवार , 01-07-2017


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डॉ. कुमुदिनी पति

155 अरब डालर वाले भरतीय आईटी उद्योग में लगभग 40 लाख लोग काम कर रहे हैं और वे अपने आप को पेशेवर लोगों की श्रेणी में रखते थे। इसलिए वे कभी किसी किस्म की यूनियन बनाने में रुचि नहीं रखते थे। न ही वे देश में कार्यरत अन्य कर्मचारियों के ट्रेड यूनियनों के साथ किसी तरह का संबंध बनाते थे। पर जब 2008 से आईटी उद्योग में स्लोडाउन हुआ और फिर छः साल बाद, 2014 में टीसीएस कम्पनी में भारी पैमाने पर छंटनी की कार्रवाई हुई तथा इस उद्योग में लगातार अवैध छंटनी होने लगी, इन कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा और वे अपने भविष्य के बारे में चिंतित हुए। पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि उनका रोजगार भी पूरी तरह से असुरक्षित है और उनके भीतर श्रमिक वर्ग की चेतना जगी।

1967 में हुई आईटी की शुरुआत 

सूचना व प्रौद्योगिकी क्षेत्र की शुरुआत टाटा और बरोज़ के सौजन्य से मुम्बई में 1967 में हुई थी। 1973 में मुम्बई में एसईईपीज़ेड,यानि सबसे पहला साफ्टवेयर एक्सपोर्ट क्षेत्र बना। आज भारत साफ्टवेयर के क्षेत्र में दूसरे नम्बर का निर्यातक देश है और बंगलुरु भारत का ‘सिलिकन वैली’कहलाता है क्योंकि 38 प्रतिशत् निर्यात यहीं से होता है। देशी-विदेशी कम्पनियों के हेडक्वाटर यहीं स्थित हैं। हैदराबाद भी अब ‘साइबराबाद’ कहलाने लगा है और उभरता हुआ केंद्र है। माइक्रोसाफ्ट डेवलपमेंट सेंटर यहीं स्थित है। वर्तमान समय में दिल्ली, गुड़गांव और नोएडा और ग्रेटर नोएडा भी कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के केंद्र बने हुए हैं।

देश में पहली बार आईटी कर्मचारियों ने अपने आप को ट्रेड यूनियन में संगठित करने और अपनी मांगों को लेकर आवाज़ उठाने का निर्णय लिया। 

छंटनी के खिलाफ गोलबंद हुए आईटी कर्मचारी।

फाइट के नाम से यूनियन का गठन

फाइट, यानि फोरम फॉर आईटी एम्प्लाईज़ के पंजीकरण की प्रक्रिया तमिलनाडु में अपने अन्तिम चरण में है और कोशिश चल रही है कि अन्य राज्यों में भी इसी तर्ज पर आईटी कर्मचारी संगठित हों। वे अवैध लेऑफ, छंटनी, प्रताड़ना और आईटी क्षेत्र के कर्मचारियों की अन्य मांगों पर अभियान चला रहे हैं। 21 जून को विप्रो, एचसीएल और जेपी मॉरगन कम्पनियों के कर्मचारियों की ओर से कर्नाटक श्रम विभाग को ज्ञापन दिये हैं, और वे मालिक व कर्मचारियों के बीच समझौता वार्ता के लिए श्रम आयुक्त पर दबाव डाल रहे हैं। ये पेटिशन मनमानी छंटनी और कर्मचारियों को दबाव में लेकर इस्तीफा दिलवाने के विरुद्ध है। शिकायतें इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट ऐक्ट के 2ए (व्यक्तिगत) और 2के (सामूहिक) के तहत दर्ज किये जा रहे हैं। सबसे अधिक शिकायतें पुणे और फिर हैदराबाद में दर्ज हुईं। ऐसा इसलिए हो पा रहा है कि अब यह घोषित हो चुका है कि आईटी क्षेत्र को इंडस्ट्रियल एम्प्लायमेंट (स्टैंडिंग आर्डर) ऐक्ट 1946 से छूट नहीं मिल सकती। अब सभी आईटी कम्पनियों को, जहां 100 या अधिक कर्मचारी हैं,इस कानून को मानना होगा। 

छंटनी पर तत्काल रोक की मांग

इन कर्मचारियों द्वारा सरकार से मांग की जा रही है कि प्रौद्योगिकी और ऑटोमेशन के नाम पर कम्पनियों द्वारा की जा रही व्यापक छंटनी पर, जिसके तहत अगले तीन वर्षों में करीब 2 लाख नौकरियां जाएंगी,तुरन्त रोक लगाई जाए; ये कर्मचारी 8-10 साल काम कर चुके हैं और आज यह कहा जा रहा है कि वे नई तकनीक और बढ़ते ऑटोमेशन के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। साथ ही, मांग उठी कि कर्मचारी-विरोधी परफारमेंस अप्रेज़ल सिस्टम को रद्द किया जाए, क्योंकि यह अस्पष्ट और आत्मगत आधारों पर निर्भर है। कॉगनाज़ैन्ट कम्पनी ने करीब 1500 मैनेजरों की छुट्टी कर दी और सस्ते विकल्पों की तलाश में है। उधर इन्फोसिस ने घोषणा की कि वह यूएस में अमरीकियों को बड़ी संख्या में रोज़गार देगा। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि इन अमरीकियों को ऊंची पगार पर रखने के लिए ही भारत में छंटनी की जा रही है। पर ट्रम्प की भारत-विरोधी नीति को चुनौती देने की हिम्मत नहीं जुटातीं ये कम्पनियां। यह आईटी उद्योग के 3 दशकों के इतिहास में पहली बार हो रहा है। यह मांग भी उठी कि आईटी क्षेत्र में इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट ऐक्ट सहित तमाम श्रमिक कानूनों को लागू किया जाए। 

