बोट क्लब के बोनस के साथ आंदोलन के लिए जंतर-मंतर वापस मिला

आंदोलन , ख़बर भी-नज़र भी, सोमवार , 23-07-2018


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मुकुल सरल

शांति पूर्वक धरना प्रदर्शन नागरिक का मौलिक अधिकार है : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के साथ जंतर-मंतर आंदोलन के लिए वापस मिल गया और साथ ही बोनस में मिला है बोट क्लब, जहां धरना-प्रदर्शन, रैली पर बरसों पहले रोक लगाई जा चुकी थी। 

जस्टिस एके सिकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने सोमवार को इस आशय के आदेश देते हुए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी द्वारा जंतर-मंतर पर पूर्ण रूप से धरना-प्रदर्शन को लेकर लगाई गई रोक को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि इस तरह नागरिकों के धरना-प्रदर्शन पर पूर्ण रूप से पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। 

 

हमारे लिए जंतर-मंतर का मतलब हमेशा से ही आंदोलन रहा है। जंतर-मंतर मतलब आंदोलन...जंतर-मंतर मतलब धरना-प्रदर्शन... 

दिल्ली में बरसों से जंतर-मंतर हर छोटे-बड़े आंदोलन का गवाह बना है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरे देश से लोग अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर यहां धरना-प्रदर्शन के लिए आते थे। कई लोग तो सालों-साल से यहां डटे थे। 

 

पिछले कुछ सालों में तो यहां से बड़े आंदोलनों की शुरुआत हुई। चाहे 2011 में जनलोकपाल के लिए अन्ना हज़ारे का अनशन हो या 2012 का निर्भया आंदोलन। 2013 में मेधा पाटकर की नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन हुआ और अभी हाल में यानी पिछले 2017 में जंतर-मंतर तमिलनाडु के किसानों के धरने का केंद्र रहा। 2017 में ही चंद्रशेखर आज़ाद रावण की भीम आर्मी ने भी यहां अपना शक्ति प्रदर्शन किया। जेएनयू पर हमले का प्रकरण हो या लापता नजीब का मामला या फिर अखलाक, जुनैद और पहलू खान की मॉब लिंचिंग हर मुद्दे पर जंतर-मंतर पर जोरदार प्रदर्शन हुए हैं। 

 

सभी को लगता था कि अगर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हो गया तो मतलब संसद पर प्रदर्शन हो गया, सरकार तक बात पहुंच गई। दिल्ली चलो के नारे का अर्थ भी यही होता था कि जंतर-मंतर चलो....इससे पहले ये बोट क्लब के लिए कहा जाता था...लेकिन बरसो पहले आंदोलनकारियों से बोट क्लब छिना और पिछले साल अक्टूबर, 2017 अक्टूबर में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी ने जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी। और तर्क दिया गया कि इससे आसपास की आबादी को परेशानी होती है और ध्वनि प्रदूषण से पर्यावरण को नुकसान भी होता है।

 

इसके बाद धरना-प्रदर्शन के लिए सेंट्रल दिल्ली से दूर रामलीला मैदान अलॉट किया गया लेकिन वहां भी धरना-रैली के लिए हजारों रुपये का चार्ज लगा दिया गया। यानी एक तरह से एनजीटी के फैसले की आड़ में विरोध की आवाज़ को ही दबाने की कोशिश की गई।

दरअसल सरकारें नहीं चाहती कि कोई उनका इस तरह खुला विरोध करे और वर्तमान मोदी सरकार में तो इसकी गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। इस समय तो हाल ये है एक अराजक हिंसक भीड़ को कहीं भी खुलेआम किसी को भी मार डालने की छूट है लेकिन एक विवेकवान समूह के लिए कहीं शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की जगह नहीं। 

किसी ने एनजीटी से ये नहीं पूछा कि आबादी तो हर जगह है तो क्या आंदोलन ही बंद कर दिया जाए। ध्वनि प्रदूषण तो हज़ार चीजों से होता है और अगर नारे, भाषण या लाउडस्पीकर से होता है तो क्या देश भर में होने वाली राजनीतिक और चुनावी रैलियां और प्रचार को बंद कर दिया जाए? 

 

सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के सभी तर्कों को खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों के शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन के मौलिक अधिकार और कानून व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा था। 

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से आंदोलनकारियों में उत्साह है। मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस), इंडियन एक्स सर्विसमैन मूवमेंट व अन्य लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सेंट्रल दिल्ली में शांतिपूर्ण तरीके से धरना प्रदर्शन करने की इजाजत देने के की मांग की थी।

 

याचिका में कहा गया था कि पिछले साल अक्तूबर में एनजीटी ने जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन पर रोक लगा दी जबकि पूरी सेंट्रल दिल्ली में दिल्ली पुलिस की ओर से हमेशा के लिए धारा 144 लगाई गई है। ऐसे में लोगों के शांतिपूर्व प्रदर्शन करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। उनका ये भी कहना है कि संविधान से मिले मौलिक अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता और दिल्ली पुलिस द्वारा लागू की गई धारा 144 मनमानी और गैरकानूनी है। याचिका में संगठन ने सुझाया है कि इंडिया गेट के पास बोट क्लब पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक तौर पर इजाजत दी जा सकती है।

 

आपको बता दें कि जब जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन पर रोक लगी तभी हिंदी के वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने फेसबुक पोस्ट लिखकर नारा दिया था- बोट क्लब वापस दो ! इस पर तमाम लोगों ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए इसे एक राजनीतिक मुद्दा बनाने का आह्वान किया था। और देखिए उनका सपना भी साकार हो गया।

 

सुप्रीम कोर्ट ने इस सबको लेकर दिल्ली पुलिस कमिश्नर से 2 हफ़्ते में गाइडलाइंस बनाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि धरने प्रदर्शन को नियंत्रित करने को लेकर गाइडलाइन के लिए केंद्र सरकार और पुलिस सिफारिशें दाखिल करें। साथ ही यातायात संबंधी एजेंसियों से भी प्रदर्शन के वक्त यातायात सुचारू चले इसके लिए गाइडलाइन और सिफारिशें मांगी गई हैं।








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