जंतर-मंतर से अब नहीं उठेगी जनता की आवाज

विशेष , नई दिल्ली , शुक्रवार , 06-10-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। दिल्ली का जंतर-मंतर एक जमाने में मौसम और मानसून का अनुमान लगाता था। लेकिन बीते दो दशकों से वह इस काम को छोड़कर  देश का राजनीतिक तापमान मापने में लगा रहा। जंतर-मंतर के ऐतिहासिक यंत्र के समीप देश के राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों की संवेदना और जनता के प्रति उनकी जवाबदेही का मौन लेख-जोखा तैयार होता रहा है। लेकिन राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के एक आदेश से अब वहां धरना और विरोध-प्रदर्शन नहीं हो सकेगा। एनजीटी का मानना है कि  जंतर-मंतर पर होने वाले धरना-प्रदर्शन से दिल्ली की आबोहवा और पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। 

यह रोक जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के इकट्ठा होने से होने वाली भीड़, लाउड स्पीकर और मानवजनित प्रदूषण से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को ध्यान में रखते हुए किया गया है। न्यायमूर्ति आर एस राठौर की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने दिल्ली सरकार, एनडीएमसी और दिल्ली पुलिस आयुक्त को आदेश दिया कि ‘‘सभी राजनीतिक दलों, संगठनों और प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पर लोगों को इकट्ठा करने, सार्वजनिक भाषण और लाउड स्पीकर के इस्तेमाल पर चार सप्ताह के अंदर रोक लगाए।’’ एनजीटी ने विरोध-प्रदर्शन कर रहे संगठनों को रामलीला मैदान स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है।    

जंतर-मंतर और धरना-प्रदर्शन 

एनजीटी के इस आदेश से हजारों ऐतिहासिक आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों के साक्षी रहे जंतर-मंतर पर कोई संगठन या राजनीतिक दल धरना-प्रदर्शन नहीं कर सकेंगे। संविधान प्रदत्त ‘विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार’ देश की जनता के हाथ से छिनने जा रहा है। जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन देश के संसद के सामने प्रदर्शन माना जाता है। केंद्र सरकार ने ही इस जगह को ‘विरोध’ करने या अपनी आवाज को संसद तक पहुंचाने के लिए तय किया था। अभी तक यहां पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे व्यक्तियों और संगठनों के मांगपत्र को एक पुलिस अधिकारी पीएमओ और संबंधित विभाग तक पहुंचाते रहे हैं। पहले यह विरोध-प्रदर्शन संसद के एकदम समीप स्थित ‘बोट क्लब’ पर होता था। लेकिन संसद की सुरक्षा और दिनोंदिन बढ़ती प्रदर्शनकारियों की संख्या को देखते हुए बोट क्लब के बजाए इसे जंतर-मंतर कर दिया गया। अब इसे रामलीला मैदान किया जा रहा है। 

प्रदर्शन स्थल बदलने और संसद से दूरी बढ़ने के बावजूद प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त नहीं हुए। दरअसल, स्थान बदलने से सरकार की रोजमर्रा की परेशानी भले कम हो जाती हो लेकिन आम जनता की परेशानी पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है। जनता की आवाज को अपने कान तक न पहुंचने देने का इंतजाम करने के बाद भी सत्ता चैन से नहीं रह पा रही है। इसीलिए वह दिनोंदिन प्रदर्शन स्थल को बदलने का षड़यंत्र करने में लगी है। इस बार उसने संसद की सुरक्षा नहीं बल्कि पर्यावरण सुरक्षा का बहाना बनाया है। केंद्र सरकार और एनजीटी भले कहे कि स्थान परिवर्तन करने से प्रदर्शनकारियों की मांगों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन यह सब बचकानी बातें हैं। इस प्रक्रिया में जनता और संसद की दूरी बढ़ती जा रही है। पूरे देश से आने वाले संगठन और व्यक्ति जब स्थानीय और राज्य सराकरों से अपनी समस्या बताते हुए थक जाते हैं,जब उन्हें यह लगता है कि अब राज्य सरकार हमारी समस्या का समाधान नहीं कर सकती तो वे दिल्ली आकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन सरकार इस पर रोक लगा रही है। 

जंतर-मंतर पर दिलतों का प्रदर्शन।

एनजीटी के आदेश की पृष्ठभूमि

इस दौर में जंतर मंतर पर कई प्रसिद्ध विरोध प्रदर्शन हुए। जिसमें अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, बाबरी मस्जिद विध्वंस विरोध और तमिलनाडु के किसानों के विरोध शामिल हैं। लेकिन सत्तापोषित एक वर्ग जंतर-मंतर से विरोध-प्रदर्शन होने को बंद कराने में लगा था। दरअसल, पिछले साल जंतर मंतर रोड के निवासियों के एक समूह ने एनजीटी के समक्ष एक याचिका दायर करते हुए कहा था कि दिल्ली मास्टर प्लान -2021 में इस क्षेत्र को ‘आवासीय’ के रूप में रखा गया था। रोज-रोज होने वाले  प्रदर्शन से यहां के निवासियों को परेशानी हो रही है।  जंतर-मंतर पर ढेर सारे प्रदर्शनकारी संगठन साल-साल भर से यहां तंबू लगाकर रह रहे हैं। याचिकाकर्ताओं के दलील पर न्यायाधिकरण ने कहा, ‘प्रतिवादी (एनडीएमसी) प्रदर्शनकारियों को तत्काल रामलीला मैदान, अजमेरी गेट  स्थानांतरित कर देगा। एनडीएमसी के अध्यक्ष, दिल्ली पुलिस प्रमुख, और दिल्ली सरकार एनसीटी के निर्णय की तारीख से पांच सप्ताह के भीतर  अनुपालन रिपोर्ट पेश करेगी।’ 

याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए प्रदूषण और स्वच्छता के मुद्दों को संबोधित करते हुए एनजीटी ने कहा, ‘यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता कानूनों के उल्लंघन और अधिकारियों द्वारा अपनी ड्यूटी का पालन न करने से परेशान हैं। वहां पर प्रदूषण, स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति काफी खराब है। आंदोलनियों के निरंतर वहां आने से शोर और प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।

एनजीटी के आदेश पर उठ रहे हैं सवाल

याचिकाकर्ताओं की मांग को ध्यान में रखते हुए एनजीटी ने जो फैसला दिया है उस पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। दरअसल, एनजीटी ने जिस तरह से वहां रहने वाले लोगों की मांग पर प्रदूषण को मुद्दा बनाया है वह संदेह के घेरे में है। इसके पहले दिल्ली में यमुना के किनारे श्री श्री रविशंकर का जो कार्यक्रम हुआ था उससे पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ। तब एनजीटी बेबस दिखा था। इसके साथ ही दिल्ली में भलस्वा, गाजीपुर और भाटी माइन्स आदि स्थानों पर कचरा का पहाड़ बन गया है। जिससे आस-पास के कई किलोमीटर तक लोगों का जीना मुहाल है। वहां पर एनजीटी को प्रदूषण नहीं दिखता है।    






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