स्टार्ट अप्स में कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन की गारण्टी की जाए, यह भी एक मांग उठी। कर्नाटक के 2016 के एक निर्णय के अनुसार महिलाओं के लिए आईटी क्षेत्र और आईटीईएस में रात्रि पाली के काम पर प्रतिबन्ध हटा लिया गया ताकि महिलाओं की अधिक संख्या में नियुक्ति हो सके। पर मार्च 2017 में विधायकों की एक संयुक्त समिति ने इसे खारिज कर दिया, क्योंकि कम्पनियां महिलाओं के लिए परिवहन व्यवस्था और सुरक्षा की गारंटी करने से कतरा रही थीं। महिलाओं का कहना है कि यह अनुचित है, पर एक विधायक ने इसका समाधान बताया कि अधिक पुरुषों की नियुक्ति की जाए,जो हास्यास्पद है।

नौ जगहों पर सक्रिय है यूनियन

फाइट नौ आईटी हब्स में सक्रिय है। इस संगठन के महासचिव और न्यू डेमोक्रेटिक लेबर फ्रंट के नेता कहते हैं कि एक तरफ कर्मचारियों की मनमाने तरीके सें छंटनी हो रही है, दूसरी तरफ कम्पनियों के उच्च पदों पर बैठे एक्ज़ीक्यूटिव अपनी तनख्वाह में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि का लाभ उठा रहे हैं। सभी को मालूम है कि हाल में ही इन्फोसिस के सर्वोच्च पदों पर नियुक्त 4 अधिकारी राजेश मूर्ति, संदीप ददलानी, मोहित जोशी और रवि कुमार को सैलरी में 14 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मुआवज़ा दिया गया, जबकि उन कर्मचारियों को छंटनी का शिकार बनाया गया था जो प्रतिदिन 10-12 घंटे काम करते रहे। कुछ कर्मचारी बताते हैं कि कम्पनियां बाउंसर रखती हैं और ऑफिस की छत पर जाना मुश्किल है, क्योंकि अधिकारियों को डर है कि कर्मचारी वहां से कूदकर आत्महत्या कर सकते हैं। इसके पीछे कुछ जायज कारण हैं; कर्मचारियों ने मकान, गाड़ी वगैरह के लिए बड़े लोन ले लिए हैं और इन्हें चुकाना भी है। नास्काम सभी आरोपों को बेबुनियाद बताता है। उसका कहना है कि अभी भी कम्पनियां भारी पैमाने पर नई भर्ती कर रही हैं। पर कर्मचारी कहते हैं कि कार्य-कौशल का मनमाना पैमाना रखकर छंटनी की जाती है-इसी को लेकर लेबर विवाद चल रहे हैं।

मोदी और ट्रंप की मुलाकात।

साफ्टवेयर इंजीनियरों के मसले पर नहीं की बात

इसी संदर्भ में यह बात महत्वपूर्ण है कि ट्रम्प सरकार एच-1 बी वीजा पर रिव्यू करने जा रही है। इससे पहले भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ट्रम्प के साथ लम्बी वार्ता हुई जिसमें डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने के लिए अमरीकी सहयोग पर भी विस्तृत चर्चा हुई। परन्तु प्रधानमंत्री ने एक बार भी भारतीय आईटी प्रोफेश्नलों पर लागू एच-1 बी वीज़ा प्रतिबन्ध पर किसी प्रकार की बात नहीं छेड़ी। इस भेंट के पश्चात जारी किये गए दो देशों के नेताओं के संयुक्त वक्तव्य में भी एच-1 बी वीजा की चर्चा किसी भी स्तर पर नहीं आई।

आईटी कर्मचारियों का संगठित होना एक सकारात्मक कदम है और आगे आने वाले दिनों में ये सफेदपोश कर्मचारी भी मज़दूरों की भांति सड़कों पर संघर्ष करते दिखाई देंगे, यही आशा है। उनकी बड़ी संख्या यदि आन्दोलन में उतरे तो भारत में समस्त कामकाज को ठप्प कर सकती है। इसलिए उन्हें मालिकों का भय अंत में छोड़ना ही पड़ेगा। 

(लेखिका महिलाओं के सवालों पर कई जुझारू आंदोलनों का नेतृत्व कर चुकी हैं और आजकल इलाहाबाद में रहती हैं।)






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